Last Updated:
Handmade Shoes: झारखंड में देवघर जिले के रोहिणी में एक दुकान ऐसी है. जहां जूते-चप्पल बनाने का काम आज भी हाथों से किया जाता है. यहां बाजार में मशीनों से तैयार जूते-चप्पलों की भरमार है, लेकिन कुछ लोगों का भरोसा आज भी कारीगर के हाथों पर कायम है. इस भरोसे की पहचान रोहिणी की फैशन शू दुकान है. जहां चमड़े को काटने से लेकर जूते का आकार देने तक का काम हाथों से किया जाता है.
यहां तैयार होने वाले जूते सिर्फ पहनने के काम नहीं आते, बल्कि उस हुनर की पहचान भी हैं, जिसे एक कारीगर ने अपनी जिंदगी के कई दशक देकर सीखा और संभालकर रखा है. बदलते समय में मशीनों ने इस काम को जरूर प्रभावित किया है, लेकिन हाथों से तैयार किए जाने वाले जूतों की अपनी अलग पहचान आज भी बनी हुई है.
दुकानदार रामदास ने लोकल 18 से खास बातचीत में बताया कि उन्होंने महज 15 साल की उम्र में अपने पिता से जूते बनाने का काम सीखा था. आज उनकी उम्र 62 साल है और वह कई दशकों से इसी काम में जुटे हुए हैं. रामदास बताते हैं कि चमड़े के जूते-चप्पल तैयार करने में काफी मेहनत लगती है. एक जोड़ी जूता बनाने में करीब 40 से 45 मिनट का समय लगता है.
उनका कहना है कि मशीन से काम करने के लिए काफी पूंजी लगानी पड़ती है, लेकिन उतनी पूंजी नहीं होने के कारण उन्हें आज भी घंटों मेहनत करके हाथों से जूते बनाने पड़ते हैं. हालांकि, हाथ से काम करने की अपनी खासियत है. रामदास के मुताबिक, जूते में हाथों से की गई पेस्टिंग जितनी मजबूती देती है, उतनी मजबूती मशीन से नहीं मिल पाती. इसी वजह से स्थानीय लोगों का भरोसा आज भी उनके हाथों के काम पर बना हुआ है.
Add News18 as
Preferred Source on Google
रामदास की दुकान फैशन शू में नए जूते-चप्पल बनाने के साथ पुराने जूतों की मरम्मत भी की जाती है. यहां जूतों की कीमत करीब 500 रुपये से शुरू होकर 1000 रुपये तक जाती है. रामदास बताते हैं कि उनके पास आसपास के करीब 14 गांवों से लोग जूते-चप्पल बनवाने आते हैं. इन ग्राहकों में कई पुलिसकर्मी भी शामिल हैं.
थाने में ड्यूटी करने वाले पुलिसकर्मियों को चमड़े के जूते पहनने पड़ते हैं. इसलिए वे भी उनकी दुकान पर पहुंचते हैं. रामदास कहते हैं कि ग्राहकों को भरोसा है कि उनकी दुकान पर असली चमड़े के जूते मिलते हैं. यही पुराना भरोसा लोगों को बार-बार यहां खींच लाता है. उनके लिए यह भरोसा किसी प्रचार से नहीं, बल्कि वर्षों से किए जा रहे काम से बना है.
हालांकि, समय के साथ जूते बनाने के इस पारंपरिक काम पर मशीनों का असर भी पड़ा है. रामदास बताते हैं कि मशीनों से जूते बनाने का चलन बढ़ने के बाद उनके काम पर प्रभाव पड़ा है. मशीनों की मदद से उत्पादन करना आसान हो गया है, जबकि हाथों से जूते तैयार करने में समय और मेहनत दोनों अधिक लगते हैं. इसके बावजूद वह अपने पुराने तरीके से काम कर रहे हैं. उनके लिए जूते बनाना केवल एक पेशा नहीं, बल्कि बचपन में पिता से सीखा हुआ हुनर है, जिसे वह आज भी आगे बढ़ा रहे हैं. रोहिणी की फैशन शू दुकान पर आने वाले ग्राहकों का भरोसा इसी हुनर और मजबूती से जुड़ा हुआ है.