भारत में पोलैंड के राजदूत पियोत्र एंटोनी स्विटाल्स्की ने एक दिन पहले भारत की सराहना की. उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ भारत के कदम को सराहनीय बताया. इसके साथ ही उन्होंने साल 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान भारत के लिए पोलैंड के सपोर्ट को याद किया. उन्होंने बताया कि बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान भारतीय सेना ने पोलिश टैंकों का यूज किया थआ. पोलैंड ने तुरंत ही बांग्लादेश को एक देश के तौर पर रिकोगनाइज किया था. उन्होंने कहा, “भारतीय सेना ने बांग्लादेश को आज़ाद कराने के लिए पोलिश टैंकों का इस्तेमाल किया था. यह एक मशहूर कहानी है.”
पियोत्र एंटोनी स्विटाल्स्की ने इस संघर्ष के दौरान पोलैंड के कूटनीतिक रुख की ओर भी इशारा किया. उन्होंने कहा, “साफ है कि हम आपके पक्ष में थे.” उनकी बातें भारत-पोलैंड संबंधों के एक कम चर्चित पहलू पर ध्यान दिलाती हैं, जिसमें रक्षा सहयोग, संयुक्त राष्ट्र में कूटनीति और बांग्लादेश की आज़ादी के लिए वारसॉ का शुरुआती समर्थन शामिल है.
भारत ने करवाया बांग्लादेश को आजाद
बांग्लादेश मुक्ति संग्राम 25 मार्च 1971 को शुरू हुआ. पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में दमनकारी कार्रवाई शुरू की. इस हिंसा से एक बड़ा मानवीय संकट पैदा हो गया और लगभग 1 करोड़ (10 मिलियन) शरणार्थी भारत आ गए. भारत दिसंबर में सीधे युद्ध में शामिल हुआ और मुक्ति वाहिनी के साथ मिलकर लड़ा. 16 दिसंबर को ढाका में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया, जिसके बाद बांग्लादेश का गठन हुआ. पोलैंड ने मुख्य रूप से एक ऐसे राजनीतिक समाधान का समर्थन किया जो पूर्वी पाकिस्तान के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करे, न कि इस संकट को केवल भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य टकराव के तौर पर देखे.
संयुक्त राष्ट्र में पोलैंड का प्रस्ताव
पोलैंड का सबसे मज़बूत कूटनीतिक कदम दिसंबर 1971 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उठाया गया. पोलैंड ने एक ड्राफ्ट रेजोल्यूशन(मसौदा प्रस्ताव) में पूर्वी पाकिस्तान के लोगों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को सत्ता सौंपने की बात कही. इसमें युद्धविराम और उस इलाके से पाकिस्तानी सेना को हटाने का भी प्रस्ताव था. यह प्रस्ताव इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने पाकिस्तान के 1970 के चुनावों से मिले जनादेश को मान्यता दी थी, जिसमें शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग को बहुमत मिला था. पौलेंड का यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका. लेकिन इसका असर चुनाव नतीजों और पाकिस्तानी सेना की वापसी का आधार बना. यह पौलेंड का बांग्लादेश के लिए राजनीतिक समाधान दिखाता था.
भारत ने पोलिश सैन्य हथियार इस्तेमाल किया
पियोत्र एंटोनी स्विटाल्स्की ने भारत के साथ पोलैंड के रक्षा सहयोग, खासकर 1971 के युद्ध के दौरान पोलैंड में बने टैंकों के इस्तेमाल को भी याद किया. उन्होंने कहा, “भारतीय सेना ने बांग्लादेश को आज़ाद कराने के लिए पोलिश टैंकों का इस्तेमाल किया था.” भारतीय सेना ने 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में हुए ऑपरेशन के दौरान PT-76 एम्फीबियस टैंकों (पानी और ज़मीन दोनों पर चलने वाले टैंक) का इस्तेमाल किया था. ये टैंक पूर्वी इलाके के मुश्किल नदी-नालों वाले क्षेत्र के लिए उपयुक्त थे. भारत और पोलैंड के बीच सैन्य संबंध युद्ध से पहले ही बन चुके थे, जिसकी वजह से 1971 तक पोलैंड में बने उपकरण भारत के रक्षा साजो-सामान का हिस्सा बन गए थे.
युद्ध के तुरंत बाद पोलैंड ने बांग्लादेश को मान्यता दी
पाकिस्तान के सरेंडर करने के एक महीने से भी कम समय के बाद, 12 जनवरी 1972 को पोलैंड ने बांग्लादेश को मान्यता दी. इस कदम से पोलैंड नए आज़ाद देश को मान्यता देने वाले शुरुआती देशों में शामिल हुआ और वारसॉ (पोलैंड की राजधानी) और ढाका (बांग्लादेश की राजधानी) के बीच औपचारिक राजनयिक संबंधों की शुरुआत हुई. पोलैंड की यह मान्यता संघर्ष के दौरान उसके रुख के अनुरूप थी, जिसमें उसने पूर्वी पाकिस्तान के चुने हुए प्रतिनिधियों पर केंद्रित राजनीतिक समाधान का समर्थन किया था.
कोल्ड वॉर के दौर की पार्टनरशिप
1971 में पोलैंड का रुख व्यापक शीत युद्ध से भी प्रभावित था. सोवियत संघ के नेतृत्व वाले पूर्वी गुट के सदस्य के तौर पर, वारसॉ के मॉस्को के साथ करीबी राजनीतिक संबंध थे, जबकि भारत ने 1971 की भारत-सोवियत मित्रता और सहयोग संधि के ज़रिए सोवियत संघ के साथ अपने संबंध मजबूत किए थे. इसलिए भारत के लिए, पोलैंड की भूमिका राजनयिक और रक्षा संबंधों के उस नेटवर्क का हिस्सा थी जिसने एक अहम दौर में समर्थन दिया था. युद्ध के मैदान में इस्तेमाल किए गए सैन्य उपकरणों से लेकर संयुक्त राष्ट्र में उसके रुख और बांग्लादेश को जल्द मान्यता देने तक, पोलैंड की भूमिका भारत के 1971 के हस्तक्षेप के दौरान मिले अंतरराष्ट्रीय समर्थन पर एक अलग नज़रिए से रोशनी डालती है.