आज तीन सीटों पर उपचुनाव के नतीजों की बहुत चर्चा हो रही है. इंडी वाले तो झूम रहे हैं कि दो सीटों पर बीजेपी हार गई. ये वही लोग हैं, जो कल तक कहते थे कि बीजेपी तो सेटिंग से चुनाव जीत जाती है. ये वही लोग हैं जो कल तक वोट चोरी की बात करते थे. ये वही लोग हैं, जो कल तक ये कहते थे कि बीजेपी पुलिस, प्रशासन और सरकारी एजेंसियों की सारी ताकत लगाकर चुनाव मैनेज कर लेती है. लेकिन आज ये बातें सारे इंडी वाले भूल गए, क्योंकि उपचुनाव में बीजेपी 2-1 से पिछड़ गई.
आप देखिए कि बिहार के बांकीपुर में बीजेपी की हार हुई. मध्य प्रदेश के दतिया में भी बीजेपी हार गई. लेकिन गुजरात में बीजेपी का दबदबा बना रहा. मांजलपुर सीट में उसे बड़ी जीत मिली. तीन सीटों पर उपचुनाव के जो नतीजे आए हैं, उनमें दो सीटों की बहुत चर्चा हो रही है. एक सीट पटना के बांकीपुर की है, दूसरी सीट एमपी की दतिया है. बांकीपुर की बात इसलिए हो रही है, क्योंकि ये बीजेपी के अध्यक्ष नितिन नवीन की सीट थी और यहां पर प्रशांत किशोर जीत गए.
बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर को 64,151 वोट मिले, जबकि बीजेपी उम्मीदवार नीरज सिन्हा को 44,827 वोट हासिल हुए. आरजेडी की रेखा गुप्ता महज 14,273 वोट लेकर तीसरे स्थान पर रहीं और उनकी जमानत तक जब्त हो गई. प्रशांत किशोर ने लगभग 19,324 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की.
बांकीपुर में बीजेपी के लिए कितना बड़ा झटका?
इसी तरह से एमपी की दतिया सीट पर कांग्रेस जीत गई. दतिया का रिजल्ट देखिए तो यहां कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से हराया. कांग्रेस उम्मीदवार को 66,757 वोट, जबकि बीजेपी प्रत्याशी को 60,741 वोट मिले.
इन दोनों सीट में बीजेपी को सबसे ज्यादा झटका बांकीपुर के रिजल्ट को लेकर लगा होगा, क्योंकि बांकीपुर में जो हुआ, वो बीजेपी ने कभी सोचा नहीं था. बांकीपुर सीट पर 30 साल से बीजेपी को कोई हरा नहीं पाया. लेकिन इस बार प्रशांत किशोर ने बांकीपुर में बीजेपी के गढ़ में जीत हासिल कर ली. जो प्रशांत किशोर अभी 9 महीने पहले अपनी पार्टी को विधानसभा चुनाव में एक सीट नहीं दिला पाए थे.
बांकीपुर में हार बीजेपी के लिए इसलिए बड़ी हार है, क्योंकि आप इस सीट का इतिहास देखिए…
- 1995 में बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन के पिता नवीन किशोर सिन्हा उस वक्त पश्चिम पटना सीट कहलाने वाली बांकीपुर सीट से चुनाव जीते थे.
- 2006 तक वो लगातार इस सीट पर विधायक रहे.
- पिता के निधन के बाद 2006 में नितिन नवीन पहली बार इस सीट से विधायक बने.
- और इस सीट पर लगातार 5 बार विधानसभा चुनाव जीते.
- 2010 में नितिन नवीन ने इस सीट पर RJD कैंडिडेट को हराया.
- साल 2015 में नितिन नवीन ने कांग्रेस कैंडिडेट को हराया.
- साल 2020 में नितिन नवीन एक बार फिर जीते, इस बार भी उन्होंने कांग्रेस कैंडिडेट को हराया.
- वहीं पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में नितिन नवीन ने RJD की कैंडिडेट को हराया.
बीजेपी अध्यक्ष बनने और राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद नितिन नवीन ने इस सीट से इस्तीफा दिया और करीब 30 साल बाद बांकीपुर सीट बीजेपी के हाथ से फिसल गई.
बांकीपुर और दतिया जैसी सीटों पर बीजेपी क्यों हार गई? इसके पीछे क्या कारण दिख रहे हैं? क्या अपरकास्ट वोटर्स के मन में बीजेपी को लेकर उथलपुथल चल रही है, जिसकी वजह से ऐसा रिजल्ट आया, या कुछ और कारण हैं. ये सब आपको आगे बताएंगे.
बांकीपुर रिजल्ट से इंडी गठबंधन वाले बमबम
बांकीपुर सीट का रिजल्ट देखकर कई लोग कह रहे हैं कि बीजेपी की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है. जैसे टीएमसी के नेता डेरेक ओ ब्रायन ने कहा कि ‘ये बीजेपी के अंत की शुरुआत है.’ ये लोग वो लोग हैं जिनकी खुद की पार्टी को खत्म हो रही है. अपने विधायक और सांसद संभाले नहीं संभल पा रहे हैं, लेकिन दूसरों के खत्म हो जाने की भविष्यवाणी कर रहे हैं.
इसी तरह से अरविंद केजरीवाल ने कहा कि ‘बीजेपी अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट ही हार गई. बांकीपुर से प्रशांत किशोर जी बड़े मार्जिन से जीत गए. उनको बहुत-बहुत बधाई. बीजेपी की ज़मीन पूरी तरह से खिसक चुकी है. चंदा चोरी, पेपर लीक, E20… मोदी सरकार के प्रति लोगों में गहरा असंतोष है. अहंकार टूटता जा रहा है. देश की जनता ने बदलाव का संकेत दे दिया है.’
अखिलेश यादव ने भी बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत पर बीजेपी को घेरा. उन्होंने एक्स पर लिखा, ‘ये डबल इंजन की डबल हार है. बीजेपी की हार मतलब बदलाव की शुरुआत. बीजेपी की सबसे सुरक्षित और परंपरागत सीटें भी अब उनकी हार नहीं बचा पाएंगी. अब बीजेपी का संकट हार से बढ़कर इस बात का होगा कि उनका टिकट लेनेवाला ‘ड्रोन और दूरबीन’ से भी ढूंढे नहीं मिलेगा.’
मांजलपुर सीट पर बीजेपी की एकतरफा जीत
ये लोग कह रहे हैं कि बीजेपी तो खत्म हो गई है. लेकिन इसमें पहली बात तो ये है कि उपचुनाव की तीन सीटों में गुजरात की एक सीट ऐसी भी है, जहां बीजेपी को एकतरफा जीत मिली है. गुजरात के वडोदरा की मांजलपुर सीट पर भी उपचुनाव हुआ था. वहां बीजेपी कैंडिडेट सतीश पटेल को 55481 वोट मिले, जबकि दूसरे नंबर पर रहे कांग्रेस उम्मीदवार भीखाभाई रबारी महज 24851 वोट ही हासिल कर सके. इस तरह बीजेपी ने यह सीट 30630 वोटों के बड़े मार्जिन से अपने पास बरकरार रखी.
दूसरी बात ये है कि उपचुनाव के नतीजों की जितनी चिंता बीजेपी को होनी चाहिए, उससे डबल चिंता तो इंडी वालों को होनी चाहिए क्योंकि आप बांकीपुर सीट का हाल देखिए. आरजेडी के कैंडिडेट ना सिर्फ हारे बल्कि जमानत जब्त हो गई. इस बारे के उपचुनाव में आरजेडी कैंडिडेट को महज 14,273 वोट मिल सके हैं, जो कुल वोटों का महज 11% है. वहीं नवंबर 2025 में हुए विधानसभा चुनाव में बांकीपुर सीट पर आरजेडी को 30% यानी 46000 वोट मिले थे.
चिंता तो तेजस्वी यादव और राहुल गांधी को भी करनी चाहिए, क्योंकि जिन प्रशांत किशोर को विधानसभा चुनाव में 1 सीट भी नहीं आई थी, उन्होंने बीजेपी की 30 साल से बनी सीट छीन ली. लेकिन तेजस्वी यादव जैसे नेता कुछ नहीं कर पाए. इतनी बड़ी हार के बाद भी ये कह रहे हैं कि चुनाव तो आता जाता रहता है. अभी तो प्रशांत किशोर ने एक ही सीट निकाली है. अगर इंडी वाले अब भी नहीं सुधरे तो फिर बिहार में विपक्ष का स्पेस प्रशांत किशोर लेकर जाएंगे. आप देखिए कि कितना बड़ा फर्क है.
प्रशांत किशोर ने कैसे पलटा पासा?
प्रशांत किशोर को पिछले विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली थी. फिर भी प्रशांत किशोर पूरी तरह से सक्रिय रहे, जबकि तेजस्वी यादव ने विधानसभा चुनाव में बड़ी हार के बाद भी सबक नहीं लिया और सीन से ही गायब दिखे. विधानसभा चुनाव में पार्टी के हारने के बाद पीके का मजाक उड़ा, फिर भी बांकीपुर में बीजेपी के गढ़ में खुद चुनाव लड़कर पीके ने बड़ा रिस्क लिया. उधर तेजस्वी यादव के पास बड़ा मौका था कि वो बीजेपी को कड़ी टक्कर देते, लेकिन वो तो उपचुनाव के प्रचार के बीच विदेश दौरे पर थे.
प्रशांत किशोर ने बांकीपुर सीट पर प्रचार में जान लड़ा दी थी, जबकि ना मजबूत संगठन था, ना बूथ कैडर थे. जबकि तेजस्वी यादव के पास मजबूत संगठन, बूथ कैडर सब थे, फिर भी प्रचार में आरजेडी पीछे दिखी. प्रशांत किशोर ने खुद जगह-जगह जाकर प्रचार किया. पूरे चुनाव में ये दिखा कि बीजेपी और प्रशांत किशोर की टक्कर है. उधर तेजस्वी यादव विदेश में रहे, छात्र आंदोलन के बीच भी नहीं दिखे, विधानसभा सत्र में भी नहीं दिखे. सिर्फ आखिर में दो दिन प्रचार किया.
यही बात खुद तेजस्वी यादव का परिवार भी कह रहा है. लालू यादव की बेटी और तेजस्वी की बहन रोहिणी आचार्य ने बांकीपुर के नतीजों पर कहा, ‘बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे से ये फिर से साबित हो गया कि ‘जीत उसकी जरूर होती है , जो लगातार लड़ता है. जनता से जिसका निरंतर जुड़ाव होता है, जो कार्यकर्ताओं और समर्थकों का सम्मान करता है और उनके साथ संपर्क और संवाद कायम रखता है. ये जीत बीजेपी के विरोध और लोकतंत्र में जनता के विश्वास की जीत है.’
पीके को ट्रांसफर हो गया आरजेडी का वोट!
पीके की जीत के पीछे एक फैक्टर ये भी है कि आरजेडी का काफी हद तक वोट पीके को ट्रांसफर हो गया. 2025 के विधानसभा चुनाव और इस उपचुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो पिछली बार बीजेपी को 62% वोट शेयर के साथ 98000 वोट मिले थे. वहीं आरजेपी को 29 फीसदी यानी 46000 वोट, वहीं जनसुराज महज 5% वोटों के साथ 7700 मतों पर सिमटी हुई थी. जबकि इस बार उपचुनाव में प्रशांत किशोर को 49 फीसदी यानी 64,000 वोट मिले, जबकि बीजेपी को 44,000 (34%) और आरजेडी महज 14,000 (11%) वोट पर सिमट गई.
अब ये भी देखिए बांकीपुर में जिस RJD के कैंडिडेट की जमानत जब्त हो गई है. वो RJD अब खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाली बात कर रही है. RJD सांसद मीसा भारती ने तो प्रशांत किशोर को बीजेपी की लोमड़ी बता दिया और कहा कि प्रशांत किशोर की जीत असल में बीजेपी की ही जीत है.
बीजेपी की हार के पीछे क्या वजह?
बांकीपुर और एमपी की दतिया सीट पर बीजेपी की हार के पीछे क्या फैक्टर्स हो सकते हैं? असली खेला कहां हुआ? ये भी समझने की जरूरत है. एक फैक्टर तो सीधा सीधा ये दिखता है कि कैंडिडेट का सेलेक्शन. जैसे आप बांकीपुर की सीट पर देखिए. बांकीपुर सीट बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन की सीट थी, लेकिन यहां बीजेपी ने पहले अभिषेक बंटी को कैंडिडेट बनाया था, फिर अपना कैंडिडेट बदल दिया. अभिषेक बंटी नामांकन भर चुके थे, उनके लिए बिहार के बड़े बड़े नेताओं ने रैली कर ली थी. लेकिन अचानक अभिषेक बंटी चुनाव से हट गए और बीजेपी ने नीरज सिन्हा को नया कैंडिडेट बना दिया. कैंडिडेट अचानक बदलने को लेकर बीजेपी शुरू से ही डिफेंसिव मोड में आ गई थी.
दूसरी बात ये है कि नीरज सिन्हा कोई बड़ा चेहरा नहीं थे, उनके सामने बड़े चेहरे के तौर पर प्रशांत किशोर थे. हो सकता है कि जनता ने ये सोचा हो कि बीजेपी को एक सीट से क्या फर्क पड़ेगा इसलिए मजबूत चेहरे के तौर पर पीके को वोट किया.
दतिया में नरोत्तम मिश्रा फैक्टर पड़ा भारी!
इसी तरह से एमपी की दतिया सीट पर कैंडिडेट को लेकर बीजेपी के अंदर बहुत बवाल हुआ था. दतिया से बीजेपी के बड़े नेता नरोत्तम मिश्रा टिकट चाहते थे, लेकिन उनका टिकट काट दिया गया. इसके बाद नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने बड़ा बवाल किया. बाद में किसी तरह से नरोत्तम मिश्रा को मनाया गया. नरोत्तम मिश्रा की जगह पर आशुतोष तिवारी को टिकट दिया गया था, लेकिन बीजेपी को ये सब बवाल भारी पड़ गया.
नरोत्तम मिश्रा दतिया से तीन बार विधायक रह चुके हैं. पिछला चुनाव वो हार गए थे, लेकिन इलाके में उनकी मजबूत पकड़ है. दतिया में कांग्रेस के जो कैंडिडेट जीते वो तो खुलकर कह रहे हैं कि उन्हें नरोत्तम मिश्रा ने तो नहीं जिताया, लेकिन नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने उनको जिता दिया.
बीजेपी से छिटका अगड़ा वोट?
ये सिर्फ एक फैक्टर है. एक बड़ा फैक्टर और भी है, जिस पर बहुत लोगों का ध्यान नहीं गया. और उस पर आपको बहुत ध्यान देना चाहिए. और ये फैक्टर है अपरकास्ट वोटों का. आप चाहे बांकीपुर की सीट देख लीजिए या फिर एमपी की दतिया है. यहां पर अपरकास्ट वोट काफी प्रभावी हैं. जैसे बांकीपुर के बारे में सवर्ण वोटर करीब 37% हैं. इसमें मुख्य तौर पर कायस्थ- 14%, भूमिहार- 8% , ब्राह्मण- 7% और राजपूत- 5 फीसदी के करीब है. यानी कुल 3.7 लाख वोटों में 1.7 लाख सवर्ण वोटर हैं. यहां बीजेपी की हार का मार्जिन 19324 वोट रहा. इसी तरह से दतिया सीट पर सवर्ण वोटर करीब 25% यानी करीब 60,000 हैं. यहां बीजेपी की हार का मार्जिन 6,000 रहा.
ऐसे में सवाल ये है कि अगर अपरकास्ट वोट बीजेपी से टूटा है तो क्या ये यूजीसी जैसे मामलों की वजह से हुआ है. आप इस बार का वोटिंग परसेंट भी देखिए कि पिछली बार से कितना कम हुआ है. बांकीपुर में पिछली बार जहां 41% वोट पड़े थे, वहीं इस बारे के उपचुनाव में यह घटकर 34% पर आ गया.