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Pigeon Pea Farming Benefits: पारंपरिक फसल जैसे धान आदि की जगह अगर जून-जुलाई में किसान अरहर बोते हैं तो मुनाफे की संभावना तगड़ी रहती है. इस दौरान बस सही बीज से लेकर सिंचाई के तरीके और खेत की देखभाल तक इन चीजों का ध्यान रखें और साथ में दूसरी फसल भी बोएं. इससे किसान बढ़िया कमाई कर सकते हैं.
देवघर. अरहर की खेती देश के किसानों के लिए हमेशा से फायदे का सौदा मानी जाती रही है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि अरहर की दाल की मांग पूरे साल बनी रहती है. गांव हो या शहर, लगभग हर घर की रसोई में अरहर की दाल का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे में बाजार में इसकी अच्छी कीमत मिलती है और किसानों को बेहतर मुनाफा भी होता है. इसके बावजूद कई किसान आज भी पारंपरिक तरीके से खेती करते हैं, जिसके कारण उन्हें उतनी पैदावार नहीं मिल पाती जितनी मिलनी चाहिए. कृषि विशेषज्ञ का कहना है कि अगर किसान कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखें और आधुनिक तकनीकों को अपनाएं, तो अरहर की उपज में अच्छी बढ़ोतरी हो सकती है.
क्या कहते हैं कृषि विशेषज्ञ
देवघर के कृषि विशेषज्ञ अंबिका कुशवाहा ने बताया कि जून और जुलाई का महीना दलहनी फसलों की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त समय माना जाता है. अरहर भी प्रमुख दलहनी फसल है, जिसकी खेती इस दौरान की जाती है. उन्होंने कहा कि किसान अगर सही समय पर बुवाई करें, तो फसल का विकास बेहतर होता है और उत्पादन भी बढ़ता है. खास तौर से रोहिणी, आर्द्रा और मृगशिरा नक्षत्र के दौरान की गई बुवाई को अच्छा माना जाता है. इस समय मौसम और मिट्टी की नमी फसल के लिए अनुकूल रहती है, जिससे पौधों का विकास तेजी से होता है.
पुराने बीज छोड़ उन्नत बीज का करें प्रयोग
विशेषज्ञ का कहना है कि अरहर की खेती में सबसे महत्वपूर्ण बात उन्नत किस्म के बीज का चयन है. कई बार किसान अपने पास रखे पुराने बीजों का उपयोग कर लेते हैं, जिससे अंकुरण कम होता है और पौधे कमजोर रह जाते हैं. इसलिए हमेशा प्रमाणित और उन्नत किस्म के बीज का ही चयन करना चाहिए. इसके साथ ही बुवाई से पहले बीज का उपचार करना भी जरूरी है. बीज उपचार करने से फसल को शुरुआती रोगों और कीटों से सुरक्षा मिलती है, जिससे पौधे स्वस्थ रहते हैं और उत्पादन पर अच्छा असर पड़ता है.
अरहर में बीज के बीच दूरी महत्वपूर्ण
अरहर की खेती में पौधों के बीच उचित दूरी रखना भी बेहद जरूरी माना जाता है. बहुत घनी बुवाई करने से पौधों को पर्याप्त धूप, हवा और पोषक तत्व नहीं मिल पाते. इससे फसल की बढ़वार प्रभावित होती है. कृषि विशेषज्ञ अंबिका जी का कहना है कि वैज्ञानिक तरीके से कतारों और पौधों के बीच दूरी रखकर बुवाई की जाए, तो पैदावार में करीब 20 प्रतिशत तक वृद्धि संभव है. इससे पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं और फसल में रोग लगने की संभावना भी कम हो जाती है.
इस तरह की सिंचाई फायदेमंद
सिंचाई के मामले में भी किसानों को नई तकनीक अपनाने की सलाह दी जा रही है. अंबिका कुशवाहा बताते हैं कि ड्रिप इरिगेशन यानी बूंद-बूंद सिंचाई प्रणाली अरहर की खेती के लिए काफी लाभकारी साबित हो सकती है. इस तकनीक से पौधों की जड़ों तक सीधे पानी पहुंचता है, जिससे पानी की बर्बादी कम होती है. साथ ही फसल को जरूरत के अनुसार नमी मिलती रहती है. कम पानी में बेहतर उत्पादन लेने के लिए यह तरीका काफी कारगर माना जाता है.
मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी
उन्होंने यह भी बताया कि किसान अरहर के साथ दूसरी छोटी अवधि वाली फसलों की भी खेती कर सकते हैं. इसे अंतरवर्ती खेती कहा जाता है. अरहर के साथ मूंग, उड़द या अन्य उपयुक्त फसल लगाने से खेत का बेहतर उपयोग होता है और किसानों को अतिरिक्त आमदनी भी मिलती है. अगर किसी कारण से एक फसल से अपेक्षित लाभ नहीं मिलता, तो दूसरी फसल नुकसान की भरपाई कर देती है. अरहर की खेती का एक बड़ा फायदा यह भी है कि यह मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद करती है.
बढ़ती है मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा
दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ों में मौजूद जीवाणु मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाते हैं. इससे अगली फसलों को भी लाभ मिलता है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है. यही कारण है कि कृषि विशेषज्ञ किसानों को फसल चक्र में अरहर को शामिल करने की सलाह देते हैं. सही बीज, सही समय और वैज्ञानिक तकनीकों के साथ की गई अरहर की खेती किसानों की आमदनी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
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बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी से मास कम्यूनिकेशन एंड जर्नलिज़्म में मास्टर्स, गोल्ड मेडलिस्ट. पत्रकारिता का सफर दैनिक जागरण से शुरू हुआ, फिर प्रभात खबर और ABP न्यूज़ से होते हुए News18 Hindi तक पहुंचा. करियर और देश की …और पढ़ें