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भारतीय संस्कृति के प्रत्येक पर्व के पीछे श्रेष्ठ संदेश और जीवन मूल्य छिपे हैं। पर्वों को केवल परंपरा के रूप में मनाने के बजाय उनके मूल भाव को समझकर जीवन में उतारने की जरूरत है। रक्षाबंधन आत्मीयता, धर्म संरक्षण, विश्वास और पारिवारिक मूल्यों को मजबूत करने की प्रेरणा देता है। ये बातें मुनि प्रमाण सागर महाराज ने गुणायतन परिसर में आयोजित प्रवचन सभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहीं। मुनि श्री ने कहा कि पर्व केवल धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह आत्मचिंतन, भावशुद्धि और जीवन में सकारात्मक बदलाव का अवसर हैं। यदि पर्व महज औपचारिकता बनकर रह जाएं तो उनका वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता। पूजा-पाठ, व्रत और अनुष्ठान तभी सार्थक हैं, जब उनके साथ शुद्ध और निर्मल भाव जुड़े हों। व्यक्ति मंदिर जाए या पूजा-पाठ करे, लेकिन यदि उसके भीतर राग-द्वेष, क्रोध, अहंकार और स्वार्थ बना रहे तो वास्तविक आत्मपरिवर्तन संभव नहीं है। धर्म का उद्देश्य बाहरी जीवन के साथ अंतर्मन को भी निर्मल बनाना है। मुनि श्री ने सोलह कारण भावनाओं के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि व्यक्ति को आत्ममंथन करना चाहिए कि जिन गुणों का वह चिंतन कर रहा है, क्या वे व्यवहार में दिख रहे हैं। 28 अगस्त शुक्रवार पूर्णिमा को प्रातः 8 बजे से 55 मिनट की वृहद शांतिधारा ऋद्धि मंत्रों के साथ मुनि श्री के मुखारविंद से संपन्न होगी और इसके बाद रक्षाबंधन पर प्रवचन होगा। वहीं 29 अगस्त से प्रतिदिन सुबह 8:30 बजे सोलह कारण भावनाओं के आध्यात्मिक व व्यावहारिक पक्षों पर विशेष प्रवचन होंगे।
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