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भास्कर न्यूज|गुमला दीपावली और छठ जैसे महापर्व नजदीक हैं। बाजार सजने लगे हैं। लेकिन जिनके बनाए दीयों से घर-आंगन रोशन होते हैं, उन्हीं कुम्हार परिवारों के घरों में आज भी मायूसी का अंधेरा पसरा है। गुमला जिले में करीब 20 हजार परिवार पीढ़ियों से मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने के पारंपरिक कारोबार से जुड़े हैं। लेकिन बढ़ती लागत और घटते मुनाफे ने उनके अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। गुमला के टोटो गांव के संदीप प्रजापति, संतोष प्रजापति, शिवा प्रजापति व रामकिशोर प्रजापति कहते हैं कि जितनी मेहनत पूरा परिवार मिलकर करता है, उतनी लागत भी नहीं निकल पाती। यह दर्द सिर्फ इनका नहीं है। यह पूरे जिले के कुम्हारों का है। आंकड़े चौंकाने वाले हैं। वर्ष 2016-17 में एक ट्रैक्टर चिकनी मिट्टी 500 से 600 रुपए में मिल जाती थी। अब वही मिट्टी 3,000 से 4,000 रुपए में मिल रही है। 100 दीये बनाने की लागत, जो पहले 25 से 30 रुपए थी, अब 200 रुपए तक पहुंच गई है। ईंधन, कोयला और जलावन की कीमतें भी कई गुना बढ़ गई हैं। पहले जो जलावन खेत-खलिहानों से मुफ्त मिल जाता था, अब उसे भी खरीदना पड़ रहा है। शहरी क्षेत्रों में रहने वाले कुम्हारों की परेशानी और भी अधिक है। पहले गुमला में बने मिट्टी के दीयों और बर्तनों की मांग झारखंड के कई जिलों में रहती थी। छठ के दौरान यहां से ट्रक भरकर बर्तन बाहर भेजे जाते थे। अब वह मांग भी आधी रह गई है। नतीजतन, हजारों परिवार इस पैतृक व्यवसाय को छोड़कर मजदूरी करने को मजबूर हो गए हैं।
बाजार में चीनी झालरों और इलेक्ट्रिक लाइटों की बाढ़ ने मिट्टी के दीयों की मांग को बुरी तरह प्रभावित किया है। पहले चीनी लाइटें सिर्फ शहरों में बिकती थीं। अब वे गांव-गांव तक पहुंच गई हैं। संदीप प्रजापति कहते हैं कि वे हर बार उम्मीद के साथ सामान तैयार करते हैं। लेकिन दीपावली से पहले मौसम खराब हो जाए, तो सारी मेहनत पर पानी फिर जाता है। जिले के गुमला, टोटो, सिसई, घाघरा, चैनपुर, भरनो, बसिया, पालकोट समेत सभी प्रखंडों में कुम्हार परिवारों ने दीपावली को लेकर तैयारी शुरू कर दी है। सरकार की ओर से फिलहाल कुछ जगहों पर इलेक्ट्रिक चाक दिए गए हैं। कुम्हारों का कहना है कि इससे काम तेज होता है। लागत कम नहीं होती। उनकी दो मुख्य मांगें हैं। पहली, मिट्टी के लिए मटखान आवंटित किया जाए। दूसरी, बर्तन पकाने के लिए जलावन पर अनुदान दिया जाए। जिला कुम्हार संघ के अध्यक्ष राजू प्रजापति ने कहा कि गुमला जिले में कुम्हार समाज की संख्या 15 से 20 हजार है। बसिया और गुमला में कुम्हारों की संख्या अधिक है। दिवाली की तैयारी में ‘अर्नव’ तूफान बाधा बन रहा है। कुम्हारों ने पहले से तैयारी कर रखी थी। अंतिम समय के काम में तूफान से बाधा उत्पन्न हो रही है। जो कच्ची मिट्टी के दीये बन गए हैं, उन्हें पकाने में दिक्कत हो रही है। मौसम खुलेगा, तो उन्हें पका कर बाजारों में बिक्री के लिए भेजा जाएगा। उन्होंने बताया कि वर्ष 2024-25 में 5 से 7 लाख रुपए की बिक्री का आकलन हुआ था। वहीं इस वर्ष 26-27 में 8 से 9 लाख रुपए होने की उम्मीद है।
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