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खरीफ सीजन में धान की खेती करते है. वहीं, पलामू जिले में इस वर्ष सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना जताई जा रही है. वहीं अबतक मानसून की भी एंट्री नहीं हुई है. ऐसे में किसानों के सामने धान की खेती को लेकर नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं. कम पानी की स्थिति में धान की सीधी बुआई (डायरेक्ट सीडेड राइस) किसानों के लिए बेहतर विकल्प साबित हो सकती है.
पलामू: खरीफ सीजन शुरू होते ही किसानों की नजर धान की खेती पर टिक जाती है. लेकिन इस वर्ष पलामू जिले में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना जताई जा रही है. वहीं अब तक मानसून की भी एंट्री नहीं हुई है. ऐसे में धान की खेती को लेकर किसानों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि कम बारिश और पानी की कमी की स्थिति में धान की सीधी बुआई (डायरेक्ट सीडेड राइस-डीएसआर) किसानों के लिए बेहतर विकल्प साबित हो सकती है. इस तकनीक में पानी, श्रम और लागत की बचत होती है, लेकिन इसके साथ एक बड़ी चुनौती भी जुड़ी हुई है. सीधी बुआई में खरपतवार यानी घास-फूस की समस्या अधिक होती है. यदि समय रहते इसका नियंत्रण नहीं किया गया, तो फसल की बढ़वार प्रभावित होने के साथ-साथ उत्पादन में भी भारी गिरावट आ सकती है.
क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, चियांकी के मुख्य कृषि वैज्ञानिक डॉ. डी.एन. सिंह ने बताया कि रोपा विधि से धान की खेती करने पर खेत में लंबे समय तक पानी भरा रहता है और नियमित निराई-गुड़ाई भी होती है. इसके कारण खरपतवार की समस्या अपेक्षाकृत कम रहती है. वहीं, सीधी बुआई की स्थिति में धान के पौधों के साथ-साथ खरपतवार भी तेजी से बढ़ते हैं. इससे फसल और खरपतवार के बीच पोषक तत्वों, नमी और सूर्य के प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है, जिसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है. यही वजह है कि सीधी बुआई में खरपतवार नियंत्रण को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है.
डॉ. सिंह ने बताया कि धान की सीधी बुआई के तीन से पांच दिनों के भीतर पेंडिमेथिलिन नामक खरपतवारनाशी दवा का छिड़काव करना चाहिए. इसके लिए दवा को अनुशंसित मात्रा में पानी में मिलाकर पूरे खेत में समान रूप से छिड़काव करना जरूरी है. यह दवा शुरुआती अवस्था में खरपतवारों के अंकुरण को रोकने में काफी प्रभावी मानी जाती है.
उन्होंने आगे कहा कि पहली दवा के प्रयोग के 15 से 18 दिनों के भीतर दूसरी खरपतवारनाशी दवा स्पाइरीबैक सोडियम का उपयोग किया जा सकता है, जो बाजार में नोमिनी गोल्ड नाम से उपलब्ध है. यह दवा खेत में पहले से उग चुके खरपतवारों को नियंत्रित करने में मदद करती है. इसके अलावा बुआई के 28 से 30 दिन बाद एक बार निराई-गुड़ाई कर देने से खरपतवार पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है और फसल का विकास भी बेहतर होता है.
कृषि वैज्ञानिक ने किसानों को सलाह देते हुए कहा कि यदि वे समय पर खरपतवारनाशी दवाओं का उपयोग करें और जरूरत के अनुसार निराई-गुड़ाई करते रहें, तो सीधी बुआई वाली धान की फसल से भी रोपा विधि के समान अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि कम वर्षा की स्थिति में डायरेक्ट सीडेड राइस तकनीक किसानों के लिए एक लाभदायक, किफायती और टिकाऊ विकल्प बनकर उभर सकती है. इससे न केवल पानी की बचत होगी, बल्कि खेती की लागत भी कम होगी और किसानों को बेहतर उत्पादन मिलने की संभावना बढ़ेगी.
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न्यूज़18इंडिया में कार्यरत हैं. आजतक से रिपोर्टर के तौर पर करियर की शुरुआत फिर सहारा समय, ज़ी मीडिया, न्यूज नेशन और टाइम्स इंटरनेट होते हुए नेटवर्क 18 से जुड़ी. टीवी और डिजिटल न्यूज़ दोनों विधाओं में काम करने क…और पढ़ें