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झुंझुनूं के इस गांव ने कर दिखाया कमाल! जनसहयोग से करोड़ों जुटाकर...


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Jhunjhunu Hindi News: झुंझुनूं जिले का एक गांव आज जनसहयोग और सामुदायिक भागीदारी का अनूठा उदाहरण बनकर उभरा है. गांव के लोगों ने विकास कार्यों के लिए केवल सरकारी योजनाओं पर निर्भर रहने के बजाय आपसी सहयोग और जनभागीदारी का रास्ता चुना. ग्रामीणों ने मिलकर करोड़ों रुपये की राशि जुटाई और गांव में सड़क, पेयजल, शिक्षा, सामुदायिक भवन, धार्मिक स्थल तथा अन्य बुनियादी सुविधाओं का विकास कराया. इसके परिणामस्वरूप गांव की तस्वीर पूरी तरह बदल गई और यह क्षेत्र अन्य गांवों के लिए प्रेरणा का केंद्र बन गया है. ग्रामीणों की एकजुटता और विकास के प्रति समर्पण ने साबित कर दिया कि सामूहिक प्रयासों से बड़े बदलाव संभव हैं. आज यह गांव न केवल आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है.

Jhunjhunu News: झुंझुनूं जिले का भोड़की गांव केवल एक साधारण ग्रामीण नहीं, बल्कि जनसहयोग और सामाजिक एकता का उदाहरण है. गुढ़ागौड़जी क्षेत्र में स्थित यह गांव करीब 550 वर्षों का गौरवशाली इतिहास अपने भीतर समेटे हुए है. यहां के लोगों ने विकास के लिए कभी केवल सरकार पर निर्भर रहने की बजाय स्वयं आगे बढ़कर योगदान दिया और अपने गांव की तस्वीर बदलने का संकल्प लिया. इसी सोच ने भोड़की को पूरे राजस्थान में एक मॉडल के रूप में स्थापित किया है.

भोड़की गांव के विकास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां करोड़ों रुपये के विकास कार्य जनसहयोग से किए गए हैं. गांव में लगभग 5 करोड़ रुपये की लागत से विकसित की गई गोशाला और करीब 80 लाख रुपये की लागत से तैयार खेल मैदान इसकी सबसे बड़ी मिसाल हैं. ग्रामीणों ने बिना किसी बड़े सरकारी बजट का इंतजार किए आपसी सहयोग, दान और सामूहिक प्रयासों से इन परियोजनाओं को साकार किया. यही कारण है कि आज भोड़की आत्मनिर्भर गांव के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुका है.

गांव का इतिहास भी बेहद रोचक और गौरवशाली रहा है. स्थानीय निवासी राजकुमार सैनी के अनुसार प्राचीन समय में यहां भोड़ा गुर्जर नाम का एक ग्वाला निवास करता था. उस दौर में नवाबों का शासन था. वर्ष 1735 में शार्दूल सिंह के पुत्र जोरावर सिंह ने भोड़ा गुर्जर की सहायता से नवाब को पराजित कर इस क्षेत्र में अपना शासन स्थापित किया. इस घटना के बाद इस स्थान को भोड़ा की बस्ती के नाम से जाना जाने लगा, जिसने आगे चलकर भोड़की का स्वरूप धारण कर लिया.

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समय के साथ भोड़की गांव का विस्तार हुआ और इसका प्रशासनिक महत्व भी बढ़ा. पहले इसे भोड़ाकी कहा जाता था, लेकिन धीरे-धीरे लोगों की बोलचाल में इसका नाम भोड़की हो गया. वर्तमान में भोड़की एक पंचायत मुख्यालय है, जिसके अंतर्गत बड़ापाना, कचौलिया जोहड़, ढाब जोहड़ और धमाणा जोहड़ जैसे कई राजस्व गांव शामिल हैं. शिक्षा और प्रशासनिक सुविधाओं की बात करें तो यहां आजादी से पहले वर्ष 1932 में पुलिस चौकी स्थापित हो चुकी थी और वर्ष 1936 में विद्यालय भी शुरू हो गया था.

गांव में स्थित जमवाय ज्योति गोशाला सामाजिक सेवा और गौसंरक्षण का बड़ा केंद्र बन चुकी है. गोशाला के अध्यक्ष शिवराम गोदारा के अनुसार वर्ष 2015 में ग्रामीणों और भामाशाहों के सहयोग से इसकी स्थापना की गई थी. स्थापना के बाद से लेकर अब तक गोशाला के विकास, पशुओं की देखभाल, भवन निर्माण और अन्य सुविधाओं पर 5 करोड़ रुपये से अधिक राशि खर्च की जा चुकी है. यह गोशाला न केवल क्षेत्र में गौसेवा का केंद्र है, बल्कि जनसहयोग की शक्ति का भी जीवंत उदाहरण मानी जाती है.

खेलों के क्षेत्र में भी भोड़की गांव ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है. गांव के युवाओं को बेहतर खेल सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विकसित किए गए खेल मैदान पर अब तक लगभग 80 लाख रुपये खर्च किए जा चुके हैं. स्टेडियम समिति के अध्यक्ष हरलाल गढ़वाल बताते हैं कि यह पूरा कार्य ग्रामीणों और दानदाताओं के सहयोग से संभव हुआ है. इस मैदान के बनने से गांव के युवाओं को खेल प्रतिभा निखारने का अवसर मिला है और कई खिलाड़ी विभिन्न प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बना रहे हैं.

भोड़की गांव की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान जमवाय माता मंदिर से जुड़ी हुई है. मान्यता है कि गांव के धमाणा जोहड़ में माता का शिला स्वरूप प्राकृतिक रूप से धरती से प्रकट हुआ था. इसके बाद श्रद्धालुओं की आस्था बढ़ी और धामाराम द्वारा यहां मंदिर का निर्माण करवाया गया. मंदिर के निकट स्थित धमाणा तालाब भी धार्मिक महत्व रखता है. आज जमवाय माता मंदिर भोड़की की पहचान बन चुका है और नवरात्र के दौरान यहां लगने वाले मेले में देशभर से हजारों श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं.

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