रांची. झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव अचानक दिलचस्प हो गया है. कागज पर महागठबंधन के पास दोनों सीटें जीतने लायक संख्या बल मौजूद है, लेकिन भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवानी की एंट्री ने मुकाबले को पूरी तरह बदल दिया है. दरअसल, कागज पर आंकड़े अभी भी महागठबंधन के पक्ष में हैं. लेकिन राजनीति में कई बार चुनाव संख्या से नहीं, संदेश और प्रबंधन से तय होते हैं. यही वजह है कि झारखंड का राज्यसभा चुनाव इस बार सिर्फ दो सीटों का चुनाव नहीं, बल्कि महागठबंधन की एकजुटता और कांग्रेस की संगठनात्मक ताकत की परीक्षा बन गया है. इसी कारण राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा बैद्यनाथ राम या परिमल नथवानी की नहीं, बल्कि प्रणव झा की जीत की राह कितनी आसान या कठिन है, इस पर हो रही है.
दो सीटें, तीन उम्मीदवार और यहीं से शुरू हुआ खेल
झारखंड के इस सियासी उलझन को ऐसे समझिए कि झारखंड से राज्यसभा की दो सीटों पर चुनाव होना है. मैदान में झामुमो के बैद्यनाथ राम, कांग्रेस के प्रणव झा और भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवानी हैं. नथवानी पहले भी झारखंड से राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं और इस बार भाजपा ने अपना उम्मीदवार उतारने के बजाय उन्हें समर्थन देने का फैसला किया है. बस यहीं से मुकाबला सीधा नहीं रहा, क्योंकि अब यह दो सीटों के लिए तीन प्रभावशाली उम्मीदवारों की लड़ाई बन चुका है.
क्या है झारखंड विधानसभा का मौजूदा गणित?
दरअसल, इस पूरे खेल को और बेहतर तरीके से समझने के लिए झारखंड विधानसभा की सीटों के अंकगणित को समझना जरूरी है. झारखंड में राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए किसी भी उम्मीदवार को कम से कम 27 से 28 प्रथम वरीयता (First Preference) के वोटों की आवश्यकता होती है. सदन की मौजूदा स्थिति में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के पास पर्याप्त संख्या बल है, जिससे उनके उम्मीदवार बैद्यनाथ राम की स्थिति पूरी तरह सुरक्षित मानी जा रही है. जेएमएम अपने दम पर अपने उम्मीदवार को जिताने की स्थिति में है. लेकिन, असली पेंच कांग्रेस के हिस्से वाली दूसरी सीट पर आकर फंस गया है.
चुनाव में जीत के लिए कितने वोट चाहिए?
दरअसल, 81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 28 वोटों की जरूरत होती है. दो सीटों के लिए कुल 56 वोट चाहिए. महागठबंधन के पास झामुमो के 34, कांग्रेस के 16, राजद के 4 और माले के 2 विधायक हैं. यानी कुल 56 विधायक. सैद्धांतिक रूप से यह संख्या दोनों उम्मीदवारों को जिताने के लिए पर्याप्त है. लेकिन राजनीति में गणित हमेशा अंकगणित नहीं होता.
ऐसे दिलचस्प बन गया शह-मात का खेल
दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के पास केवल 24 विधायक हैं, जिनमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के 21 सदस्य और लोजपा (रामविलास), आजसू (AJSU) और जदयू (JDU) के एक-एक विधायक शामिल हैं. इसके अतिरिक्त सदन में झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा का भी एक विधायक मौजूद है. इस संख्या बल के हिसाब से दोनों सीटें ‘इंडिया’ गठबंधन के खाते में जानी तय लग रही हैं, लेकिन परिमल नाथवानी के लिए भाजपा पूरा जोर लगाती हुई दिख रही है, ऐसे में सियासी शह-मात का खेल दिलचस्प बन पड़ा है.
प्रणव झा के पास वोटों की भारी कमी
कांग्रेस के पास विधानसभा में अपने विधायकों की संख्या इतनी नहीं है कि वे अकेले दम पर प्रणव झा को राज्यसभा भेज सकें. जेएमएम के अपने उम्मीदवार को सुरक्षित करने के बाद, कांग्रेस के पास गठबंधन के कोटे से पर्याप्त अतिरिक्त वोट नहीं बच रहे हैं. प्रणव झा को जीत दर्ज करने के लिए न केवल जेएमएम के बचे हुए अतिरिक्त वोटों की जरूरत है, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय जनता दल (RJD), वामपंथी दलों (CPI-ML) और निर्दलीय विधायकों के समर्थन पर भी पूरी तरह निर्भर रहना पड़ रहा है. इस बिखरे हुए वोट बैंक को एकजुट रखना कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है.
प्रणव झा के नाम पर क्यों हुआ था विवाद?
यहां यह भी बता दें कि कांग्रेस ने प्रणव झा को उम्मीदवार घोषित किया तो झामुमो के भीतर असहजता दिखाई दी. कुछ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से दोनों सीटों पर झामुमो की दावेदारी जताई थी. यहां तक कि यह भी कहा गया कि कांग्रेस ने उम्मीदवार घोषित करने से पहले पर्याप्त परामर्श नहीं किया. बाद में दोनों दलों के बीच बातचीत हुई और एक-एक सीट पर चुनाव लड़ने का फार्मूला तय हुआ. हालांकि राजनीति के जानकारों का मानना है कि विवाद भले सुलझ गया हो, लेकिन उसने गठबंधन के भीतर मौजूद असहजता को भी उजागर कर दिया.
परिमल नाथवानी की एंट्री और बीजेपी का दांव
इस कमजोर कड़ी को भांपते हुए भारतीय जनता पार्टी ने अपनी रणनीति के तहत निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी को परोक्ष रूप से अपना समर्थन दे दिया है. बीजेपी के पास अपने अतिरिक्त वोट हैं, जो वे नाथवानी के पाले में डाल सकती है. इसके साथ ही परिमल नाथवानी की अपनी मजबूत आर्थिक और राजनीतिक पकड़ रही है, जिसके कारण वे सत्ता पक्ष के असंतुष्ट विधायकों और अन्य निर्दलीयों को अपने पाले में खींचने की क्षमता रखते हैं. बीजेपी समर्थित इस निर्दलीय उम्मीदवार के मैदान में आ जाने से मुकाबले में क्रॉस वोटिंग और हॉर्स ट्रेडिंग की आशंकाएं काफी बढ़ गई हैं.
गठबंधन के भीतर समन्वय की कमी का नुकसान
राजनीति के जानकारों का मानना है कि जेएमएम और कांग्रेस के बीच उम्मीदवारों के चयन को लेकर अंदरूनी तालमेल की कमी रही है. जेएमएम ने पहले ही अपने उम्मीदवार बैद्यनाथ राम की जीत सुनिश्चित कर ली, जिससे कांग्रेस पूरी तरह बैकफुट पर आ गई. प्रणव झा को प्रियंका गांधी का आशीर्वाद तो प्राप्त है, लेकिन झारखंड की स्थानीय जमीनी राजनीति और विधायकों के बीच उनकी स्वीकार्यता वैसी नहीं बन पाई जैसी जरूरत थी. असंतुष्ट विधायक इस स्थिति का फायदा उठाकर पाला बदल सकते हैं, जिसका सीधा नुकसान कांग्रेस उम्मीदवार को उठाना पड़ सकता है.
हार की कगार पर कांग्रेस के संकटमोचक
राजनीति के जानकारों की नजर में मौजूदा जोड़-घटाव और विधायकों के रुख को देखते हुए प्रणव झा के लिए आवश्यक जादुई आंकड़े तक पहुंचना असंभव सा प्रतीत हो रहा है. परिमल नाथवानी को मिलने वाला बीजेपी का खुला समर्थन और अन्य छोटे दलों का झुकाव कांग्रेस के समीकरण को ध्वस्त कर चुका है. यदि अंतिम समय में कोई बड़ा चमत्कार नहीं होता है, तो प्रियंका गांधी के रणनीतिकार प्रणव झा को इस चुनाव में शिकस्त का सामना करना पड़ सकता है. अब इंतजार चुनाव और मतगणना के दिन का है क्योंकि इसी दिन फाइनल तस्वीर समाने आएगी.