भास्कर न्यूज| चाईबासा पति की मृत्यु के बाद जीवन बीमा का दावा खारिज करना बीमा कंपनी को महंगा पड़ गया। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने मामले की सुनवाई करते हुए बीमा कंपनी की ओर से बीमारी छिपाने और महत्वपूर्ण तथ्य का खुलासा नहीं करने के आरोप को साक्ष्य के अभाव में अस्वीकार कर दिया। आयोग ने शिकायतकर्ता को बीमा पॉलिसी की बीमित राशि 5 लाख रुपए, मानसिक प्रताड़ना के लिए 50 हजार तथा मुकदमा खर्च के रूप में 10 हजार रुपए देने का आदेश दिया है। आदेश का पालन 45 दिनों के भीतर करने को कहा गया है। निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं करने पर बीमित राशि पर निर्णय की तिथि से वसूली तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा। मामला चाईबासा की रंजीता गुप्ता ने केनारा एचएसबीसी लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के विरुद्ध दायर किया था। शिकायतकर्ता के पति रघुबीर भारती ने जनवरी 2024 में जीवन बीमा पॉलिसी ली थी। उन्होंने प्रथम प्रीमियम के रूप में 1.25 लाख रुपए जमा किए थे। इसके कुछ ही समय बाद 27 फरवरी 2024 को 44 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद पत्नी ने बीमा दावा प्रस्तुत किया। कंपनी ने कथित रूप से बीमारी और स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने का आरोप लगाते हुए दावा खारिज कर दिया। मामले की सुनवाई के दौरान बीमा कंपनी की ओर से कहा गया कि मृतक पूर्व में किडनी और लीवर संबंधी बीमारियों का इलाज करा रहा था। उसने प्रस्ताव पत्र में इन तथ्यों का खुलासा नहीं किया था। हालांकि, आयोग के समक्ष इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस चिकित्सकीय दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया। आयोग ने उपचार संबंधी दावा अपने आप में बीमारी छिपाने का प्रमाण नहीं हो सकता। बीमा कंपनी पर कथित बीमारी और उसके छिपाए जाने को स्पष्ट एवं विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित करने का दायित्व था। कंपनी यह दायित्व पूरा नहीं कर सकी।
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