भारत में मानसून दस्तक दे चुका है और तेजी से आगे बढ़ते हुए महाराष्ट्र तक पहुंचा चुका है. ऐसे में सभी को अब इस बात का इंतजार है कि उनके इलाके तक मानसून कब पहुंचेगा. हालांकि इस बार मौसम विज्ञानी सामान्य से कम बारिश की आशंका जता रहे हैं. देश में जब भी कमजोर मानसून, सूखे की आशंका या सामान्य से अधिक गर्मी की चर्चा होती है, तब एक शब्द बार-बार सुनाई देता है. वह शब्द है एल नीनो (El Niño)… मौसम वैज्ञानिकों से लेकर आम लोगों तक इस नाम से अब काफी परिचित हो चुके हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस वैश्विक मौसमीय घटना को समझने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती खोज भारत में हुई थी और उसका सीधा संबंध भारतीय मौसम विभाग (IMD) से है.
आज एल नीनो और ला नीना दुनिया भर के मौसम को प्रभावित करने वाली सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक घटनाओं में गिने जाते हैं, लेकिन इस पूरी कहानी की शुरुआत करीब एक सदी पहले भारत से हुई थी, जब एक वैज्ञानिक भारतीय मानसून के रहस्यों को समझने की कोशिश कर रहा था.
आखिर क्या है एल नीनो?
एल नीनो दरअसल एक बड़े वैश्विक जलवायु तंत्र का हिस्सा है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में एल नीनो सदर्न ऑसिलेशन (ENSO) कहा जाता है. यह प्रशांत महासागर और उसके ऊपर मौजूद वायुमंडलीय परिस्थितियों के बीच होने वाली जटिल प्रक्रिया है, जो पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित करती है. एल नीनो की स्थिति में दक्षिण अमेरिका के तटों के पास प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है. इसका असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया के कई देशों में बारिश, तापमान और मौसम के पैटर्न बदल जाते हैं. भारत में आमतौर पर एल नीनो को कमजोर मानसून से जोड़ा जाता है, जबकि अमेरिका और कुछ अन्य क्षेत्रों में यह अधिक वर्षा का कारण बन सकता है. इसके उलट स्थिति को ला नीना कहा जाता है, जब समुद्र का तापमान सामान्य से कम हो जाता है और इसका प्रभाव एल नीनो के विपरीत देखने को मिलता है.
भारत से कैसे शुरू हुई इस खोज की कहानी?
एल नीनो की वैज्ञानिक समझ विकसित होने से कई दशक पहले भारतीय मौसम विभाग मानसून की भविष्यवाणी को अधिक सटीक बनाने की कोशिश कर रहा था. बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश गणितज्ञ और वैज्ञानिक सर गिल्बर्ट वॉकर को भारतीय मौसम विभाग का प्रमुख बनाया गया. उन्होंने 1904 से 1924 तक करीब 21 वर्षों तक इस पद पर काम किया. उस समय मानसून की भविष्यवाणी भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी, क्योंकि देश की कृषि और अर्थव्यवस्था काफी हद तक बारिश पर निर्भर थी.
एल नीनो जहां भारत में सूखा लाता है, जबकि ला नीना में मूसलाधार बारिश होती है.
वॉकर ने अपने अध्ययन के दौरान महसूस किया कि भारतीय मानसून को केवल भारत की सीमाओं के भीतर होने वाली मौसमी गतिविधियों से नहीं समझा जा सकता. इसके पीछे दुनिया के अन्य हिस्सों में होने वाले बड़े मौसमीय बदलाव भी जिम्मेदार हो सकते हैं. उन्होंने उस दौर में उपलब्ध मौसम संबंधी आंकड़ों का गहन अध्ययन शुरू किया. यह काम आसान नहीं था, क्योंकि तब कंप्यूटर जैसी आधुनिक तकनीक मौजूद नहीं थी और सारी गणनाएं तथा विश्लेषण मैन्युअल तरीके से किए जाते थे.
एक क्षेत्र में दबाव बढ़ा तो दूसरे में हो गया कम
अपने शोध के दौरान वॉकर ने एक बेहद दिलचस्प पैटर्न देखा. उन्होंने पाया कि प्रशांत महासागर के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में वायुदाब झूले की तरह ऊपर-नीचे होता रहता है. जब एक क्षेत्र में दबाव बढ़ता है तो दूसरे हिस्से में कम हो जाता है. इस प्रक्रिया को उन्होंने ‘सदर्न ऑसिलेशन’ नाम दिया. यही वह खोज थी जिसने आगे चलकर एल नीनो और ला नीना को समझने की नींव रखी. वॉकर ने यह भी पाया कि सदर्न ऑसिलेशन का भारतीय मानसून से गहरा संबंध है और इसका प्रभाव भारत में होने वाली वर्षा पर पड़ सकता है.
हालांकि उस समय तक यह स्पष्ट नहीं था कि समुद्र और वायुमंडल के बीच यह संबंध वास्तव में कैसे काम करता है. बाद में 1960 के दशक में नॉर्वे-अमेरिकी मौसम वैज्ञानिक जैकब ब्येर्कनेस ने इस रहस्य को सुलझाया. उन्होंने साबित किया कि सदर्न ऑसिलेशन और एल नीनो वास्तव में एक ही बड़े जलवायु तंत्र के दो हिस्से हैं. दक्षिण अमेरिका के पेरू और इक्वाडोर के मछुआरे सदियों से समुद्र के तापमान में होने वाले इन बदलावों को जानते थे, लेकिन वैज्ञानिक रूप से यह पहली बार साबित हुआ कि समुद्र के तापमान और वायुमंडलीय दबाव के बीच सीधा संबंध है. ब्येर्कनेस ने दिखाया कि समुद्र और वायुमंडल एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं और यही प्रक्रिया ENSO प्रणाली का निर्माण करती है.
कैसे खुला एल नीनो का रहस्य?
इस खोज के बाद वैज्ञानिकों को पहली बार यह समझ में आया कि एल नीनो और ला नीना जैसी घटनाएं केवल किसी एक क्षेत्र का मामला नहीं हैं, बल्कि पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित करती हैं. एल नीनो के दौरान पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ने की प्रवृत्ति रहती है. भारत, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में बारिश कम हो सकती है, जबकि उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के कई हिस्सों में भारी वर्षा हो सकती है. ला नीना के दौरान आमतौर पर इसके विपरीत प्रभाव देखने को मिलते हैं.
सदर्न ऑसिलेशन की खोज ने भारतीय मानसून की वैज्ञानिक समझ को नई दिशा दी, लेकिन इसके बावजूद मानसून की सटीक भविष्यवाणी करना आसान नहीं हुआ. मानसून दुनिया की सबसे जटिल मौसम प्रणालियों में से एक माना जाता है. इसका संबंध केवल एल नीनो या ला नीना से नहीं होता, बल्कि हिंद महासागर के तापमान, अरब सागर की स्थितियों, पश्चिमी विक्षोभ, हिमालयी क्षेत्र की गतिविधियों और कई अन्य कारकों से भी होता है. यही कारण है कि एल नीनो और मानसून के बीच संबंध हमेशा एक जैसा नहीं रहता.
पूर्वानुमान की चुनौतियों के कारण भारतीय मौसम विभाग ने 1932 से 1988 के बीच पूरे देश के लिए मानसून का पूर्वानुमान जारी करना लगभग बंद कर दिया था. उस दौरान केवल उत्तर-पश्चिम भारत और प्रायद्वीपीय क्षेत्रों के लिए सामान्य अनुमान दिए जाते थे. तब बारिश का प्रतिशत नहीं बताया जाता था, बल्कि ‘सामान्य से थोड़ा अधिक’ या “सामान्य के करीब” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता था.
भारत के मानसून पर कितना असर पड़ता है?
साल 1988 में भारतीय मौसम विभाग ने फिर से पूरे देश के लिए मानसून का पूर्वानुमान जारी करना शुरू किया. इसके बाद मौसम विज्ञान के क्षेत्र में तकनीकी क्रांति आई. उपग्रहों, डॉप्लर रडार, सुपरकंप्यूटर और आधुनिक कंप्यूटर मॉडल की मदद से पूर्वानुमान लगातार बेहतर होते गए. आज भारतीय मौसम विभाग पहले की तुलना में कहीं अधिक सटीक तरीके से मानसून का अनुमान लगाने में सक्षम है.
हालांकि तकनीक के विकास के साथ नई चुनौतियां भी सामने आई हैं. जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया भर में मौसम के चरम रूप देखने को मिल रहे हैं. अचानक आने वाली बाढ़, बादल फटना, लंबे समय तक चलने वाली हीटवेव और अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं. अब केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि कुल बारिश कितनी होगी, बल्कि यह समझना भी जरूरी है कि बारिश कब होगी, कितनी तीव्र होगी और किस क्षेत्र में उसका सबसे अधिक असर पड़ेगा.
एल नीनो, मानसून और IMD की ऐतिहासिक खोज
एल नीनो क्या है?
एल नीनो प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में होने वाली एक जलवायु घटना है, जिसमें दक्षिण अमेरिका के तट के पास समुद्र का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है. इसका असर दुनिया भर के मौसम और बारिश के पैटर्न पर पड़ता है.
एल नीनो का भारत पर क्या प्रभाव पड़ता है?
एल नीनो आमतौर पर भारतीय मानसून को कमजोर करता है, जिससे देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश हो सकती है.
एल नीनो के विपरीत स्थिति को क्या कहते हैं?
इसे ला नीना (La Niña) कहा जाता है. इसमें प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से ठंडा हो जाता है और अक्सर भारत में अच्छी बारिश की संभावना बढ़ जाती है.
आज मानसून पूर्वानुमान पहले से कितना बेहतर है?
आधुनिक कंप्यूटर मॉडल, सैटेलाइट, रडार नेटवर्क और उन्नत डेटा विश्लेषण की मदद से IMD के दीर्घकालिक पूर्वानुमान पहले की तुलना में काफी अधिक सटीक हो गए हैं.
आज जब एल नीनो और ला नीना की चर्चा वैश्विक स्तर पर होती है, तब यह याद रखना भी जरूरी है कि इस वैज्ञानिक समझ की नींव भारत में रखी गई थी. करीब सौ साल पहले भारतीय मौसम विभाग में बैठे एक वैज्ञानिक ने वायुदाब के उस रहस्यमय उतार-चढ़ाव को पहचाना था, जिसने आगे चलकर पूरी दुनिया को मौसम की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक प्रक्रियाओं में से एक को समझने का रास्ता दिखाया. यही वजह है कि एल नीनो की कहानी केवल मौसम विज्ञान की कहानी नहीं है, बल्कि भारत के उस वैज्ञानिक योगदान की भी कहानी है जिसने वैश्विक जलवायु अध्ययन को नई दिशा दी.