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17 साल नौकरी, फिर एक नोटिस और सेवा समाप्त… 3 साल बाद...


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Jharkhand High Court Verdict: न्यायालय का एक फैसला किसी इंसान की जिंदगी कैसे बदल देता है इसकी बानगी झारखंड में देखने को मिल रहा है. झारखंड हाईकोर्ट से एक ऐसा फैसला आया है जिसने न एक शख्स को बड़ी राहत दी है बल्कि सरकार के निर्णय को असंवेदनशील और अन्यायपूर्ण बताते हुए सवाल भी उठाए हैं.

क्या छोटी गलती पर नौकरी छीन लेना सही है? 3 साल बाद झारखंड HC से मिला इंसाफZoom

झारखंड हाईकोर्ट ने रंजीत कुमार की नौकरी बहाल करने का दिया आदेश

रांची. झारखंड हाईकोर्ट का एक ऐसा ही फैसला सामने आया है, जिसने 17 साल तक संविदा पर नौकरी करने वाले एक चपरासी को बड़ी राहत दी है. चायपत्ती और कुछ बिस्किट घर ले जाने के आरोप में नौकरी गंवाने वाले रंजीत कुमार हिमांशु को अदालत ने न सिर्फ बहाल करने का आदेश दिया, बल्कि सरकार के फैसले को असंवेदनशील और अन्यायपूर्ण भी माना है. झारखंड हाई कोर्ट ने डीआरडीए बोकारो में कार्यरत संविदा चपरासी रंजीत कुमार हिमांशु की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए उन्हें बहाल करने का निर्देश दिया है, जिन्हें कार्यालय से चायपत्ती और बिस्किट घर ले जाने के आरोप में नौकरी से निकाला गया था.

क्या छोटी गलती पर नौकरी छीन लेना न्यायसंगत है?

बता दें कि झारखंड हाई कोर्ट ने बोकारो ग्रामीण विकास अभिकरण (डीआरडीए) में संविदा पर कार्यरत फोर्थ ग्रेड स्टाफ रंजीत कुमार हिमांशु को बड़ी राहत दी है. दरअसल, डीआरडीए बोकारो में चपरासी के तौर पर पिछले 17 सालों से कार्यरत रंजीत कुमार हिमांशु पर कार्यालय से कुछ सामग्री गायब करने और घर ले जाने का आरोप लगा था. इसके बाद 16 मार्च 2022 को उप विकास आयुक्त (डीडीसी), बोकारो की ओर से एक कारण बताओं नोटिस जारी किया गया. नोटिस में कहा गया था कि कार्यालय से कुछ सामग्री गायब हुई है जिसे रंजीत कुमार हिमांशु अपने घर ले गए थे. नोटिस में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि वह सामग्री क्या थी.

झारखंड हाई कोर्ट में सामने आई पूरी कहानी

डीडीसी की नोटिस के बाद 2 मई 2022 को प्रशासन ने एक संक्षिप्त और बिना किसी ठोस कारण के आदेश जारी कर रंजीत की सेवा समाप्त कर दी थी. इसके बाद रंजीत ने इंसाफ के लिए झारखंड हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. वहां रंजीत की ओर से अधिवक्ता कृष्ण प्रजापति में कोर्ट को जानकारी दी कि उनके प्रार्थी कार्यालय में बचे हुए कुछ बिस्किट और कुछ चायपत्ती अपने घर ले गए थे. हालांकि बाद में नोटिस जारी होने के बाद उन्होंने सामग्री लौटा भी दी थी. बावजूद इसके उन्हें नौकरी से हटा दिया गया.

झारखंड उच्च न्यायालय ने क्या कहा?

झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने पिछले गुरुवार को संवेदनशील फैसला सुनाते हुए कार्यालय से चाय पत्ती और बिस्किट घर ले जाने के आरोप में एक संविदा कर्मी (चपरासी) को सेवा मुक्त करने के सरकारी आदेश को निरस्त कर दिया. अदालत ने जिला ग्रामीण विकास अभिकरण (डीआरडीए) बोकारो में कार्यरत चपरासी रंजीत कुमार हिमांशु को सेवा में 10 जुलाई से पहले बहाल करने के साथ ही उसे 30 जुलाई तक 50% पिछला वेतन जारी करने का आदेश दिया है.

तीन साल बाद बड़ी राहत, फैसले का बड़ा संदेश

खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए प्रशासन के रवैये पर कड़ी टिप्पणी की और इसे असंवेदनशीलता से भरा अन्याय करार दिया. आपको बता दें कि रंजीत कुमार हिमांशु 31 दिसंबर 2005 को डीआरडीए बोकारो में संविदा के आधार पर चपरासी के पद पर सेवा दे रहे थे. बहरहाल, यह फैसला केवल एक कर्मचारी की बहाली तक सीमित नहीं है. अदालत ने यह भी स्पष्ट संकेत दिया है कि किसी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई करते समय दंड और आरोप के बीच संतुलन होना चाहिए. यदि गलती छोटी है और उससे सरकारी व्यवस्था को गंभीर नुकसान नहीं पहुंचा है, तो सबसे कठोर सजा देना न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना जा सकता.

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Vijay jha

पत्रकारिता क्षेत्र में 22 वर्षों से कार्यरत. प्रिंट, इलेट्रॉनिक एवं डिजिटल मीडिया में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन. नेटवर्क 18, ईटीवी, मौर्य टीवी, फोकस टीवी, न्यूज वर्ल्ड इंडिया, हमार टीवी, ब्लूक्राफ्ट डिजिट…और पढ़ें



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