1971 की बांग्लादेश युद्ध की रात. भारतीय नौसेना और वायुसेना को तेल चाहिए था. भारत में तेल का सारा कारोबार तब अमेरिकी और ब्रिटिश कंपनियों के हाथों में था. इन विदेशी तेल कंपनियों ने ईंधन देने से इनकार कर दिया. क्योंकि ये कंपनियां अमेरिका के हाथों में खेल रही थीं. वही कर रही थीं जो अमेरिका चाहता था. पाकिस्तान उसका मित्र देश था. तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ऐसा कदम उठाया कि युद्ध में तेल की कोई कमी नहीं रहे. बाद में विदेशी तेल कंपनियों की कमर भी तोड़ी.
ये देश की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा बहुत ही संवेदनशील वाकया था. ये घटना भारत के ईंधन संकट और विदेशी तेल कंपनियों की मनमानी से भी जुड़ी है, जिसने भारत सरकार को बहुत बड़ा कदम उठाने के लिए मजबूर किया.
1971 के समय भारत में पेट्रोलियम सेक्टर पर मुख्य रूप से विदेशी कंपनियों का कब्ज़ा था. इनमें अमेरिका की बर्मा शैल, एस्सो और काल्टैक्स जैसी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां शामिल थीं. ओएनजीसी शुरुआती दौर में थी. लिहाजा सेना और देश की ज़रूरत के ईंधन के लिए भारत काफी हद तक इन्हीं विदेशी रिफाइनरियों पर निर्भर था.
आजादी के बाद भारत के तेल सेक्टर पर विदेशी तेल कंपनियों बर्मा शैल, एस्सो और काल्टैक्स का कब्जा था. (News18 AI Image)
जब दिसंबर 1971 में युद्ध छिड़ा तो भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों और नौसेना के युद्धपोतों के लिए ईंधन की मांग अचानक बहुत बढ़ गई. चूंकि अमेरिका उस युद्ध में खुलकर पाकिस्तान का समर्थन कर रहा था. अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर भारत के खिलाफ थे. इसलिए अमेरिकी दबाव में इन विदेशी तेल कंपनियों ने भारतीय सेना को अतिरिक्त तेल की सप्लाई करने से मना कर दिया. आनाकानी शुरू कर दी. उनका तर्क था कि वे युद्ध जैसे हालातों में अपनी सामान्य क्षमता से अधिक तेल रिफाइन या सप्लाई नहीं कर सकते.
तब इंदिरा सरकार और इंडियन ऑयल ने मोर्चा संभाला
विदेशी कंपनियों के इस असहयोग ने भारतीय सेनाओं के सामने एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया. आपातकालीन स्थिति में भारत की अपनी सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) और तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने मोर्चा संभाला. इंडियन ऑयल ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी. युद्धस्तर पर काम करते हुए वायुसेना और नौसेना के ठिकानों तक ईंधन की लगातार सप्लाई सुनिश्चित की.
तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने युद्ध खत्म होने के बाद विदेशी तेल कंपनियों को टेकओवर करने का कानून बनाया. 1974 से 1976 के बीच वो इनके नेशनलाइजेशन के लिए संसद में बिल लेकर आईं. (News18 AI Image)
युद्ध के बाद उठाया ये कदम
भारतीय अधिकारियों और इंजीनियर्स ने दिन-रात काम करके लॉजिस्टिक्स को संभाला ताकि युद्ध के मोर्चे पर एक भी विमान या जहाज ईंधन की कमी से रुकने न पाए. इस घटना ने भारत सरकार की आंखें खोल दीं. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके रणनीतिकारों को समझ आ गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए विदेशी तेल कंपनियों पर निर्भर रहना बेहद खतरनाक है. युद्ध खत्म होने के बाद सरकार ने इन कंपनियों पर नकेल कसने का फैसला किया. बाद में एक कानून बनाकर इंदिरा सरकार ने विदेशी तेल कंपनियों का अधिग्रहण कर लिया.
– एस्सो का अधिग्रहण करके उसे हिंदुस्तान पेट्रोलियम में बदला गया
– बर्मा शैल का राष्ट्रीयकरण कर भारत पेट्रोलियम (BPCL) बनायी गई
– काल्टैक्स को हिंदुस्तान पेट्रोलियम में मिला दिया गया
विदेशी तेल कंपनियों का टेकओवर
1971 का यह वाकया भारत के इतिहास में एक टर्निंग पॉइंट माना जाता है, जिसने देश को पेट्रोलियम क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने और ऊर्जा सुरक्षा को अपने हाथों में लेने के लिए प्रेरित किया. इस ऐतिहासिक घटना का ज़िक्र भारत सरकार के आधिकारिक दस्तावेज़ों, संसदीय बहसों, नीतिगत रिपोर्टों और कई महत्वपूर्ण किताबों में मिलता है.
भारत सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स में स्पष्ट दर्ज़ है कि 1971 के युद्ध के समय विदेशी कंपनियों का रवैया राष्ट्रीय हित के अनुकूल नहीं था. जब 1974 से 1976 के बीच इंदिरा गांधी सरकार इन विदेशी कंपनियों के टेकओवर के लिए संसद में बिल लेकर आई थी, तब बकायदा इसके कारणों में ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ और ‘युद्ध के समय विदेशी कंपनियों के असहयोग’ को मुख्य आधार बनाया गया.
ब्रिटेन ने विरोध दर्ज कराया
जब इंदिरा गांधी ने ब्रिटिश और अमेरिकी तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया तो क्या हुआ. क्या ब्रिटेन और अमेरिका से धमकियां मिलीं. ये एक बड़ा और दिलचस्प सवाल है. ब्रिटिश सरकार ने कूटनीतिक विरोध दर्ज किया. लेकिन खुली धमकी देने की हिम्मत नहीं थी. 70 के दशक की शुरुआत में पूरी दुनिया में राष्ट्रीयकरण की लहर चल रही थी. अल्जीरिया, लीबिया, इराक, सऊदी अरब सभी अपनी-अपनी तेल कंपनियां वापस ले रहे थे. भारत अकेला नहीं था.
खुली धमकियां नहीं दे सकने के बाद पश्चिमी कंपनियों ने मुआवज़े की लड़ाई लड़ी. ये सालों तक खिंची. भारत ने उनकी शर्तों पर नहीं, अपनी शर्तों पर मुआवज़ा दिया.
संसद में तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री के. डी. मालवीय द्वारा दिए भाषणों में ब्योरा है कि युद्ध और संकट के समय ये कंपनियां देश की संप्रभुता के सामने अड़चन बन रही थीं. कई प्रसिद्ध लेखकों, पत्रकारों और इतिहासकारों ने अपनी किताबों में इस घटनाक्रम को विस्तार से लिखा है.
भारत के ‘पेट्रोलियम क्रांति के जनक’ कहे जाने वाले पूर्व मंत्री के. डी. मालवीय के कार्यकाल और उनके निर्णयों पर लिखी गई किताबों में ब्योरा है कि कैसे 1971 में अमेरिकी दबाव के कारण एस्सो ने भारतीय रिफाइनरियों के लिए क्रूड ऑयल लाने और सेना को स्पेशल एविएशन फ्यूल देने में हाथ खड़े कर दिए थे. पूर्व रॉ अधिकारी बी. रमन की किताब “द काव ब्वाएज ऑफ रॉ” (The Kaoboys of R&AW) ने अपनी किताब में इस बारे में लिखा.
देश तो आजाद हुआ लेकिन तेल गोरों के पास था
वैसे इसकी भी कहानी है कि कैसे 1947 में देश तो आजाद हुआ लेकिन तेल पर कंट्रोल विदेशी कंपनियों के पास ही था. आज़ादी के बाद नेहरू सरकार ने देखा कि देश का पूरा तेल उद्योग विदेशी कंपनियों के एकाधिकार में है. ब्रिटिश कंपनियाॉं बर्मा शैल और अमेरिकी कंपनियां स्टैंडर्ड वैकुम और कॉलटैक्स तेल बेचती थीं. कोई स्वदेशी तेल उद्योग लगभग था ही नहीं.
नेहरू ने इन्हीं कंपनियों से भारत में रिफाइनरी बनाने को कहा. पहले तो इन्होंने मना कर दिया. उनका तर्क था कि ईरान के अबादान से तैयार पेट्रोल बेचना ज़्यादा मुनाफ़े का सौदा था, इसलिए भारत में रिफाइनरी बनाने की कोई ज़रूरत नहीं. तब नेहरू सरकार के पेट्रोलियम मंत्री केडी मालवीय की एक चाल ने पूरे खेल को पलट दिया. मालवीय ने 1957 में सोवियत संघ के भूवैज्ञानिकों को भारत बुलाया. ताकि भारत अपना तेल खुद खोज सके. विदेशी कंपनियों पर निर्भरता खत्म हो.
सोवियत एक्सपर्ट्स ने दूसरी पंचवर्षीय योजना के लिए भूगर्भीय सर्वेक्षण और ड्रिलिंग का पूरा खाका तैयार किया. ये कोल्ड वार का दौर था. अमेरिका को ये देखकर झटका लगा कि भारत सोवियत विशेषज्ञों को तेल खोजने के लिए बुला रहा है.
रूसी जहाज डीजल लेकर पहुंचा
17 अगस्त 1960 – भारत की आज़ादी के 13 साल हुए थे. एमवी उझगोरोद नाम का रूसी जहाज़ बंबई के पीर पाऊ जेटी पर लगा. इसमें 11,390 टन डीज़ल था, जो सोवियत संघ से भारत को मिला पहला तेल था. भुगतान रुपया-रूबल में हुआ. एक पैसा डॉलर में नहीं गया. पश्चिमी देशों की तेल कंपनियों को यह खबर लगी तो वे बौखला गईं.
सोवियत संघ की शर्तें पश्चिमी कंपनियों से बेहतर थीं. कम ब्याज़ दर पर उधार और भुगतान रुपए में, डॉलर में नहीं. ये भारत के लिए बड़ी राहत थी क्योंकि उस वक्त डॉलर बहुत कीमती था.