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सुप्रीम कोर्ट में कथित “कॉकरोच जनता पार्टी” और फर्जी वकीलों से जुड़े मामले को लेकर एक नई याचिका दाखिल की गई है, जिससे राजनीतिक और कानूनी हलकों में हलचल तेज हो गई है. याचिका में दावा किया गया है कि कुछ सोशल मीडिया गतिविधियों और कथित फर्जी वकालत से जुड़े मामलों की गंभीर जांच की जरूरत है. याचिकाकर्ता ने अदालत से इस पूरे प्रकरण में सीबीआई जांच और एफआईआर दर्ज करने की मांग की है.
कॉकरोज पार्टी का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
नई दिल्ली.कॉकरोच जनता पार्टी पर नई आफत आ गई है. इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की गई है. साथ ही फर्जी वकीलों की भी जांच कराने की मांग की गई है. वकील राजा चौधरी की ओर से दायर की गई इस याचिका में मांग की गई है कि फर्जी वकीलों, नकली लॉ डिग्रियों और देश की न्याय व्यवस्था का सरेआम मजाक उड़ाने वाले डिजिटल कैंपेन की देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी यानी CBI से जांच कराई जाए. दावा किया गया है कि कुछ लोग जाली मार्कशीट के दम पर काला कोट पहनकर सोशल मीडिया में अदालती कार्यवाही की क्लिप काटकर दिखा रहे हैं और अदालत को नीचा दिखाने की कोशिश की जा रही है.
कहानी शुरू होती है बीते 15 मई की एक बेहद गंभीर और ऐतिहासिक सुनवाई से. उस दिन अदालत कक्ष में माननीय जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ देश के कानूनी पेशे में दीमक की तरह घुस चुके फर्जी वकीलों और नकली लॉ डिग्रियों पर तल्ख टिप्पणी कर रही थी. इसी गरमा-गरम बहस और मौखिक चर्चा के दौरान कोर्ट रूम में अनौपचारिक रूप से ‘कॉकरोच’ शब्द का इस्तेमाल हो गया. बस फिर क्या था, सोशल मीडिया के कथित ‘कंटेंट किंग’ और डिजिटल क्रिएटर्स ने इस गंभीर अदालती टिप्पणी को हाथों-हाथ लपक लिया. इंटरनेट की दुनिया में देखते ही देखते “कॉकरोच जनता पार्टी” नाम से एक भयंकर ऑनलाइन अभियान, अनगिनत मीम्स और रील्स की ऐसी बाढ़ आई कि सुप्रीम कोर्ट की एक बेहद गंभीर और मर्यादित बहस को चुटकुलों और कॉमेडी शो में तब्दील कर दिया गया.
टिप्पणियों का गलत इस्तेमाल
वकील राजा चौधरी ने अपनी याचिका में इसी बात पर सबसे कड़ा ऐतराज जताते हुए कोर्ट से कहा है कि शीर्ष अदालत की मौखिक और अनौपचारिक टिप्पणियों को उनके मूल संदर्भ से पूरी तरह काटकर पेश किया गया. डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर इन वीडियो क्लिपिंग्स का न केवल राजनीतिक और व्यक्तिगत एजेंडे के लिए इस्तेमाल किया गया, बल्कि इनके जरिए यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर लाखों व्यूज बटोरकर मोटी कमाई और व्यावसायिक लाभ भी कमाया गया. याचिकाकर्ता का सीधा आरोप है कि न्याय के सर्वोच्च मंदिर की लाइव कार्यवाही और संवेदनशील बहसों को इस तरह मजेदार मीम्स, जोक्स और धंधे का हिस्सा बनाना न्याय व्यवस्था की गरिमा, साख और संप्रभुता पर सीधा आत्मघाती हमला है, जिसे किसी भी लोकतांत्रिक और सभ्य समाज में कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.
गाइडलाइन बनाई जाए
हालांकि, याचिकाकर्ता ने कोर्ट के सामने यह बिल्कुल साफ कर दिया है कि यह जनहित याचिका किसी भी नागरिक की अभिव्यक्ति की आजादी, सोशल मीडिया पर चलने वाले स्वस्थ व्यंग्य या फिर सरकार और न्यायपालिका की लोकतांत्रिक आलोचना के खिलाफ कतई नहीं है. यह याचिका मुख्य रूप से अदालती कार्यवाही के जानबूझकर किए जा रहे बेजा इस्तेमाल, डिजिटल ट्रोलिंग और न्याय के मंदिर को व्यापारिक लाभ के लिए नोट छापने की मशीन बनाने वाली प्रवृत्तियों को रोकने के लिए लाई गई है. याचिका में साफ मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट की लाइव स्ट्रीमिंग या अदालती कार्यवाही के वीडियो का इस तरह का कमर्शियल और भ्रामक इस्तेमाल रोकने के लिए सख्त और स्पष्ट गाइडलाइन बनाई जानी चाहिए ताकि कोई भी अदालती गरिमा को अपनी कमाई का जरिया न बना सके.
केंद्र सरकार को भी पक्षकार बनाने की मांग
मामले की गंभीरता और इसके दूरगामी असर को देखते हुए इस याचिका में केंद्र सरकार, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को औपचारिक रूप से पक्षकार बनाया गया है. याचिका में शीर्ष अदालत से गुहार लगाई गई है कि वह सीधे सीबीआई (CBI) को इस पूरे मामले में एफआईआर (FIR) दर्ज कर एक विस्तृत और स्वतंत्र जांच करने का निर्देश दे. इसमें फर्जी लॉ डिग्रियों के सिंडिकेट से लेकर सोशल मीडिया पर न्यायपालिका को बदनाम करने वाले संगठित कॉकरोच जनता पार्टी कैंपेन के पीछे छिपे चेहरों, इस ट्रेंड को हवा देने वाले हैंडलर्स और उनकी पूरी फंडिंग की कड़ियों को भी गहराई से खंगालने की बात कही गई है ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके.