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Ranchi Success Story: रांची के पास बेड़ों गांव की सावित्री खजूर ने एक एनजीओ से ट्रेनिंग ली. इसके बाद वह जैविक दवाइयां और नर्सरी शुरू कर महीने में 50 हजार से ज्यादा कमा रही हैं. उन्होंने बताया कि पहल वह दूसरों के खेतों में मजदूरी करती थी.
रांची: झारखंड की राजधानी रांची से सटे बेड़ों गांव में सावित्री खजूर रहती हैं. वह अपना नर्सरी चलाती हैं. जहां अपनी छोटी सी जमीन में महोगोनी, आम, जामुन और भी कई चीज तरह के पौधे तैयार की हैं. इसके अलावा ब्रह्मास्त्र, नीमस्त्र, अग्निअस्त्र यह सारे जैविक दवाई अपने हाथों से बनाने का काम करती हैं. सहजन के पत्ते गुड, सड़े हुए गोबर इन सारे ऑर्गेनिक चीजों से ही वह यह बनाती हैं, जिससे वह महीने की 50000 रुपये से उपर तक की कमाई कर लेती हैं.
सावित्री ने बताया कि कभी दूसरे के खेतों में मजदूरी करती थी, लेकिन आज खुद के बॉस बनी हैं. एक समय था जब स्मार्टफोन क्या होता है पता नहीं था, स्कूटी क्या होती है, कैसे चलती है, कुछ नहीं पता था, ऑटो में एक साथ 20 लोगों के साथ जाती थी. आज आलम यह है कि आज खुद स्कूटी चला कर अपना सारा काम करती हैं. बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे हैं. स्मार्टफोन भी है. वह स्मार्टफोन के जरिए अपना सारा बिजनेस करती हैं.
जैविक दवाइयां हैं उनका हथियार
सावित्री ने बताया कि सबसे पहले उन्होंने जैविक दवाई बनाना शुरू किया. जैसे हम लोग ब्रह्मास्त्र, नीमस्त्र, अग्निअस्त्र यह सारी दवाई बनाना शुरू किए. यह सारा का सारा दवाई सिर्फ और सिर्फ जैविक चीजों से ही बनता है. गोबर का यूरिन, सड़ा हुआ गोबर, घर से निकला हुआ कचरा, खासतौर पर किचन से जैविक कचरा, सहजन का पत्ता, सब्जी के छिलके इन सभी चीजों का प्रयोग करके वह जैविक दवाई बनाने का काम करती हैं. इसके लिए उन्होंने एनजीओ प्रदान द्वारा ट्रेनिंग भी ली है.
ट्रेनिंग के दौरान समझ में आया मॉडल
ट्रेनिंग के दौरान समझ में आया कि यह एक ऐसा मॉडल है, जिसके तहत छोटे सी जमीन में वह जैविक दवाई तैयार कर सकती हैं. वहीं, बगल में नर्सरी चला सकती हैं. इस जैविक दवाई का प्रयोग करके नर्सरी में काफी बढ़िया पौधे उगा सकते हैं. खासतौर पर महोगोनी जिसे वाटरप्रूफ लकड़ी कहा जाता है. इसकी डिमांड विदेश तक है, एक पौधे की कीमत 300 से ₹400 तक होती है. हमारे पास 10 से 12 तरह के फलदार पेड़ के पौधे आपको देखने को मिल जाएंगे.
आज भी चलाती हैं अपनी दुकान
सावित्री बताती हैं कि आज उनकी एक बड़ीदुकान भी है. जहां पर कई जैविक दवाइयां को ब्रांडेड पैकेजिंग करके बेचने का काम करती हैं. जहां किसान सीधाआकर ले जाते हैं. पहले तो किसी और के खेत मजदूरी करती थी, लेकिन एनजीओ और सरकार द्वारा जो ट्रेनिंग दी जाती है. यह उनके लिए मील का पत्थर साबित हुई. अन्य किसानों को भी इस तरह की चीज करनी चाहिए. इससे उन्हें पता चलेगा कि अपनी जमीन में कैसे और किस मॉडल को अपनाकर वह अधिक कमाई कर सकते हैं.
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बृजेंद्र प्रताप सिंह डिजिटल-टीवी मीडिया में (2021) लगभग 5 सालों से सक्रिय हैं. मेट्रो न्यूज 24 टीवी चैनल मुंबई, ईटीवी भारत डेस्क, दैनिक भास्कर डिजिटल डेस्क के अनुभव के साथ 14 मई 2024 से News.in में सीनियर कंटें…और पढ़ें