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Water In Rajasthan | Water Problem | Water Crisis


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Barmer Water Berry : थार के बाड़मेर में सदियों पुरानी बेरियां आज भी मुख्य जल स्रोत हैं. बारिश का पानी रेत से छनकर जमा होता है. दूरदराज गांव और पशु इन्हीं पर निर्भर हैं. हमीरानी निवासी याकूब बताते हैं कि पहले जब न तो नहर थी और न ही पाइपलाइन, तब पूरा जीवन इन्हीं बेरियों के आसपास चलता था. समय बदला, गांवों में जलापूर्ति योजनाएं पहुंचीं, लेकिन आज भी कई ढाणियों और सीमावर्ती इलाकों में बेरियां ही सबसे भरोसेमंद जल स्रोत बनी हुई हैं.

बाड़मेर. थार के रेगिस्तान में, जहां दूर-दूर तक सिर्फ रेत ही रेत नजर आती है और गर्मियों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच जाता है, वहीं जमीन के नीचे छिपा पानी का खजाना आज भी हजारों लोगों की प्यास बुझा रहा है. भारत-पाक सीमा से सटे बाड़मेर के गांवों में सदियों पुरानी जल संरचना ‘बेरियां’ आज भी जीवनरेखा बनी हुई हैं.

थार के रेगिस्तान में पानी को हमेशा सोने से भी ज्यादा कीमती माना गया है. भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे बाड़मेर जिले के कई गांवों और ढाणियों में लोग आज भी पेयजल के लिए बेरियों पर निर्भर हैं. बेरियां रेगिस्तान में पारंपरिक जल संरक्षण का अनूठा उदाहरण हैं. बारिश का पानी रेत के जरिए जमीन में रिसकर जमा होता है और इसी पानी तक पहुंचने के लिए बेरियों का निर्माण किया जाता है. रेत प्राकृतिक फिल्टर का काम करती है, जिससे पानी साफ और मीठा बना रहता है.

बदलते दौर में भी बनी हुई हैं जीवनदायिनी
आज भले ही कई क्षेत्रों में पाइपलाइन और टैंकरों के जरिए पानी पहुंच रहा है, लेकिन सीमावर्ती ढाणियों और दूरदराज के इलाकों में बेरियां अभी भी सबसे भरोसेमंद जल स्रोत मानी जाती हैं. ये सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि पशुओं और वन्यजीवों के लिए भी जीवनदायिनी साबित हो रही हैं. भीषण गर्मी में गाय, भेड़, बकरी, ऊंट और अन्य पशु इन्हीं जल स्रोतों से अपनी प्यास बुझाते हैं.

इन इलाकों में आज भी बेरियों पर निर्भर हैं लोग
बाड़मेर जिले के सीमावर्ती और रेगिस्तानी क्षेत्रों में आज भी बड़ी संख्या में बेरियां मौजूद हैं. गडरारोड, खलीफे की बावड़ी, तामलोर, हमीरानी, सरगिला, अभे का पार, सज्जन का पार, पनेला, बाखासर और सरहद से सटी कई ढाणियों में ग्रामीण आज भी पेयजल के लिए बेरियों पर निर्भर हैं.

कई गांवों की बुझती है प्यास
हमीरानी निवासी याकूब बताते हैं कि पहले जब न तो नहर थी और न ही पाइपलाइन, तब पूरा जीवन इन्हीं बेरियों के आसपास चलता था. समय बदला, गांवों में जलापूर्ति योजनाएं पहुंचीं, लेकिन आज भी कई ढाणियों और सीमावर्ती इलाकों में बेरियां ही सबसे भरोसेमंद जल स्रोत बनी हुई हैं. वे बताते हैं कि हमीरानी के आसपास दर्जनों गांवों की प्यास इन्हीं बेरियों से बुझती थी. आज भी कई परिवार रोजाना कई किलोमीटर दूर स्थित बेरियों से पानी भरकर लाते हैं.

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Anand Pandey

आनंद पाण्डेय वर्तमान में News18 हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें



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