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देवताओं की स्तुति से शुरू होती है धान रोपनी, लोकगीत गाकर महिलाएं...


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देवताओं की स्तुति से शुरू होती है धान रोपनी, लोकगीत गाकर महिलाएं रोपती हैं खेत

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आगे कहा कि धान रोपनी की शुरुआत हमेशा देवताओं की स्तुति से होती है. सबसे पहले धरती माता और भगवान का स्मरण कर उनसे अच्छी बारिश, भरपूर पैदावार और गांव की खुशहाली की प्रार्थना की जाती है. इसके बाद अवसर के अनुसार भक्ति, मनोरंजन, प्रेम और लोकजीवन से जुड़े अलग-अलग गीत गाए जाते हैं. उनके अनुसार यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी गांवों में पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है.

महिलाओं ने बताया कि आठ महिलाएं मिलकर लगभग दो घंटे में एक बीघा खेत की धान रोपाई पूरी कर देती हैं. इसके बदले उन्हें लगभग तीन हजार रुपये मजदूरी मिलती है. आधुनिक खेती और मशीनों के बढ़ते उपयोग के बावजूद पलामू के गांवों में धान रोपनी के दौरान गाए जाने वाले ये लोकगीत आज भी ग्रामीण संस्कृति की पहचान बने हुए हैं.

यह परंपरा केवल खेती का हिस्सा नहीं, बल्कि लोक जीवन, सामूहिक श्रम और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का एक जीवंत माध्यम भी है. भारत देश एक कृषि प्रधान देश है और यहां खेती सिर्फ जीविकोपार्जन का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति और परंपराओं का अभिन्न हिस्सा भी है. देश के अलग-अलग क्षेत्रों में खेती से जुड़ी अपनी-अपनी लोक परंपराएं हैं.

झारखंड के पलामू जिले में भी धान की रोपाई के दौरान महिलाओं द्वारा लोकगीत गाने की सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवंत है. खेतों में धान की पौध रोपते समय गूंजने वाले ये गीत न केवल श्रम को आसान बनाते हैं, बल्कि लोक संस्कृति, आस्था और सामाजिक जीवन की झलक भी प्रस्तुत करते हैं.

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बता दे कि धान की रोपाई के दौरान महिलाएं समूह बनाकर एक साथ काम करती हैं और पूरे समय लोकगीत गाती रहती हैं. जहां इन गीतों में कभी भगवान से अच्छी फसल की प्रार्थना होती है, तो कभी परिवार की खुशहाली और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है.

जबकि कई गीतों में पति-पत्नी का प्रेम, रिश्तों की मिठास, सामाजिक संदेश और लोक जीवन के विविध रंग भी देखने को मिलते हैं. ग्रामीण की माने तो भक्ति और सकारात्मक भावनाओं के साथ रोपी गई फसल घर-परिवार में सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा लेकर आती है.

पलामू जिले के चैनपुर प्रखंड स्थित पूरबडीह गांव में धान की रोपाई कर रही महिलाओं ने बताया कि यह परंपरा उन्हें अपनी मां, दादी और नानी से विरासत में मिली है. आज भी नई पीढ़ी की महिलाएं इन्हीं गीतों को गाकर इस सांस्कृतिक धरोहर को आगे बढ़ा रही हैं। दुखनी कुंवर ने लोकल18 को बताया कि गीत गाने से लंबे समय तक लगातार काम करने के बावजूद थकान कम महसूस होती है और पूरे खेत का माहौल उत्साह से भर जाता है.



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