जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, सरायकेला-खरसावां ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए दक्षिण-पूर्व रेलवे को ट्रेन के अत्यधिक विलंब से यात्री को हुई मानसिक एवं शारीरिक पीड़ा के लिए कुल 60 हजार रुपए भुगतान करने का आदेश दिया है। मामला ट्रेन के लेट चलने से
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ट्रेन निर्धारित समय पर टाटानगर से सुबह 10:18 बजे प्रस्थान करने तथा उसी दिन अपराह्न 3:50 बजे संबलपुर पहुंचने वाली थी। ट्रेन लगभग 317 मिनट, यानी 5 घंटे 17 मिनट, विलंब से पहुंची। इससे उन्हें मानसिक एवं शारीरिक कष्ट का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने रेलवे से 2.50 लाख क्षतिपूर्ति की मांग करते हुए जिला उपभोक्ता आयोग में परिवाद दायर किया। रेलवे की ओर से आयोग के अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति उठाई गई। कहा गया कि यह मामला रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र का है। यह भी कहा गया कि आवश्यक पक्षकारों को वाद में शामिल नहीं किया गया है। हालांकि सुनवाई के दौरान रेलवे ट्रेन के विलंब का संतोषजनक कारण अथवा कोई दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। आयोग के अध्यक्ष सुनील कुमार सिंह तथा सदस्य प्रदीप कुमार मिश्रा एवं संजू शाही की पीठ ने उपलब्ध साक्ष्यों एवं सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के आलोक में रेलवे को सेवा में दोषी ठहराया। पीठ ने आदेश दिया कि रेलवे परिवादी को मानसिक एवं शारीरिक प्रताड़ना के लिए 50 हजार रुपए दे। वाद व्यय के रूप में 10 हजार रुपए भी दे। कुल 60,000 रुपए का भुगतान 45 दिनों के भीतर किया जाए।
आयोग ने अपने निर्णय में कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नार्दन रेलवे बनाम संजय शुक्ला केस नंबर. 13288/2021 में स्पष्ट किया जा चुका है कि यात्रियों का समय अत्यंत मूल्यवान है तथा यदि रेलवे ट्रेन के विलंब का उचित एवं अपरिहार्य कारण सिद्ध नहीं कर पाता है, तो यह सेवा में कमी मानी जाएगी और यात्री क्षतिपूर्ति का हकदार होगा। सबूत सुरक्षित रखें। अपना रिजर्वेशन टिकट, बोर्डिंग पास और ट्रेन देरी के समय का स्क्रीनशॉट या रेलवे का मैसेज संभालकर रखें। देरी का आधिकारिक कारण जानने के लिए रेलवे में सूचना का अधिकार का आवेदन दाखिल कर जवाब मांगें। ई-दाखिल पोर्टल के माध्यम से या नजदीकी जिला उपभोक्ता आयोग में सीधे परिवाद दर्ज कराएं।