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17000 फीट पर बिना एक भी सैनिक खोए भारत ने रचा था...


नई दिल्ली. कारगिल युद्ध की बर्फीली चोटियों पर लड़ी गई कई लड़ाइयों ने भारतीय सैन्य इतिहास में अमिट छाप छोड़ी, लेकिन उनमें से एक लड़ाई ऐसी भी थी जिसने न केवल युद्ध की दिशा बदली बल्कि ऊंचे व दुर्गम हिमालयी क्षेत्र में युद्धकला का एक नया अध्याय भी लिखा. यह लड़ाई थी पॉइंट 5140, जिसे आज पूरा देश गन हिल के नाम से जानता है. ऑपरेशन विजय की 27वीं वर्षगांठ पर भारतीय सेना ने इसी ऐतिहासिक गन हिल तक विशेष अभियान आयोजित कर उन वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि दी, जिनके साहस और पराक्रम ने 1999 में कारगिल की ऊंचाइयों पर तिरंगा फहराया था.

सेना के मुताबिक, करीब 17,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित पॉइंट 5140 पर उस समय दुश्मन का एक मजबूत ठिकाना था. यह चोटी द्रास क्षेत्र पर निगरानी रखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी. यहां से दुश्मन भारतीय सेना की गतिविधियों पर नजर रख सकता था और आसपास की अन्य अवैध तरीके से घुसपैठ की गई चोटियों को भी सहायता पहुंचा सकता था. इसलिए इस चोटी को मुक्त कराना भारतीय सेना के लिए केवल सामरिक आवश्यकता नहीं, बल्कि युद्ध जीतने की अनिवार्य शर्त बन गया था. इस विजय की कहानी केवल पैदल सैनिकों की बहादुरी की नहीं है.

यह कहानी भारतीय तोपखाने की उस अद्भुत क्षमता की भी है, जिसने दुश्मन की मजबूत रक्षा व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया. जून 1999 में अंतिम हमले से पहले भारतीय सेना ने आसपास की चोटियों पर कब्जा कर अपनी स्थिति मजबूत की. 13 और 14 जून की रात 18 ग्रेनेडियर्स ने ‘हंप’ पर कब्जा किया, जबकि 13 जम्मू एवं कश्मीर राइफल्स ने ‘रॉकी नॉब’ को अपने नियंत्रण में लिया.

इस दौरान बोफोर्स तोपों ने सीधे फायर कर दुश्मन के बंकरों को तबाह कर दिया. सटीक गोलाबारी इतनी प्रभावी रही कि दुश्मन की रक्षा व्यवस्था बिखरने लगी. इसके बाद 19 और 20 जून 1999 की रात शुरू हुआ निर्णायक अभियान. ‘शत्रुनाश’ नामक व्यापक तोपखाना योजना के तहत बोफोर्स तोपों और बहु-नाल रॉकेट प्रक्षेपक प्रणालियों ने दुश्मन के ठिकानों पर लगातार आग बरसाई. पूर्व और पश्चिम दोनों दिशाओं से की गई गोलाबारी ने दुश्मन की लड़ने की क्षमता को लगभग समाप्त कर दिया.

तोपों की इस भीषण मार के बाद भारतीय पैदल सेना आगे बढ़ी. 20 जून की सुबह 5 बजे 13 जम्मू एवं कश्मीर राइफल्स ने पॉइंट 5140 पर कब्जा कर लिया. इसके साथ ही द्रास क्षेत्र में दुश्मन की एक महत्वपूर्ण अग्रिम पंक्ति ध्वस्त हो गई और कारगिल युद्ध में भारतीय सेना को निर्णायक बढ़त मिल गई. इस जीत को और भी असाधारण बनाती है एक ऐसी उपलब्धि, जिसकी मिसाल आज भी सैन्य इतिहास में दुर्लभ है. लगभग 17,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित एक अत्यधिक सुरक्षित दुश्मन ठिकाने पर कब्जा करने के बावजूद भारतीय सेना का एक भी सैनिक शहीद नहीं हुआ.

उच्च हिमालयी युद्ध के इतिहास में यह पहली बार था जब इतनी कठिन परिस्थितियों में इतना बड़ा सैन्य लक्ष्य बिना किसी अपने नुकसान के हासिल किया गया. इसी असाधारण सफलता और कारगिल युद्ध में तोपखाना रेजिमेंट की निर्णायक भूमिका को सम्मान देने के लिए वर्ष 2023 में पॉइंट 5140 का नाम बदलकर गन हिल रखा गया.

इस वर्ष आयोजित अभियान में उन तोपखाना इकाइयों के 25 सैनिक शामिल हुए, जिन्होंने 1999 के युद्ध में भूमिका निभाई थी. उनके साथ स्थानीय सैन्य इकाइयों के 101 सैनिक भी शामिल हुए. यह केवल एक सैन्य यात्रा नहीं थी, बल्कि अतीत और वर्तमान के सैनिकों के बीच गौरव, परंपरा और बलिदान की विरासत को जोड़ने वाला एक जीवंत सेतु था.

आज गन हिल की चोटी पर खड़े होकर जब सैनिक तिरंगे को लहराते देखते हैं, तो उन्हें केवल एक पहाड़ी नहीं दिखाई देती. उन्हें दिखाई देता है वह साहस, वह संकल्प और वह बलिदान, जिसने कारगिल की बर्फीली चोटियों पर भारत की विजय का मार्ग प्रशस्त किया था. गन हिल आज भी उन वीरों की गाथा सुनाती है, जिन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया.



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