![]()
ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ सत्य और अहिंसा का रास्ता टाना भगतों का आंदोलन था। यह आज भी किसी न किसी रूप में जारी है। अब भी झारखंड के टाना भगत महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानते हैं। तिरंगे की पूजा करते हैं। वे झूठ नहीं बोलते। सात्विक जीवन जीने में विश्वास रखते हैं। टाना भगतों का यह आंदोलन चिंगारी से शुरू हुआ। यह इतना प्रभावशाली हुआ कि महात्मा गांधी भी इसके मुरीद हुए। झारखंड में चलने वाले तमाम हथियारबंद विद्रोहों के समानांतर टाना भगतों का अहिंसात्मक सत्याग्रह आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ चले संघर्ष के इतिहास का नया अध्याय खोलता है। मुंडा समुदाय के लोग विभिन्न इलाकों में हथियारबंद विद्रोह के जरिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद को चुनौती दे रहे थे। दूसरी तरफ टाना भगत सत्य और अहिंसा के बलबूते अंग्रेजों से लड़ रहे थे। गुमला जिले के विभिन्न इलाकों में टाना आंदोलन के नेता बुधू भगत थे। बुधू भगत पर अंग्रेजों ने उस जमाने में एक हजार रुपये का इनाम रखा था। अंग्रेजों के कप्तान इम्पे ने उन्हें गिरफ्तार किया। इसी आंदोलन के क्रम में सत्याग्रही टाना भगतों पर अंग्रेजों की गोली चली। कई लोग मारे गए। इसके बाद पिठोरिया, रांची के तत्कालीन कमिश्नर टॉमस विलकिंसन के कैंप को भगतों ने घेर लिया। 20वीं सदी में पहले जतरा उरांव का जन्म गुमला के बिशुनपुर प्रखंड अंतर्गत चिंगरी गांव में हुआ था। कुछ लोग जतरा टाना भगत को टाना आंदोलन का जनक मानते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि उनसे पहले टाना आंदोलन के जनक बुधू भगत थे। जतरा भगत के स्मारक स्थल के शिलालेख में जो अंकित है। उसके आधार पर उनका जन्म 1888 में हुआ। आज भी टाना भगत सत्य – अहिंसा के मार्ग पर चलते हैं। जतरा ने तुलसी और तिरंगा पूजा का मंत्र दिया जतरा ने अपने अनुयायों को तुलसी पूजा, तिरंगा पूजा, जनेउ धारण व झूठ नहीं बोलने का मंत्र दिया। इसी की अलख जगाते-जगाते टाना भगत के अनेकों अनुयायी बन गए। इससे अंग्रेज घबरा गए। अभियोग लगाकर उन्हें गिरफ्तार किया गया। डेढ़ वर्ष की सजा हुई। सजा काट निकलने के बाद जतरा बीमार हो गए। उनकी मौत बीमार अवस्था में 1916 ईस्वी को हुई।
Source link