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भास्कर न्यूज|लोहरदगा मौसम में बदलाव के साथ सर्दी, खांसी, बुखार, सांस संबंधी परेशानियों से पीड़ित मरीजों की मुश्किलें बढ़ने लगी हैं। ऐसे समय में जिले के सबसे बड़े स्वास्थ्य केंद्र, लोहरदगा सदर अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्था खुद कई समस्याओं से जूझ रही है। चिकित्सकों, लैब टेक्नीशियन, नर्सिंग स्टाफ की कमी के कारण मरीजों को इलाज, जांच के लिए परेशान होना पड़ रहा है। अस्पताल में पहले से ही सीमित संसाधनों के बीच मरीजों का इलाज किया जा रहा है। ऐसे में मौसमी बीमारियों के मरीजों का दबाव बढ़ने से स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका है। सदर अस्पताल में चिकित्सकों के कुल 32 पद स्वीकृत हैं। वर्तमान में केवल 17 डॉक्टर कार्यरत हैं। इनमें अधिकांश सामान्य चिकित्सक हैं। सर्जन, रेडियोलॉजिस्ट, नेत्र विशेषज्ञ सहित कई विशेषज्ञ चिकित्सकों के पद लंबे समय से खाली हैं। अभी मौसम में बदलाव के कारण बीमार पड़ने वाले मरीजों की संख्या बढ़ गई है। बीते एक सप्ताह से 300 से 350 मरीज प्रतिदिन इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। सीमित चिकित्सकों की वजह से समय पर विशेषज्ञ परामर्श, बेहतर इलाज मिलने में परेशानी होती है। वहीं, गंभीर मरीजों को जरूरत के अनुसार दूसरे अस्पतालों में रेफर करना पड़ता है।
अस्पताल में लैब टेक्नीशियन के 15 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल छह तकनीशियन कार्यरत हैं। एक्स-रे विभाग में चार पद स्वीकृत हैं। यहां एक ही तकनीशियन के भरोसे काम चल रहा है। ऐसे में खून, पेशाब, अन्य जरूरी जांच कराने वाले मरीजों को परेशानी उठानी पड़ती है। अल्ट्रासाउंड मशीन उपलब्ध होने के बावजूद विशेषज्ञ की कमी के कारण जांच सेवा प्रभावित रहती है। सीटी स्कैन, एमआरआई जैसी सुविधाएं भी अस्पताल में उपलब्ध नहीं हैं। नर्सिंग स्टाफ की कमी भी अस्पताल की व्यवस्था को प्रभावित कर रही है। यहां 80 नर्सों के स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 40 नर्सें कार्यरत हैं। अस्पताल में रोजाना औसतन 400 से 500 मरीज ओपीडी में इलाज कराने पहुंचते हैं। मौसम में बदलाव के दौरान मरीजों की संख्या बढ़ने पर डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ पर काम का दबाव और बढ़ सकता है। मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ता है। गंभीर स्थिति में तत्काल उपचार की जरूरत होती है। अस्पताल में जरूरी जांच की सुविधा नहीं मिलने पर मरीजों को निजी जांच केंद्रों या रांची का रुख करना पड़ता है। सीटी स्कैन के लिए करीब 3200 रुपए, अल्ट्रासाउंड के लिए 800 से 900 रुपए, एमआरआई के लिए 2000 से 5000 रुपए तक खर्च करने पड़ सकते हैं। इससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारी अस्पताल में बेहतर इलाज, जरूरी जांच की सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए। मरीजों को दूसरे शहरों में भटकना नहीं पड़े। सिविल सर्जन डॉ. राजू कच्छप ने बताया कि चिकित्सकों, अन्य कर्मियों की कमी को दूर करने के लिए कई बार विभाग से मांग की गई है। हालांकि, अब तक इस संबंध में कोई जवाब नहीं मिल पाया है। फिलहाल उपलब्ध संसाधनों, मैनपावर के आधार पर अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है।
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