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भास्कर न्यूज| सरायकेला विश्व प्रसिद्ध सरायकेला छऊ नृत्य की परंपरा को जीवित रखने के लिए कलाकारों का समर्पण एक मिसाल बनकर सामने आया है। पिछले तीन वर्षों से बिना किसी आर्थिक सहायता के राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र, सरायकेला में कलाकार निरंतर अभ्यास और प्रशिक्षण के माध्यम से छऊ संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन में जुटे हैं। जानकारी के अनुसार, केंद्र में कार्यरत सभी स्थायी कलाकारों एवं कर्मचारियों के सेवानिवृत्त होने के बाद इसकी गतिविधियां पूरी तरह ठप हो गई थीं। केंद्र में ताला लग गया था। वर्ष 2024 में सरायकेला छऊ आर्टिस्ट एसोसिएशन के प्रयास और जिला प्रशासन के सहयोग से केंद्र को पुनः खोला गया। इसके बाद कलाकारों ने बिना किसी आर्थिक सहयोग के नियमित अभ्यास शुरू किया। केंद्र के संचालन की जिम्मेदारी जिला प्रशासन ने छऊ कलाकार सुदीप कुमार कवि को अवैतनिक समन्वयक के रूप में सौंपी। उनके नेतृत्व में वर्ष 2025 एवं 2026 के चैत्र पर्व सह छऊ महोत्सव का सफल आयोजन भी हुआ। वर्तमान में केंद्र में वरिष्ठ गुरु, अनुभवी कलाकार और युवा कलाकार मिलकर शैक्षणिक वातावरण तैयार कर रहे हैं। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ गुरु ब्रजेन्द्र पटनायक प्रतिदिन युवा कलाकारों को छऊ नृत्य का प्रशिक्षण दे रहे हैं। आसपास के 4 से 5 किलोमीटर दूर स्थित गांवों से भी युवा कलाकार नियमित रूप से प्रशिक्षण लेने पहुंच रहे हैं। गुरु ब्रजेन्द्र पटनायक ने कहा कि नई पीढ़ी को छऊ कला से जोड़ना उनकी प्राथमिकता है। एसोसिएशन के अध्यक्ष शशांक शेखर महंती ने बताया कि प्रशिक्षु कलाकारों ने हाल के छऊ महोत्सव में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। संरक्षक मनोज कुमार चौधरी ने कहा कि कलाकारों के उत्थान और आर्थिक सहायता के लिए कला, संस्कृति विभाग से लगातार संपर्क किया जा रहा है। जल्द सकारात्मक परिणाम मिलने की उम्मीद है। राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र में इन दिनों युवाओं का उत्साह देखने लायक है। सरायकेला शहर के अलावा आसपास के गांवों से भी युवा कलाकार प्रतिदिन 4 से 5 किलोमीटर की दूरी तय कर केंद्र पहुंच रहे हैं। वे छऊ नृत्य व वादन का प्रशिक्षण ले रहे हैं। कलाकारों का मानना है कि यह केंद्र उन्हें अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझने और आगे बढ़ाने का अवसर दे रहा है। केंद्र में वरिष्ठ गुरु एवं संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित ब्रजेन्द्र पटनायक युवा कलाकारों को नियमित प्रशिक्षण दे रहे हैं। उनके मार्गदर्शन में प्रशिक्षु छऊ नृत्य की बारीकियों के साथ पारंपरिक वादन कला भी सीख रहे हैं। प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे कलाकारों ने हाल ही में आयोजित चैत्र पर्व सह छऊ महोत्सव में भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया था। इसकी सराहना हुई। कलाकारों का कहना है कि छऊ केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि सरायकेला की सांस्कृतिक पहचान है। यही कारण है कि नई पीढ़ी इसे सीखने और आगे बढ़ाने के लिए लगातार केंद्र से जुड़ रही है। केंद्र का यह वातावरण क्षेत्र में छऊ कला के भविष्य के लिए नई उम्मीद जगा रहा है।
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