रवि मिश्रा कोल गैसीकरण के बाद बचनेवाली राख अब देश के करोड़ों रु. बचाएगी। सीएसआईआर-सिंफर के वैज्ञानिकों ने इस बेकार समझी जाने वाली राख से नाइट्रोजन युक्त उर्वरक (फर्टिलाइजर) बनाने में बड़ी कामयाबी हासिल की है। इस नई तकनीक से भारत को जल्द ही विदेशी यूरिया और इसके कच्चे माल के आयात से बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। कोयला मंत्रालय ने इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है, जो दो साल में पूरा होगा। संस्थान के निदेशक प्रो. एके मिश्रा के मार्गदर्शन में अब वैज्ञानिक इस तकनीक को लैब स्तर से आगे बढ़ाकर बेंच स्केल (5 किलो प्रति बैच) पर तैयार करने की तैयारी कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट को लीड कर रहे वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आरई मास्टो ने बताया कि कोल इंडिया व कोयला मंत्रालय के हैकथॉन में विजेता बनने के बाद सिंफर को यह अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है। सामान्य यूरिया से अधिक होगी क्षमता बाजार में मिलने वाले सामान्य कॉमर्शियल यूरिया की कार्यक्षमता काफी कम होती है। खेतों में 100 किलो यूरिया डालने पर पौधों को केवल 35 से 40 किलो ही मिल पाता है और करीब 60% बर्बाद हो जाता है। इसके विपरीत, सिंफर द्वारा तैयार किया जाने वाला यह नया फर्टिलाइजर अधिक प्रभावी होगा और इसकी बर्बादी भी कम होगी। गौरतलब है कि भारत अपनी जरूरत का 30% यूरिया सीधे विदेशों से आयात करता है। इसके अलावा, देश में बनने वाले यूरिया के लिए कच्चा माल (नेचुरल गैस) भी विदेश से ही मंगाना पड़ता है। यह स्वदेशी फर्टिलाइजर आयात पर देश की निर्भरता को काफी हद तक कम कर देगा।
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