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सुल्तानपुर में करिया बझना बाबा, बगहा बाबा, मरी माई धाम में मन्नत...


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सुल्तानपुर में करिया बझना बाबा, बगहा बाबा और मरी माई धाम में मन्नत पूरी होने पर घंटियां बांधी जाती हैं. करिया बझना बाबा का यह स्थल बहुत बड़ा नहीं है लेकिन यहां पर मौजूद नीम का पेड़ कई सौ साल पुराना है. स्थानीय लोग बताते हैं कि उनकी कई पीढ़ियों ने इस पेड़ को देखा है. यहां पर जिन लोगों की मांगी गई मन्नत पूरी होती है वह यहां गंटी बांधते हैं.

यूं तो करिया बझना बाबा का यह स्थल बहुत बड़ा नहीं है लेकिन यहां पर मौजूद नीम का पेड़ कई सौ साल पुराना है. स्थानीय लोग बताते हैं कि उनकी कई पीढ़ियों ने इस पेड़ को देखा है. यहां पर जिन लोगों की मांगी गई मन्नत पूरी होती है वहां वे लोग आकर चढ़ावे में घंटियां बांधते हैं. ऐसे में यहां पर हजारों घंटियां अभी तक बांधी जा चुकी हैं.

सुल्तानपुर मुख्यालय से लगभग 24 किलोमीटर दूर अंबेडकर नगर रोड की ओर मुड़ने पर करिया बजाना बाबा का या धार्मिक स्थल मिल जाता है वैसे तो यहां पर प्रत्येक मंगलवार को सैकड़ो की संख्या में श्रद्धालु दर्शन और पूजन करते हैं लेकिन अगहन माह के मंगलवार और आषाढ़ माह के मंगलवार को यहां पर भव्य मेले और भंडारे का भी आयोजन किया जाता है जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु भागीदार बनते हैं.

मंदिर के पुजारी राम सुंदर बताते हैं कि करिया बझना बाबा का यह धार्मिक स्थल लगभग 400 से 500 साल पुराना है. उनकी कई पीढ़ी इस स्थल को देखते हुए चली आ रही है ऐसी मान्यता है कि गांव में जिस भी व्यक्ति की शादी होती है. बारात जाने से पहले वह करिया बझना बाबा का दर्शन जरूर करता है तभी शादी संपन्न हो पाती है.

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सुल्तानपुर में बगहा बाबा का धाम अत्यंत निराला है. जहां लोग मानते हैं कि यहां दर्शन करने से लोगों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। वैसे तो यह मंदिर, निर्माण के दौरान काफी विवादों में रहा। इसलिए इसका ऐतिहासिक दृष्टिकोण जानना काफी महत्वपूर्ण हो जाता है। बगहा बाबा के आशीर्वाद से जिन लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती है वह यहां पर घंटी चढ़ते हैं या फिर मनोकामनाओं की आकांक्षा से घंटी चढ़ाने का कार्य करते हैं।

सुल्तानपुर के लंभुआ तहसील में एक ऐसा धाम है जहां लगभग 10 हजार से अधिक घंटे बंधे हैं और इस धाम का नाम है मरी माई . इस धाम के नाम के पीछे भी एक रोचक कहानी है. लोगों की मान्यता है कि यहां नीम की पहली पीढ़ी में जगदम्बा माता प्रकट हुई थी. जो आज भी लोगों का कल्याण करती हैं. इसी वजह से इस धाम में भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं और दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.

मरी माई धाम में प्रकट हुई जगदंबा माता को दिलेश्वरी माता के नाम से जाना जाता है. अयोध्या प्रसाद दुबे जी बताते हैं कि इस मंदिर में आने वाला कोई भी भक्त खाली हाथ वापस नहीं होता. मां दिलेश्वरी उसकी मनोकामनाएं जरूर पूर्ण करती हैं.

मरी माई धाम अथवा पापर धाम में वर्तमान में मौजूद नीम का पेड़ दूसरी पीढ़ी का पेड़ है. मंदिर के पुजारी अयोध्या प्रसाद दुबे बताते हैं कि पहली पीढ़ी के नीम का पेड़ साल 1961 में गिर गया था जिसके बाद उसी स्थान पर दूसरी पीढ़ी का पेड़ तैयार किया गया है। जो लगभग 63 साल पुराना हो चुका है.

वैसे तो भौतिक रूप से मां काली का यह स्थल बहुत बड़ा नहीं है लेकिन यहां पर मौजूद नीम का पेड़ कई साल पुराना है. स्थानीय लोग बताते हैं कि उनकी कई पीढ़ियों ने इस पेड़ को देखा है. यहां पर जिन लोगों की मांगी गई मन्नत पूरी होती है वहां वे लोग आकर चढ़ावे में घंटियां बांधते हैं. कराही चढ़ाते हैं.

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