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धान की फसल से चाहते हैं ज्यादा पैदावार, तो अपनाएं यह सिंपल...


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धान की फसल से चाहते हैं ज्यादा पैदावार, तो अपनाएं यह सिंपल सी तकनीक

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शिव शंकर वर्मा बताते हैं कि डीएसआर तकनीकी कम सिंचित क्षेत्र के किसानों के लिए बेहतर तकनीकी होने के साथ ही भूगर्भ जल बचाओ की दिशा में एक बेहतर तकनीकी है.यह तकनीकी कम सिंचित क्षेत्रों के साथ ही पानी की अधिकता वाले क्षेत्र के लिए भी बेहद उपयोगी है. 

रायबरेली: खरीफ का सीजन चल रहा है. धान इस सीजन की मुख्य फसल मानी जाती है. किसान धान की खेती की तैयारी में जुटे हुए हैं क्योंकि धान की खेती के लिए सबसे पहले धान की नर्सरी तैयार की जाती है. नर्सरी तैयार होने के बाद फसल की रोपाई की जाती है. परंतु कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पानी की भारी कमी होने के चलते धान की खेती करना किसानों के लिए काफी कठिन होता है. इस समस्या से निजात दिलाने के लिए कृषि विशेषज्ञ अब किसानों को पारंपरिक धान की रोपाई के बजाय धान की खेती की एक नई तकनीक के प्रति जागरूक कर रहे हैं, जिसमें कम लागत और कम पानी की आवश्यकता होती है. किसान यदि इस तकनीक से धान की खेती करते हैं तो गिरते भूजल स्तर को बचाने में भी मदद मिलेगी.

धान की बुवाई कौन सी टेक्निक से करें

दरअसल, रायबरेली जिले के राजकीय कृषि केंद्र शिवगढ़ के प्रभारी कृषि अधिकारी शिव शंकर वर्मा (बीएससी एग्रीकल्चर, डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद) ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि धान की खेती करने वाले किसान पारंपरिक रोपाई के बजाय अब धान की सीधी बुवाई “DSR (Direct Seeded Rice)” तकनीक से खेती करें तो यह उनके लिए अत्यधिक लाभकारी होगी. इस तकनीक से किसानों का खर्च कम होगा और मेहनत भी कम लगेगी. यह तकनीक पानी की बचत करने के साथ-साथ खेती की लागत घटाकर किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक है. उन्होंने बताया कि डीएसआर विधि से खेती करने पर पारंपरिक रोपाई की तुलना में दो से तीन सिंचाई की बचत होती है. साथ ही खेत में पानी भरने की आवश्यकता नहीं होती है. खेत में केवल पर्याप्त नमी होने पर भी इस तकनीक के तहत धान की बुवाई करके किसान अच्छी उपज प्राप्त कर सकते हैं.

पारंपरिक तरीके से रोपाई और बुवाई में अंतर

पारंपरिक तरीके से धान की खेती में नर्सरी तैयार करनी पड़ती है और लगभग 25 से 30 दिनों बाद रोपाई की जाती है, जिसमें समय, मेहनत और लागत अधिक लगती है. इसके विपरीत, सीधी बुवाई में केवल खेत में हल्की नमी की आवश्यकता होती है. इसमें धान के बीज सीधे खेत में बोए जाते हैं, जिससे समय और लागत दोनों की बचत होती है.

कम सिंचित क्षेत्रों के लिए वरदान

शिव शंकर वर्मा ने बताया कि डीएसआर तकनीक कम सिंचित क्षेत्रों के किसानों के लिए बेहतर है और यह भूगर्भ जल संरक्षण की दिशा में एक प्रभावी तकनीक है. यह तकनीक कम सिंचित क्षेत्रों के साथ-साथ अधिक जल उपलब्धता वाले क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी है.

कतारबद्ध बुवाई जरूरी

डीएसआर तकनीक से धान की खेती करने के लिए कतारबद्ध बुवाई करना आवश्यक है. इसके लिए बाजार में डीएसआर मशीनें उपलब्ध हैं, जिनकी मदद से बीज की बुवाई की जा सकती है. इससे एक ही बार में कई हेक्टेयर भूमि पर बुवाई संभव हो जाती है, जिससे समय, मेहनत और लागत दोनों की बचत होती है.

About the Author

Vivek Kumar

विवेक कुमार एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वर्तमान में न्यूज 18 हिंदी के साथ जुड़े हैं और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लोकल खबरों पर नजर रहती है. इसके अलावा इन्हें देश-…और पढ़ें



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