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झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर चुनाव:गठबंधन रहे साथ तो जीत...




निर्वाचन आयोग द्वारा राज्यसभा की 24 सीटों पर चुनाव की घोषणा कर दी गई है। इसके साथ ही झारखंड की दो सीटों को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इनमें एक सीट शिबू सोरेन के निधन के बाद खाली हुई है, जबकि दूसरी सीट दीपक प्रकाश का कार्यकाल पूरा होने से रिक्त होगी। चुनावी कार्यक्रम के अनुसार 1 जून को अधिसूचना जारी होगी, 8 जून तक नामांकन और 11 जून तक नाम वापसी की प्रक्रिया चलेगी। 18 जून को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक मतदान और उसी दिन शाम 5 बजे से मतगणना होगी। इस घोषणा के साथ ही राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति पर काम तेज कर दिया है, क्योंकि दोनों सीटों का गणित सीधा नहीं बल्कि गठबंधन और समीकरणों पर निर्भर है। JMM-कांग्रेस रहे साथ तो जीत पक्की झारखंड विधानसभा में कुल 81 सदस्य हैं, जहां एक उम्मीदवार की जीत के लिए 28 वोट जरूरी हैं। मौजूदा स्थिति में सत्तारूढ़ महागठबंधन के पास 56 विधायकों का मजबूत आंकड़ा है। इसमें झामुमो, कांग्रेस, राजद और वाम दल शामिल हैं। इस आधार पर अगर गठबंधन एकजुट होकर चुनाव लड़ता है तो दोनों सीटों पर उसकी जीत लगभग तय मानी जा रही है। हालांकि चुनौती तब पैदा होगी, जब घटक दल अलग-अलग उम्मीदवार उतारते हैं। ऐसी स्थिति में वोट बंटने का खतरा बढ़ जाएगा। जीत का समीकरण बिगड़ सकता है। राज्य में चुनाव के चार समीकरण को जानें… 1. महागठबंधन के पास दो सीट के लिए पर्याप्त संख्या बल सत्तारूढ़ इंडिया गठबंधन के पास कुल 56 वोट हैं। ऐसे में अगर मिलकर चुनाव लड़े तो आसानी से दोनों सीटें निकाल सकता है। क्योंकि एक प्रत्याशी को जीत के लिए 28 वोटों की जरूरत है। ऐसे में प्रयास होगा कि मिलकर लड़े। क्योंकि अलग-अलग पार्टियों के प्रत्याशी उतारने पर दोनों सीटों पर जीत की राह मुश्किल हो जाएगी। 2. झामुमो अकेले लड़ा तो दूसरी सीट के लिए और 22 चाहिए झामुमो के पास कुल 34 सीट है। जबकि दो सीटों के लिए 56 वोट की जरूरत होगी। ऐसे में अगर झामुमो दो प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उत्तारता है तो एक सीट पर तो जीत पक्की है। लेकिन दूसरी सीट फंस जाएगी। क्योंकि उसके पास सिर्फ छह वोट ही बचेंगे। उसे और 22 वोटों की जरूरत पड़ेगी, जो जुटाना मुश्किल होगा। झामुमो महासचिव सुप्रियो भ‌ट्टाचार्य ने कहा कि दोनों सीटों पर गठबंधन का प्रत्याशी होगा। गठबंधन की बैठक में इसका फैसला होगा। 3. कांग्रेस अकेले लड़ी तो कठिन होगी राह विधानसभा में कांग्रेस के 16 विधायक हैं। एक सीट के लिए 28 विधायकों की जरूरत है। ऐसे में अगर कांग्रेस अलग से प्रत्याशी उतारती है तो अकेले दम पर जीतना मुश्किल होगा। क्योंकि उसे 12 और विधायकों की जरूरत होगी। ऐसे में गठबंधन में दरार आ सकती है। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी के राजू ने कहा कि कांग्रेस-झामुमो एक-एक सीट पर प्रत्याशी देगा। सीएम से जल्दी बात करेंगे। 4. अगर भाजपा प्रत्याशी उतारे तो रोचक होगा चुनाव झारखंड विधानसभा में एनडीए के पास कुल 24 वोट हैं। वहीं अकेले भाजपा के पास 21 वोट हैं। ऐसे में एनडीए प्रत्याशी को जीत के लिए चार वोट कम पड़ेंगे। वैसे जेएलकेएम फिलहाल किसी पार्टी के साथ नहीं है। ऐसे में अगर भाजपा उसे भी साथ लेती है तो भी तय वोट से तीन वोट पीछे रह जाएगी। इससे चुनाव रोचक हो जाएगा। भाजपा प्रदेश महामंत्री अमर बाउरी ने कहा कि चुनाव में भाजपा अपना प्रत्याशी उतारेगी और जीत जरूर होगी।्र अब आंकड़ों की समझें कहानी राज्यसभा चुनाव में विधानसभा की दलगत स्थिति सत्तारूढ़ महागठबंधन के पक्ष में साफ बढ़त दिखाती है, जहां 81 सदस्यीय सदन में एक सीट के लिए 28 वोट जरूरी हैं और सत्ता पक्ष के पास कुल 56 विधायक हैं। झामुमो (34), कांग्रेस (16), राजद (4) और भाकपा माले (2) के इस संयुक्त आंकड़े के आधार पर दोनों सीटों पर जीत आसान मानी जा रही है, बशर्ते गठबंधन एकजुट रहे। दूसरी ओर विपक्ष की स्थिति कमजोर है, जहां भाजपा के 21 और सहयोगियों को मिलाकर कुल 24 विधायक ही हैं, जो एक सीट के लिए भी पर्याप्त नहीं हैं। हालांकि जेएलकेएम के एक विधायक का रुख और संभावित क्रॉस वोटिंग मुकाबले को दिलचस्प बना सकती है। 2008 में प्रथम वरीयता के एक वोट कम पाकर भी जीते थे नाथवानी वर्ष 2008 के राज्यसभा चुनाव में भाजपा के जेपीएन सिंह प्रथम वरीयता के 35 वोट लेकर आसानी से जीत गए थे। दूसरी सीट के लिए निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवाणी को प्रथम वरीयता के 16 और आरके आनंद को 17 वोट मिले थे। इसके बावजूद नाथवाणी ने दूसरी वरीयता के वोटों के आधार पर आरके सिंह से बाजी छीन ली थी। खास बात यह थी कि झामुमो के 17 विधायक होने के बाद भी उसके उम्मीदवार किशोरी लाल को सिर्फ आठ बोट ही मिले थे। हमारी प्राथमिकता में सबसे ऊपर रहता है झारखंड झारखंड से 2008 और 2014 में निर्दलीय राज्यसभा सांसद रहे परिमल नाथवाणी अभी आंध्र प्रदेश से वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के राज्यसभा सदस्य हैं। उनका कार्यकाल भी अब पूरा होने वाला है। दैनिक भास्कर से बात करते हुए नाथवाणी ने कहा कि उनकी प्राथमिकता सूची में झारखंड सबसे ऊपर है। वे एक बार फिर झारखंड लौटना चाहेंगे।



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