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यमुना नदी के किनारे आगरा के किसान कम लागत में कर रहे...


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आगरा में पालक की खेती करने वाले किसान बताते है कि एक एकड़ में तक़रीबन 10 से 15 हजार रूपये की लागत आती है. उन्होंने कहा कि ज़ब पालक की पैदावार शुरू होती है तो एक ही बीज रोपण से चार लांघ पालक काटा जाता है. जिससे उन्हें काफी अच्छा मुनाफा मिलता है. उन्होंने कहा कि जैविक खाद और कुछ कीटनाशक दवाओं का छिड़काव किया जाता है क्यूंकि पालक में जल्दी कीड़ा लगने की संभावना हो जाती है.

आगरा: उत्तर प्रदेश के आगरा में पालक किसान मालामाल हो रहे है. दरअसल पालक की खेती में बेहद कम लागत आती है और इसकी तीन से चार गुना मुनाफा किसानों को मिलता है. इसके अतिरिक्त एक बार बीज रोपण के तीन-चार बार पालक को काटा जाता है. जिससे उन्हें काफी फायदा होता है. आगरा में पालक की खेती कर रहे किसान ने बताया कि उन्हें उनकी फ़सल का लागत मूल्य से अच्छा लाभकारी मूल्य प्राप्त होता है. उन्होंने कहा कि सीजन खत्म होने के बाद भी वह आसानी से अपनी जीविका चला पाते है और फिर सीजन की शुरुआत होते ही खेती में जुट जाते है और अच्छा धन अर्जित करते है.

प्रति एकड़ 10 से 15 हजार आती है लागत

आगरा में पालक की खेती करने वाले किसान बताते है कि एक एकड़ में तक़रीबन 10 से 15 हजार रूपये की लागत आती है. उन्होंने कहा कि ज़ब पालक की पैदावार शुरू होती है तो एक ही बीज रोपण से चार लांघ पालक काटा जाता है. जिससे उन्हें काफी अच्छा मुनाफा मिलता है. उन्होंने कहा कि जैविक खाद और कुछ कीटनाशक दवाओं का छिड़काव किया जाता है क्यूंकि पालक में जल्दी कीड़ा लगने की संभावना हो जाती है. किसान बताते है कि कम लागत और अच्छा मुनाफा होने के कारण आगरा के कई क्षेत्रों में इसकी खेती की जाती है. किसान ने बताया कि खेतो में पालक तैयार होने के बाद उसे सीधे मंडी ले जाया जाता है जहाँ व्यापारी उन्हें उसका अच्छा लाभकारी मूल्य देते है. उन्होंने बताया कि सबसे अच्छी बात यह है कि बीज रोपण के करीब 30 से 40 दिनों में इसकी पैदावार शुरू हो जाती है.

यमुना के किनारे होती है खेती

आगरा में पालक की खेती नदी और यमुना किनारे अधिक मात्रा में की जाती है. किसान बताते है कि वर्तमान में यमुना का पानी दूषित होने कि वजह से फिलहाल वहाँ खेती नहीं की जा रही है. एक समय था कि पहले यमुना किनारे ही पालक को उगाया जाता था. उन्होंने कहा कि आगरा में नदी किनारे और जहाँ जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है. वहाँ इसकी फ़सल अधिक की जाती है. उन्होंने कहा कि जलोढ़ मिट्टी पालक की खेती के लिए सबसे अधिक उपयोगी होती है. इस मिट्टी में की जाने वाली फ़सल अच्छी और भारी मात्रा में पैदा होती है. इसके अतिरिक्त नदी किनारा होने के कारण नमी बनी रहती है जिससे अधिक पानी या सिचाई की जरुरत नहीं पड़ती है. हालांकि कई किसान इसे वर्तमान में अपने खेतो में कर रहे है जहाँ नदी किनारा नहीं है बस वहाँ सिंचाई समय पर की जाती है.

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Rajneesh Kumar Yadav

मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें



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