दो दिन से मोदी विरोधी इकोसिस्टम धुआं-धुआं हो रखा है. पूरे इकोसिस्टम में आग लगी हुई है. क्योंकि नरेंद्र मोदी इन्हें बैक टू बैक झटके दे रहे हैं. सबसे ज्यादा आग तो इस बात से लगी है कि पीएम मोदी ने लाल किले से दिमागी नक्सल क्यों बोल दिया. दिमागी नक्सल सुनते ही ये सब उछलने लग गए. कांग्रेस से लेकर केजरीवाल तक सब खुद को दिमागी नक्सल बताने लगे. इन्होंने दिमागी नक्सल वाली बात को लेकर ऐसा गदर मचा दिया कि ये लोग खुद ही एक्सपोज हो गए.
आज इसके बारे में आपको बताएंगे. और आपको ये भी बताएंगे कि ये इकोसिस्टम दिमागी नक्सल में ही फंसा रह गया. उधर पीएम मोदी ने दिमागी नक्सलों के खिलाफ धुरंधरों की नई टीम उतार दी. आज बीजेपी की नई टीम का ऐलान हुआ है. इसमें ऐसे ऐसे चौंकाने वाले नाम है, जिन्हें सुनकर इंडी और इंडी के इकोसिस्टम टेंशन में है. बीजेपी की नई टीम में किसका कमबैक हुआ, कौन से ऐसे नाम है जो इंडी के इकोसिस्टम में खलबली मचा देंगे, ये सब आपको बताएंगे.
इंडी वाले तो हर 15 अगस्त पर ये माहौल बनाते रहते हैं कि ये तो पीएम के तौर पर मोदी का आखिरी 15 अगस्त है. लेकिन पीएम मोदी ने 2029 को भी सेट करने वाली टीम को उतार दिया है. अभी बीजेपी की नई टीम बनी है. ये संकेत मिल रहे हैं कि आगे खुद पीएम मोदी के मंत्रियों की टीम भी बदलने वाली है.
दिमागी नक्सल पर उछलने लगा मोदी विरोधी इकोसिस्टम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब से देश को दिमागी नक्सलों से सावधान किया, तब से मोदी विरोधी इकोसिस्टम और उछलने लगा है. पीएम ने तो किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन इंडी वालों ने खुद ही ये मान लिया कि पीएम ने इन्हें ही दिमागी नक्सल कहा है. क्या कांग्रेस के नेता, क्या केजरीवाल, सब खुद को दिमागी नक्सल कहने लगे. वो लोग भी इसमें कूद पड़े जो खुद देश में बड़े बड़े पदों पर रहे हैं, जिन्हें नक्सली होने और दिमागी नक्सली होने का अंतर पता है. लेकिन सिर्फ मोदी विरोध में ये आज खुद को नक्सली भी कहने लगे हैं.
सोचिए पीएम ने सिर्फ यही बात कही कि हथियार वाले नक्सलियों को तो देश ने खत्म कर दिया, लेकिन उन दिमागी नक्सलियों को भी देखना होगा, जो देश में अराजकता फैलाने के मौके ढूंढते रहते हैं. लेकिन इंडी वालों को इस बात से ऐसी आग लगी कि ये खुद को दिमागी नक्सल कहने लगे. आप देखिए कि जम्मू-कश्मीर की पूर्व सीएम और PDP की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने सोशल मीडिया पर लिखा कि मैं आर्टिकल 370 का सपोर्ट करती हूं. मैं एक दिमागी नक्सल हूं. पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने कहा कि उनको दिमागी नक्सल होने पर गर्व है. प्राउड फील करते हैं. इधर दिल्ली के पूर्व सीएम और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी खुद को दिमागी नक्सल बताया और कहा कि उनको भी दिमागी नक्सल होने पर गर्व है.
केजरीवाल ने पीएम मोदी के भाषण का छोटा सा हिस्सा जोड़ते हुए एक वीडियो शेयर किया और ये आरोप लगाया कि पीएम मोदी के हिसाब से दिमागी नक्सली वे लोग हैं, जो सवाल उठाते हैं या व्यवस्था बदलना चाहते हैं. अरविंद केजरीवाल ने कहा, ‘जो अच्छे सरकारी स्कूल चाहता है, जो अच्छे सरकारी अस्पताल चाहता है, जो बिजली चाहता है, पानी चाहता है, सीवर चाहता है, ड्रेनेज चाहता है, अच्छी व्यवस्था चाहता है, भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना देखता है, वो प्रधानमंत्री जी के हिसाब से दिमागी नक्सली है. जो प्रधानमंत्री जी से और बीजेपी से डरता नहीं है, जो एक विकसित भारत का सपना देखता है, वो प्रधानमंत्री जी के हिसाब से दिमागी नक्सली है. आज अगर भगत सिंह जिंदा होते, तो प्रधानमंत्री जी भगत सिंह को भी दिमागी नक्सली कहते. आज अगर बाबा साहेब आंबेडकर जिंदा होते, जिन्होंने सबकी बराबरी के लिए लड़ाई लड़ी थी, तो बाबा साहेब आंबेडकर को भी प्रधानमंत्री जी नहीं छोड़ते, उनको भी प्रधानमंत्री जी दिमागी नक्सली बोलते. मैं प्रधानमंत्री जी को कहना चाहता हूं कि मैं अरविंद केजरीवाल, आपके हिसाब से दिमागी नक्सली हूं.’
केजरीवाल तो वो नेता हैं, जो पहले अर्बन नक्सली कहे जाने पर चिढ़ते थे. ये पूछते थे कि क्या मैं नक्सली हूं. क्या मैं नक्सली जैसा दिखता हूं. लेकिन आज खुद ही कह रहे हैं कि मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व है. इसी तरह से आप चिदंबरम को देख लीजिए. वो तो देश के गृह मंत्री रह चुके हैं. उनके गृह मंत्री रहते नक्सलियों से बड़ी लड़ाई हुई. नक्सलियों को तब देश का नंबर वन दुश्मन बताया जाता था. सोचिए ये वही कांग्रेस है, जिसकी छत्तीसगढ़ की लीडरशिप को एक वक्त में नक्सलियों ने हमला करके खत्म कर दी थी. बड़े-बड़े नेता मारे गए थे. लेकिन आज मोदी विरोध में कांग्रेस का हाल ये हो गया है कि इनके नेता खुद को दिमागी नक्सली बता रहे हैं. और उस पर प्राउड फील कर रहे हैं.
सीएम हिमंत का चिदंबरम पर प्रहार
बीजेपी में हिमंत बिश्व सरमा जैसे नेताओं ने तो चिंदबरम को साफ कह दिया कि ये दिमागी नक्सली नहीं पक्के नक्सली है. असम के सीएम हिमंता ने कहा, ‘मैं तो आह्वान करता हूं कि जब चिदंबरम ने खुद बोला कि मैं दिमागी नक्सल हूं, तो उसमें जांच भी साथ में होनी चाहिए कि चिदंबरम क्या जानबूझकर नक्सल के खिलाफ व्यवस्था नहीं ले रहा था, जब वो गृह मंत्री थे. मुझे लगता है कि चिदंबरम दिमागी नक्सल नहीं हैं, उससे भी ऊपर वाला नक्सल है. वो खुद ही नक्सल हैं. देश में अराजकता लाने वाला, वो भी एक पूरे-पूरे नक्सल है. दिमागी नक्सल उसमें लागू नहीं होगा, वो पूरे नक्सल वर्ग में आएगा.’
दिमागी नक्सल पर गर्व करने वाले पी चिदंबरम को बीजेपी याद दिला रही है कि कैसे उनके राज में देश का एक बड़ा हिस्सा नक्सलवाद से प्रभावित था. बीजेपी आरोप लगा रही है कि ये वही पी चिदंबरम हैं, जो नक्सलियों से कह रहे थे कि हम आपसे बातचीत करेंगे. हम आपको हथियार डालने के लिए नही कहेंगे, क्योंकि वो ऐसा करेंगे नहीं.
इंडी वाले ही नहीं कॉकरोच वाले भी खुद को दिमागी नक्सल बता रहे हैं. यानी खुद को दिमागी नक्सल साबित करने की होड़ मची है. कॉकरोच जनता पार्टी के सौरव दास ने कहा कि प्रधानमंत्री जी, ‘दिमागी नक्सल’ या ऐसी कोई भी बात काम नहीं आएगी. सौरव ने पूछा कि आप पढ़े-लिखे युवाओं को नक्सली वगैरह कैसे कह सकते हैं? – सिर्फ इसलिए कि वे आपकी सरकार से सवाल पूछते हैं?
दिमागी नक्सल कौन?
कॉकरोच वालों ने कहा कि यह सरासर अहंकार है. बदलाव की घंटी बज चुकी है. कॉकरोच पार्टी वाले हों, या इंडी वाले हों या इनका इकोसिस्टम है, इन्हें ये सीधी सी बात समझ में नहीं आती कि अगर पीएम मोदी ने दिमागी नक्सल कहा है तो किसी नेता, किसी पार्टी या किसी संगठन को नहीं कहा. इसका सीधा मतलब ये है कि वो लोग जो नक्सली सोच रहे हैं.
दिमागी नक्सल क्या है, वो भी आप समझ लीजिए कि
– जो अराजकता फैलाना चाहते हैं
– जो लोग देश में अशांति फैलाना चाहते हैं
– जो लोग नक्सलवाद का समर्थन करते हैं
– जो लोग कुशासन को बढ़ावा देना चाहते हैं
ऐसे लोगों से सतर्क रहने को पीएम ने कहा था जिससे देश की शांति-व्यवस्था बनी रहे.
इंडी वालों की इसी पॉलिटिक्स पर आज बीजेपी ने पलटवार किया. बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा, ‘दिमागी नक्सल वो है, जिसको हाफिज में साहब नज़र आता है, याकूब मेनन में ज्यूडिश्यल कीलिंग नज़र आती है, जिसको ओसामा में जी नज़र आता है, जिसको जाकिर नायक में शांति का मसीहा नज़र आता है, जिसको इशरत जहां में बेटी नज़र आती है, बुरहान में भटका हुआ नौजवान नज़र आता है और भारत के सेना अध्यक्ष में सड़क छाप गुंडा नज़र आता है, ये है वो दिमागी नक्सल. आज हर भारतीय को इस चीज़ को सिर्फ आंख खोलकर देखने की ज़रूरत है और कान खोलकर सुनने की ज़रूरत है. खुद ही समझ में आ जाएगा और उन लोगों ने जब खुद ही स्वीकार कर लिया है तो हमें लगता है कि किसी प्रकार का कोई संदेह या ‘किन्तु’ ‘परन्तु’ देश के लोगों के मन में नहीं रह गया है. जो प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि कांग्रेस अब मुस्लिम लीगी अब माओवादी कांग्रेस रह गई है तो अब उन्होंने खुद कह दिया है कि वो अब सिर्फ मुस्लिम लीगी माओवादी कांग्रेस नहीं बल्कि दिमागी नक्सल कांग्रेस भी हो गई है.’
अमित शाह ने चुपचाप कर दिया कर बड़ा काम
दिमागी नक्सल से निपटने की बात पीएम ने इसलिए कही क्योंकि नक्सली तो खत्म हो गए, लेकिन जब तक दिमाग में जो लोग अराजकता वाली सोच भरते हैं, उन लोगों से सावधान नहीं रहा जाएगा तो फिर ये देश भर में आग लगाते रहेंगे. और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फंडा क्लियर है कि सबको विरोध करने का हक है, लेकिन देश में आग लगाने, देश के विकास में ब्रेक लगाने को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. आप देखिए इसीलिए नक्सलवाद से लेकर आतंकवाद सबके खिलाफ तगड़ा एक्शन हो रहा है. आज ही एक बड़ी खबर खुद देश के गृह मंत्री अमित शाह ने दी. जो इंडी वाले पूछ रहे थे कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह संसद सत्र के दौरान कहां है, ऑफिस में बैठकर अमित शाह क्या कर रहे हैं. उसमें आप देखिए कि आज ही खुलासा हुआ कि पिछले कुछ दिनों में ही भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के लिए काम करने वाले कुख्यात गैंगस्टर शहजाद भट्टी के नेटवर्क पर कड़ा प्रहार किया है.
गृहमंत्री अमित शाह ने बताया कि ISI समर्थित आतंकी गुट ‘शहजाद भट्टी नेटवर्क’ को पूरी तरह खत्म कर दिया है. 200 से ज्यादा गुर्गों को गिरफ्तार कर उनके खतरनाक मंसूबों को नाकाम कर दिया है. सुरक्षाबलों ने 14 अलग-अलग राज्यों में एकसाथ ऑपरेशन चलाकर नेटवर्क को ध्वस्त किया है.इनके पास से भारी मात्रा में IED और पाकिस्तान ऑर्डनेंस फैक्ट्री के निशान वाले ग्रेनेड बरामद हुए हैं. हथियार, जिंदा कारतूस और जासूसी के लिए इस्तेमाल होने वाले CCTV कैमरे जब्त किए गए हैं. गृहमंत्री ने इस कार्रवाई को आतंकवाद के खिलाफ भारत की ‘जीरो-टॉलरेंस’ नीति का बेहतरीन उदाहरण बताया है.
देश को सेफ और सिक्योर करने के लिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह तो अपने मिशन पर जुटे हैं. लेकिन इस मिशन को डिरेल करने के लिए दिमागी नक्सल अपना दिमाग लगा रहे हैं. इन दिमागी नक्सलियों से निपटना आसान नहीं है क्योंकि ये खुलकर सामने नहीं आते. ये देश में आग लगाने और अराजकता फैलाने का नैरेटिव बनाते हैं. और ऐसे से लोगों से निपटने के लिए पीएम मोदी ने आज अपने धुरंधरों की नई टीम उतार दी है. बीजेपी ने अपने संगठन की नई टीम बनाई है. उसमें क्या बड़ी बातें निकल कर आई है, वो आप देख लीजिए.
- पहली बात तो सोशल मीडिया की टीम बदल दी गई है
- दूसरी बात यूपी चुनाव पर फोकस करके नई टीम बनी है
- राम माधव और स्मृति ईरानी जैसे धाकड़ लोगों की वापसी हुई
- युवा और महिला चेहरों को संगठन में बड़ी जिम्मेदारी दी गई है
अमित मालवीय के हटने पर उछल रहे इंडी वाले
अभी जो सबसे बड़ी लड़ाई चल रही है, वो लड़ाई है सोशल मीडिया पर नैरेटिव की. क्योंकि ये सबने देखा कि सोशल मीडिया पर माहौल बनाकर कैसे लोगों को जंतर मंतर पर ले जाया गया, वहां पर गालियां दिलवाई गईं, अराजकता का माहौल बनाया गया. और इसे जस्टिफाई भी किया गया. इसमें सोशल मीडिया के नैरेटिव और एल्गोरिदम का बड़ा खेल हुआ. ऐसा दिखाया कि देश का जेन जी तो कुछ और ही सोचता है. ऐसा दिखाया गया कि गालियां देना तो कूल है. जब इस तरह की लड़ाई हो तो फिर उसके हिसाब से ज्यादा तैयारी करनी पड़ती है और नई एनर्जी के साथ नई टीम लानी पड़ती है. वही पीएम मोदी और बीजेपी ने आज किया है. नई टीम के ऐलान के साथ ही बीजेपी ने अपनी सोशल मीडिया टीम को भी बदल दिया है. बीजेपी के सोशल मीडिया टीम के इंचार्ज दीपक म्हल्के को बनाया गया है. वो बीजेपी के आईटी सेल के हेड अमित मालवीय की जगह लेंगे.
58 साल के दीपक म्हस्के छत्तीसगढ़ से आते हैं, वहां बीजेपी के प्रवक्ता रह चुके हैं. दीपक म्हस्के ने बिहार, बंगाल, छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में सोशल मीडिया कैंपेन को लीड किया था. वो छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कॉर्पोरेशन लिमिटेड के अध्यक्ष भी हैं. दीपक म्हस्के के पास पार्टी के आईटी सेल और सोशल मीडिया सेल में काम करने का 15 साल का अनुभव है.
अमित मालवीय के हटने पर इंडी वाले उछल रहे हैं, क्योंकि पिछले 11 साल से अमित मालवीय से इनके सोशल मीडिया पर इनकी तनातनी चल रही थी. लेकिन अमित मालवीय इन सबका लोड नहीं ले रहे. अमित मालवीय ने दीपक और उनकी टीम को बधाई देते हुए कहा पोस्ट में लिखा कि ‘नई टीम की नियुक्ति ऐसे अहम मोड़ पर हुई है, जब पार्टी नई ऊंचाइयों को छूने और अपने संदेश और संगठन को देश के कोने-कोने तक ले जाने की तैयारी कर रही है.;
अमित मालवीय ने लिखा कि वो ‘ख़ासतौर पर दीपक म्हस्के जी को बधाई देना चाहते हैं, जो उनकी जगह बीजेपी के सोशल मीडिया डिपार्टमेंट के हेड का काम संभालेंगे.’
बीजेपी संगठन में धाकड़ और दमदार चेहरे
नैरेटिव की ये जो लड़ाई है उसमें संगठन में धाकड़ और दमदार चेहरे चाहिए. ऐसे चेहरे जो परफॉर्म कर चुके हैं. बड़े बड़ों को पटक चुके हैं. इसीलिए आप देखिए कि बीजेपी के संगठन में स्मृति ईरानी की वापसी हुई है. स्मृति ईरानी वो नेता हैं, जो राहुल गांधी को हरा भी चुकी हैं. लेकिन 2024 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद स्मृति बैकसीट पर चली गई थी.
स्मृति ईरानी को लेकर कांग्रेस का इकोसिस्टम यही माहौल बना रहा था कि राहुल गांधी ने स्मृति ईरानी की राजनीति से छुट्टी कर दी. स्मृति ईरानी तो अब राजनीति छोड़ देंगी. लेकिन दो साल बाद राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर स्मृति ईरानी का बड़ा कमबैक हुआ है. उनकी वापसी को यूपी चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है
इसी तरह से दूसरा बड़ा चेहरा है राम माधव का है. राम माधव संघ से आते हैं. साल 2014 में उन्हें संघ से बीजेपी में लाया गया था. वो राष्ट्रीय महासचिव थे. अमित शाह के अध्यक्ष रहते हुए उन्हें जम्मू-कश्मीर और नॉर्थ ईस्ट के राज्यों का प्रभारी बनाया गया था. असम में राम माधव के रहते हुए पहली बार बीजेपी की सरकार बनी. जम्मू-कश्मीर में PDP से गठबंधन से लेकर 370 हटाए जाने के मुद्दे पर बीजेपी की बात को उन्होंने मजबूती से आगे रखा.
बीजेपी संगठन की नई टीम के ऐलान के साथ ही ये अटकलें भी लगने लगी कि क्या आगे कैबिनेट फेरबदल भी हो सकता है, क्योंकि आप देखिए कि बीजेपी संगठन की नई टीम में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल का भी नाम है. केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को पार्टी का र्कोषाध्यक्ष बनाया गया है. पीयूष गोयल को संगठन में अहम जिम्मेदारी मिलने से ये कयास तेज हो गए हैं क्या पीएम के मंत्रियों की टीम भी बदलेगी. क्योंकि बीजेपी में एक व्यक्ति, एक पद की पॉलिसी है. इसलिए सवाल उठे कि क्या पीयूष गोयल कोषाध्यक्ष रहने के साथ साथ मंत्री भी बने रहेंगे या फिर वहां से हटेंगे. इस वजह से पीयूष गोयल को कैबिनेट से बाहर रहना पड़ सकता है. पिछले कुछ अरसे से कैबिनेट में फेरबदल की चर्चा भी चल रही है, इसलिए बहुत संभव है कि आगे पीएम मोदी के मंत्रियों की टीम भी बदल जाए.