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Palamu Ajab Gajab News: झारखंड में पलामू के मेदिनीनगर में करीब 900 से 1000 साल पुराना अफ्रीकी बाओबाब अडानसोनिया डिजिटाटा पेड़ है. यह जल संरक्षण और धार्मिक आस्था का बड़ा केंद्र बन गया है. आइये जानते हैं इस दुर्लभ पेड़ के बारे में.
झारखंड के पलामू जिले में एक ऐसा दुर्लभ वृक्ष मौजूद है, जिसने वैज्ञानिकों से लेकर स्थानीय लोगों तक को हैरान कर रखा है. अफ्रीकी प्रजाति का यह वृक्ष अडानसोनिया डिजिटाटा, जिसे अफ्रीकी बाओबाब के नाम से जाना जाता है, पलामू के मेदिनीनगर स्थित नई मोहल्ला इलाके में पाया जाता है. माना जाता है कि यह पेड़ करीब 900 से 1000 साल पुराना है. विशालकाय तना और अनोखी बनावट वाला यह वृक्ष लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. पलामू में इस प्रजाति के केवल गिने चुने तीन पेड़ बताए जाते हैं.
डॉ. डी एस श्रीवास्तव ने लोकल 18 को बताया कि इस पेड़ की सबसे खास बात इसकी जल संरक्षण क्षमता है. मूल रूप से ये पेड़ रेगिस्तान जैसे इलाकों में पाया जाता है. अफ्रीकी बाओबाब अपने मोटे तने में बड़ी मात्रा में पानी जमा करके रखता है. यही कारण है कि जहां यह पेड़ मौजूद होता है, वहां जलस्तर बेहतर रहता है.
साथ ही आगे कहा कि इस पेड़ को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं. कुछ लोग मानते हैं कि समुद्र मंथन के दौरान जो कल्पतरु वृक्ष निकला था. वही यह पेड़ है. इसी वजह से लोग इसे पूजा के रूप में भी देखते हैं. कई श्रद्धालु यहां आकर पेड़ के नीचे समय बिताते हैं और इसे शुभ मानते हैं. धार्मिक आस्था और प्राकृतिक महत्व के कारण यह पेड़ पलामू की पहचान बनता जा रहा है.
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सेसा के द्वारा इस पेड़ को संरक्षण किया जा रहा है. जिसके संस्थापक कौशिक मलिक ने लोकल 18 से बताया कि शोध में यह बात सामने आई थी कि यह वृक्ष मूल रूप से अफ्रीका और दक्षिणी अरब प्रायद्वीप का है. जो कि बहुउद्देशीय वृक्ष है, जिसमें खाद्य, औषधीय और जल संरक्षण जैसी कई विशेषताएं मौजूद हैं. रॉयल सोसाइटी ओपन साइंस में प्रकाशित शोध में बताया गया है कि यह पेड़ अफ्रीकी सवाना क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. पलामू में मौजूद इस वृक्ष को लेकर भी लगातार अध्ययन किए जा रहे हैं.
उन्होंने कहा कि इस अफ्रीकी बाओबाब केवल एक दुर्लभ वृक्ष नहीं, बल्कि जल संरक्षण का प्राकृतिक स्रोत भी है. जिसके जड़ में हीं नही तनों में भी पानी जमा रहता है. यह पेड़ भूजल स्तर को बनाए रखने और उसे शुद्ध करने में मदद करता है. सेसा संस्था ने इस पेड़ के पास एक सूचना बोर्ड भी लगाया है, जिसमें इसके महत्व की जानकारी दी गई है. तेजी से घटते भूजल स्तर और बढ़ते पर्यावरण संकट के बीच यह पेड़ लोगों को प्रकृति संरक्षण का संदेश दे रहा है. यही कारण है कि पलामू का यह रहस्यमयी वृक्ष अब वैज्ञानिकों और पर्यटकों दोनों के आकर्षण का केंद्र बन गया है.
स्थानीय लोग इस पेड़ को ‘कल्पतरु’ के नाम से जानते हैं, जिसका अर्थ होता है इच्छा पूरी करने वाला वृक्ष. हिंदू और बौद्ध धर्म में कल्पतरु का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है. वहीं इस वृक्ष को ‘गोरख इमली’ भी कहा जाता है, क्योंकि इसके फल का स्वाद इमली जैसा होता है. लोगों के बीच यह मान्यता है कि इस वृक्ष के पास आने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है और मनोकामनाएं पूरी होती हैं. इसी वजह से यह पेड़ केवल वनस्पति नहीं, बल्कि आस्था और विश्वास का भी प्रतीक बन चुका है.
वन्यजीव जीवविज्ञानी प्रोफेसर डी. एस. श्रीवास्तव बताते हैं कि इस पेड़ के बीज का बाहरी आवरण बेहद कठोर होता है. इसी कारण इसके बीजों का प्राकृतिक अंकुरण बहुत कम हो पाता है. पहले चमगादड़ जैसे जीव बीजों के फैलाव और अंकुरण में मदद करते थे, लेकिन अब उनकी संख्या घटने से इस प्रजाति का विस्तार भी प्रभावित हुआ है. जलवायु परिवर्तन और पेड़ों के बीच अधिक दूरी भी इसके कम प्रसार की वजह मानी जा रही है. हालांकि वैज्ञानिक इसके संरक्षण और प्रसार के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं.