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एसिड अटैक पीड़ितों को मुआवजा देने में लिंग के आधार पर नहीं हो सकता भेदभाव, झारखंड हाईकोर्ट का आदेश रांची: झारखंड हाईकोर्ट में शुक्रवार को पुरुष एसिड पीड़ितों के अधिकारों को लेकर दाखिल मामले की सुनवाई हुई। जस्टिस रंगन मुखोपाध्याय और जस्टिस पीके. श्रीवास्तव की अदालत ने सुनवाई के बाद एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि एसिड अटैक पीड़ितों को मुआवजा देने में लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि तेजाब हमला किसी भी व्यक्ति के जीवन, स्वास्थ्य और सम्मान पर गंभीर प्रहार है, इसलिए पीड़ित के महिला या पुरुष होने के आधार पर अलग-अलग मुआवजा देना कतई न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने एसिड अटैक पीड़ित राहुल कुमार की अपील को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को पहले दिए जा चुके 3 लाख रुपये के अलावा 15 लाख रुपये का और भुगतान करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही, अदालत ने राहुल कुमार को कुल 18 लाख रुपये का मुआवजा देने और उनके समुचित इलाज की व्यवस्था करने का आदेश दिया है। अदालत ने अपील दाखिल करने में हुई करीब पांच वर्ष की देरी को भी विशेष परिस्थितियों के तहत स्वीकार कर लिया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी आसानी से उपलब्ध है एसिड सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की रोक के बावजूद झारखंड में सल्फ्यूरिक, हाइड्रोक्लोरिक और नाइट्रिक एसिड आज भी आसानी से मिल जाते हैं। चूंकि इसका इस्तेमाल बैटरी, धातु की सफाई, औद्योगिक इकाइयों, प्रयोगशालाओं और कुछ घरेलू सफाई कार्यों में होता है, इसलिए इसकी उपलब्धता बनी हुई है। कानूनी रूप से इसकी बिक्री पर नियंत्रण के लिए सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2013 में कड़े दिशा-निर्देश जारी किए थे। इन नियमों के अनुसार: बिना वैध पहचान पत्र और रजिस्टर में विवरण दर्ज किए किसी को भी एसिड नहीं बेचा जा सकता। विक्रेता को खरीदार का नाम, पता, पहचान पत्र संख्या और खरीदारी का स्पष्ट कारण रजिस्टर में दर्ज करना अनिवार्य है। निगरानी का अभाव: हालांकि, जमीनी स्तर पर अधिकतर विक्रेताओं द्वारा इन नियमों का पालन नहीं किया जाता है और प्रशासन भी एसिड विक्रेताओं के खिलाफ कभी कोई ठोस कदम नहीं उठाता। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान झारखंड में एसिड की खुलेआम बिक्री और इसके वितरण पर प्रभावी निगरानी न होने को बेहद गंभीरता से लिया है।
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