रेहान अहमद|रांची हरमू हमीम मस्जिद के इमाम मौलाना अब्दुल माजिद ने बताया कि कुर्बानी का वाकया इस्लाम धर्म में हजरत इब्राहिम (अ) व उनके पुत्र हजरत इस्माइल (अ) के अटूट ईमान, सब्र व अल्लाह के प्रति समर्पण की सबसे बड़ी मिसाल है। इसी महान घटना की याद में दुनिया भर के मुसलमान “ईद उल अजहा’ (बकरीद) मनाते हैं। हजरत इब्राहिम (अ) ने ख्वाब में देखा कि अल्लाह उन्हें उनकी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी देने का हुक्म दे रहे हैं। हजरत इब्राहिम (अ) ने उस ख्वाब को अल्लाह का फरमान समझा। चूंकि इस्माइल (अ) उनके इकलौते और बुढ़ापे की औलाद थे, इसलिए वे उन्हें जान से भी ज्यादा प्यारे थे। उन्होंने अपने पुत्र की कुर्बानी देने का पक्का इरादा कर लिया। हजरत इब्राहिम (अ) ने कहा, “ऐ मेरे बेटे! मैंने ख्वाब में देखा है कि मैं तुम्हें अल्लाह की राह में कुर्बान कर रहा हूं, तो बताओ तुम्हारी क्या राय है। तो हजरत इस्माइल (अ) ने कहा, आपको जो हुक्म दिया गया है, उसे पूरा कीजिए। आप मुझे सब्र करने वालों में से पाएंगे। जब हजरत इब्राहिम (अ) अपने बेटे को कुर्बानी के लिए “मीना’ की घाटी में ले गए, जमीन पर लिटाया और छुरी गर्दन पर रखी, तो उस वक्त अल्लाह की तरफ से फरिश्ते जिब्रिल (अ) एक दुंबा लेकर उतरे। दुंबा की कुर्बानी हुई। कुर्बानी का उद्देश्य केवल जानवर का मांस या खून बहाना नहीं है, बल्कि दिल के अंदर के “अना’ व दुनियावी मोह को खत्म कर अल्लाह की तरफ झुकना है। इस तरह कुर्बानी दस्तूर बन गई। कुर्बानी हजरत इब्राहिम (अ) की सुन्नत है। मुसलमान बकरीद के दिन कुर्बानी करते हैं। बकरीद पर कुर्बान करने के लिए रांची के बाजार में कई तरह के दुंबे और बकरे लाए गए हैं। सबसे अधिक चर्चा 130 किलो के दुंबा की है। सफेद रंग के इस दुंबा की कीमत 2.50 लाख रुपए है। डोरंडा पत्थर रोड निवासी मो. मजहर कुरैशी ने बताया कि वह राजस्थान से इसे 70 हजार रुपए में खरीद कर लाए थे। इसे कुट्टी, चोकर, चना, दर्रा के साथ रोजाना एक किलो ड्राई फ्रूट और ग्लूकॉन डी देते हैं। इनकी सफाई का खास ख्याल रखा जाता है। हर दो दिन में शैंपू से नहलाते हैं। ये पंखे के नीचे पलंग पर सोते हैं।
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