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धान के खेत को कीट-पतंगों से निजात दिलाती हैं गौरैया, फसल बचाने...


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धान के खेत को कीट-पतंगों से निजात दिलाती हैं गौरैया, किसानों का देसी जुगाड़

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Paddy Pest Control: जब वैज्ञानिक तरीके नहीं थे तब किसान अपनी फसलों को कीट-पतंगों से सुरक्षित रखने के लिए पारंपरिक तरीके अपनाते थे. इन्हीं में से एक है धान के खेत में भेला के पत्ते लगा देना. किसानों का कहना है कि गौरेया इन पर अपना घर बनाती हैं और कीट-पतंगों को खा लेती हैं. अगर समस्या बहुत नहीं बढ़ी है तो ये उपाय कर सकते हैं.

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पलामू. भारत देश के किसान सदियों से पारंपरिक तरीके से खेती करते आ रहे हैं. जहां पहले से चली आ रही खेती की परंपराएं और देशी उपाय कहीं न कहीं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी लाभदायक साबित होते हैं. यही वजह है कि किसानों के अनुभव और उनकी पारंपरिक तकनीक आज भी खेती में काफी उपयोगी मानी जाती है. मानसून के सीजन में मौसम खुला हो और गौरैया अचानक धूल में लोटने लगे, तो गांव के किसान इसे बारिश आने का संकेत मानते हैं.

जहां किसानों के अनुभव के मुताबिक गौरैया का इस तरह धूल में नहाना मौसम में बदलाव और बारिश की संभावना की ओर इशारा करता है. पीढ़ियों से किसान प्रकृति और पक्षियों के व्यवहार को देखकर मौसम का अंदाजा लगाते आए हैं.

कीट-पतंगे नियंत्रित करने का प्राकृतिक तरीका
पर्यावरणविद डॉक्टर कौशल किशोर जायसवाल ने बताया कि धान की खेती में भी किसानों के पास कई ऐसे देसी उपाय हैं, जिन्हें वे वर्षों से अपनाते आ रहे हैं. वैज्ञानिक तरीके से खेती में फसल को कीट-पतंगों से बचाने के लिए दवाओं के छिड़काव की सलाह दी जाती है. लेकिन कई किसान कीटों को नियंत्रित करने के लिए प्रकृति पर आधारित एक अलग तरीका अपनाते हैं.

भेला के पत्ते लगा देते हैं
उन्होंने कहा कि जब धान का पौधा फूटने लगता है और खेत में नई हरियाली आने लगती है, उस समय किसानों को कीट-पतंगों के बढ़ने की आशंका रहती है. ऐसे में किसान भेला के पत्ते को उसके डंठल के साथ बांधकर खेत में जगह-जगह लगा देते हैं. पहली नजर में यह तरीका सामान्य दिखाई देता है, लेकिन इसके पीछे एक खास सोच होती है.

गौरेया इन पर बैठकर करती हैं आराम
आगे कहा कि भेला के पत्ते खेत में चिड़ियों के बैठने के लिए एक तरह का प्राकृतिक ठिकाना बन जाते हैं. गौरैया और दूसरी छोटी चिड़ियां इन पत्तों पर बैठकर आराम करती हैं. इसके बाद वे खेत में मौजूद छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़ों को अपना भोजन बनाती हैं. इससे किसान को उम्मीद रहती है कि खेत में मौजूद कुछ हानिकारक कीटों की संख्या कम होगी और फसल को नुकसान से बचाने में मदद मिलेगी.

प्राकृतिक उपाय भी कारगर
उन्होंने कहा कि यह तरीका बिना किसी अतिरिक्त खर्च के प्रकृति को खेती का हिस्सा बनाता है. हालांकि, यह हर तरह के कीट नियंत्रण का वैज्ञानिक विकल्प नहीं है और गंभीर प्रकोप की स्थिति में कृषि विशेषज्ञ की सलाह जरूरी है. फिर भी किसानों की यह पारंपरिक समझ दिखाती है कि खेती सिर्फ मशीन और दवाओं से नहीं, बल्कि प्रकृति और उसके व्यवहार को समझकर भी की जाती है.

About the Author

Raina Shukla

Raina Shukla is an experienced journalist and content professional with nearly two decades of experience in print and digital media. She holds a Master’s degree in Mass Communication and Journalism from Bundelk…

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