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“चुने तो आप ही लोगों ने हैं…” रांची छात्र आंदोलन में पुलिसकर्मी...


रांची. झारखंड की राजधानी रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में जेपीएससी-जेएसएससी रिफॉर्म मंच (JPSC-JSSC Reforms Manch) के बैनर तले छात्रों का आंदोलन 19वें दिन भी जारी रहा. छात्र भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, पारदर्शिता की कमी और परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहे हैं. उनकी प्रमुख मांगों में 14वीं JPSC परीक्षा समेत कुछ परीक्षाओं को रद्द करना और भर्ती प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच शामिल है. हालांकि, छात्रों का यह आंदोलन अब सिर्फ एक परीक्षा का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह राज्य की भर्ती व्यवस्था पर युवाओं के भरोसे का सवाल बन चुका है.

दरअसल, इस विवाद का सबसे बड़ा पेंच सरकार और छात्रों के दावों के बीच है. सरकार का कहना है कि उसने प्रदर्शनकारियों की करीब 98 प्रतिशत मांगें मान ली हैं. JPSC की तीन परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला भी इसी क्रम में हुआ है. लेकिन छात्र इस दावे से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि उनकी सबसे महत्वपूर्ण मांगों में से CBI जांच अब भी पूरी नहीं हुई है. छात्रों के मुताबिक 13 परीक्षाओं को लेकर मांग की गई थी, लेकिन सिर्फ तीन परीक्षाएं रद्द हुई हैं. ऐसे में अब यहीं से सवाल उठता है कि किसी आंदोलन की सफलता का पैमाना सरकार की ओर से बताए गए प्रतिशत को माना जाए या आंदोलनकारियों की मूल मांगों को… इस बीच खबर यह है कि अनशनकारी छात्रों को धरना स्थल से हटाने पर सरकार आमादा हो गई है.

10 अगस्त का विधानसभा मार्च और फिर टकराव

बीते 10 अगस्त को छात्रों ने विधानसभा घेराव के लिए मार्च किया. बैरिकेडिंग तोड़ने की कोशिश के बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए वाटर कैनन, आंसू गैस और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया. प्रदर्शनकारियों और पुलिस दोनों की ओर से चोट लगने के दावे सामने आए. इसके बाद आंदोलन का मुद्दा परीक्षा सुधार से आगे बढ़कर पुलिस कार्रवाई और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध के अधिकार तक पहुंच गया. यानी अब सरकार के सामने दो सवाल हैं. पहला, भर्ती परीक्षाओं पर उठ रहे संदेह को कैसे दूर किया जाए. दूसरा, आंदोलन कर रहे छात्रों के साथ संवाद और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए.

10 अगस्त को प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने झारखंड विधानसभा को घेर लिया था.

“चुने तो आप ही लोगों ने हैं” का असली मतलब क्या है?

अब बात उस पुलिसकर्मी के वायरल वीडियो की … 10 अगस्त को छात्रों के हंगामे के दौरान एक पुलिसकर्मी और प्रदर्शनकारी (वीडियो में प्रदर्शनकारी छात्रा की आवाज सुनाई देती है) के बीच तीखी बातचीत कैद हुई. प्रदर्शनकारी तरफ से कुछ इस अंदाज में कहा जा रहा था कि “यही राज दिखाने के लिए चुने थे…” इसका मतलब यह है कि क्या इसी तरह की व्यवस्था और सरकार दिखाने के लिए वोट दिए थे? इस पर पुलिसकर्मी का जवाब आता है-‘अरे चुने हो आप ही लोग ना…’ या “आप ही सरकार चुने हो, हम थोड़ी चुनते हैं”… मतलब साफ है कि पुलिसकर्मी कह रहा है कि सरकार जनता ने चुनी है, पुलिस तो आदेश का पालन कर रही है.

अब यह क्लिप सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है. इसमें सुनाई देने वाली यह कथित बातचीत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें लोकतंत्र की एक बुनियादी उलझन दिखाई देती है. पुलिसकर्मी अगर यह कह रहा है कि सरकार आपने चुनी है और पुलिस सिर्फ अपना काम कर रही है, तो तकनीकी तौर पर उसकी बात का एक अर्थ है. पुलिस प्रशासन सरकार के आदेश और कानून के तहत काम करता है.

लेकिन यहीं दूसरा सवाल पैदा होता है. जनता सरकार को सिर्फ पांच साल में एक बार वोट देने के लिए नहीं चुनती. जनता की भूमिका चुनाव के बाद खत्म नहीं हो जाती. लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार की जवाबदेही लगातार जनता, विधानसभा, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक समाज के प्रति बनी रहती है.

इसलिए “सरकार तो आपने ही चुनी है” लोकतंत्र का जवाब नहीं हो सकता. यह अधिक से अधिक प्रशासनिक भूमिका की व्याख्या हो सकती है. सरकार के फैसलों पर सवाल उठाना और उनका जवाब मांगना जनता का अधिकार है.

हेमंत सोरेन सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि वह सामान्य प्रशासन और पुलिस के जरिये प्रदर्शनकारी छात्रों पर दबाव बना रही है.

रांची और दिल्ली के आंदोलन में बड़ा अंतर…

बीते दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर में कॉक्रोच जनता पार्टी (Cockroach Janta Party) यानी CJP के नेतृत्व में छात्रों का आंदोलन हुआ था. वहां आंदोलन की प्रमुख मांगों में तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, परीक्षा से जुड़े मुद्दों पर कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने जैसी मांगें शामिल थीं. कई दौर की बातचीत के बाद केंद्र और आंदोलनकारियों के बीच सहमति बनी और आंदोलन वापस लिया गया. हालांकि, रांची का आंदोलन उससे अलग है. यहां मूल विवाद राज्य की भर्ती परीक्षाओं और JPSC-JSSC की कार्यप्रणाली को लेकर है. बदले परिदृश्य में अब राजनीतिक दल भी आंदोलन के समर्थन में उतर आए हैं, लेकिन छात्रों की मुख्य लड़ाई परीक्षा व्यवस्था में भरोसा बहाल करने की है.

लोकतंत्र में असली परीक्षा सरकार और छात्रों दोनों की

लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़े सवालों में उलझा रांची का आंदोलन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले हजारों युवाओं के लिए परीक्षा सिर्फ एक परीक्षा नहीं होती. इसमें वर्षों की मेहनत, पैसा और उम्र की सीमा जुड़ी होती है. अगर परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा टूटता है तो उसका असर सिर्फ एक रिजल्ट पर नहीं पड़ता, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर पड़ता है.

JPSC-JSSC आंदोलन में सरकार और छात्रों के बीच अभी नहीं बनी सहमति.

हालांकि, सरकार ने कुछ मांगें मानी हैं, तीन परीक्षाएं रद्द की हैं और बातचीत भी की है. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि सरकार ने कुछ किया ही नहीं. लेकिन छात्रों का आंदोलन 19वें दिन भी जारी है, इसका मतलब है कि सरकार की ओर से किए गए उपाय छात्रों का भरोसा पूरी तरह बहाल नहीं कर पाए हैं… और यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक सवाल है…. जानकारी के अनुसार अब छात्रों को जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम से हटाने की तैयारी की जा रही है… बिजली कनेक्शन काट लिया गया है… जेनरेटर हटा लिया गया है, और अब प्रदर्शनकारियों को जबरन हटाया जा सकता है. सवाल यहां भी खड़ा होता है…

जनता सरकार चुनती है, लेकिन सरकार चुनने के बाद जनता सवाल पूछना बंद नहीं करती, और जब सवाल युवाओं के भविष्य से जुड़ा हो तो जवाब सिर्फ यह कहकर खत्म नहीं किया जा सकता कि “चुना तो आपने ही है”… पुलिसकर्मी का सवाल कि “चुने तो आप लोगों ने ही हैं”… दरअसल, जनता का शासन जनता के द्वारा और जनता के लिए चुनी गई व्यवस्था पर ही सवाल खड़ा करता है. झारखंड का यह आंदोलन केवल जेपीएससी-जेएसएससी परीक्षा घोटला का ही नहीं, अब लोकतंत्र की बुनियादी भावना और चुनी हुई सरकार की जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है!



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