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आज सिलेबस में पढ़ाए जाते हैं झारखंड के ‘ट्री मैन’, 13 साल...


पलामू. पर्यावरण संरक्षण आज पूरी दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है. जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान और घटते वन क्षेत्र मानव जीवन के लिए गंभीर संकट पैदा कर रहे हैं. लेकिन झारखंड के पलामू जिले के एक व्यक्ति ने पांच दशक पहले ही इस खतरे को समझ लिया था. महज 13 वर्ष की आयु में शुरू किया गया उनका ‘जंगल लगाओ-जंगल बचाओ’ अभियान आज देश ही नहीं, विदेशों तक पहुंच चुका है.

लाखों पौधों का रोपण कर चुके इस पर्यावरण योद्धा को आज लोग झारखंड के ‘ट्री मैन’ के नाम से जानते हैं. उनकी जीवनी स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल है, जबकि यूपीएससी और कौन बनेगा करोड़पति जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर भी उनसे जुड़े प्रश्न पूछे जा चुके हैं.

1966 के भीषण अकाल से मिली प्रेरणा
पलामू जिले के छतरपुर प्रखंड अंतर्गत डाली गांव में जन्मे इस पर्यावरण प्रेमी की प्रेरणा वर्ष 1966 के भीषण अकाल से मिली. ट्री मैन के रूप में जाने जाने वाले डॉ. कौशल किशोर जायसवाल ने लोकल18 को बताया कि उस समय क्षेत्र में खाने के लिए अनाज नहीं था और पीने के लिए पानी तक का संकट खड़ा हो गया था.

गांव के अधिकांश कुएं सूख चुके थे और लोग जंगलों में जाकर सराय के फल खाकर जीवन गुजारने को मजबूर थे. इसी दौरान उन्होंने अपने माता-पिता और ग्रामीणों को यह चर्चा करते सुना कि जंगलों की अंधाधुंध कटाई के कारण ही अकाल जैसी स्थिति उत्पन्न हुई है. यही बात उनके मन में घर कर गई और उन्होंने जंगल बचाने का संकल्प ले लिया.

13 साल की उम्र में शुरू किया अभियान
वर्ष 1967 में मात्र 13 वर्ष की आयु में उन्होंने 7.72 एकड़ भूमि पर पौधरोपण कर ‘जंगल लगाओ-जंगल बचाओ’ अभियान की शुरुआत की. धीरे-धीरे पेड़ बड़े होने लगे, लेकिन कुछ वर्षों बाद वन माफियाओं द्वारा उनकी कटाई शुरू कर दी गई. इससे चिंतित होकर उन्होंने ‘वनराखी मूवमेंट’ की शुरुआत की. इस अभियान के तहत लोगों ने पेड़ों को राखी बांधकर उनकी रक्षा का संकल्प लिया. देखते ही देखते यह आंदोलन पूरे देश में लोकप्रिय हो गया और बाद में विदेशों तक पहुंच गया.

1 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य
उन्होंने कहा कि आज वनराखी आंदोलन अपने 50 वर्षों का स्वर्णिम सफर पूरा कर चुका है. इस अभियान के माध्यम से अब तक 26 लाख से अधिक वृक्षों को राखी बांधी जा चुकी है. वहीं 59 लाख पौधों का निःशुल्क वितरण और रोपण भारत सहित नेपाल, भूटान, म्यांमार, अजरबैजान, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया और जापान तक किया जा चुका है. देश के 26 राज्यों और 181 जिलों में इस अभियान की छाप दिखाई देती है. उनका लक्ष्य 1 करोड़ पौधे लगाने का है, जिसे वह अपने निजी खर्च से पूरा करना चाहते हैं.

पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने गांव में पांच एकड़ में पार्क विकसित किया, 30 एकड़ भूमि पर वृक्ष आधारित खेती की और कई गांवों में एक से दो एकड़ तक पौधरोपण कराया.

हर स्तर पर हुई सराहना
पर्यावरण के प्रति उनके योगदान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है. उन्हें अब तक 80 से अधिक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं, जिनमें 10 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार शामिल हैं. उनकी जीवनी ‘झारखंड मैन ऑन मिशन’ शीर्षक से CBSE की आठवीं और ICSE की छठी कक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल है.

आज 72 वर्ष की आयु में भी वह अपने निजी संसाधनों से पर्यावरण संरक्षण का यह अभियान चला रहे हैं और लोगों को संदेश दे रहे हैं कि जिस प्रकार हर व्यक्ति अपने धर्म का पालन करता है, उसी प्रकार ‘पर्यावरण धर्म’ को अपनाना भी समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है. इसके लिए उन्होंने विश्व का पहला पर्यावरण धर्म ज्ञान मंदिर भी बनाया है.



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