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स्ट्रॉबेरी की खेती में वाटर सॉल्यूबल फर्टिलाइजर का करें इस्तेमाल, 19:19:19 से...


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स्ट्रॉबेरी की खेती में वाटर सॉल्यूबल फर्टिलाइजर करें इस्तेमाल, बढ़ेगी पैदावार

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Strawberry Cultivation Fertilizer Tips: पलामू में स्ट्रॉबेरी की खेती किसानों के लिए कमाई का बेहतर जरिया है. कृषि विशेषज्ञ डॉ. प्रमोद कुमार ने अच्छी पैदावार के लिए वैज्ञानिक तरीकों के इस्तेमाल, सही दूरी पर बुवाई, मल्चिंग और 19:19:19 उर्वरक के इस्तेमाल की सलाह दी है.

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पलामू. स्ट्रॉबेरी की खेती किसानों के लिए कम समय में अच्छी आमदनी का बेहतर जरिया बन सकती है. खासकर पलामू जैसे क्षेत्रों में किसान इसकी खेती के जरिए अपनी आय बढ़ा सकते हैं. हालांकि, बेहतर उत्पादन और गुणवत्तापूर्ण फल पाने के लिए खेती का वैज्ञानिक तरीका अपनाना बेहद जरूरी है. इसमें उन्नत प्रभेद के चयन से लेकर पौधों की दूरी, सिंचाई, उर्वरक प्रबंधन और मल्चिंग तक का विशेष ध्यान रखना पड़ता है. कृषि विशेषज्ञ डॉ. प्रमोद कुमार ने बताया कि स्ट्रॉबेरी की खेती में वाटर सॉल्यूबल फर्टिलाइजर यानी पानी में घुलनशील उर्वरक का इस्तेमाल करने से पौधों को जरूरी पोषक तत्व आसानी से उपलब्ध कराए जा सकते हैं.

19:19:19 उर्वरक से मिलेगा पौधों को पोषण
कृषि वैज्ञानिक ने आगे बताया कि स्ट्रॉबेरी की खेती में किसान वाटर सॉल्यूबल फर्टिलाइजर का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसमें 19:19:19 एनपीके उर्वरक काफी उपयोगी होता है. इसमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश तीनों पोषक तत्व समान अनुपात में मौजूद होते हैं. नाइट्रोजन पौधों की बढ़वार में मदद करता है, जबकि फॉस्फोरस जड़ों के विकास और पोटाश फल की गुणवत्ता तथा पौधों की मजबूती के लिए जरूरी होता है. पानी में घुलनशील होने के कारण इसे सिंचाई के पानी के साथ भी दिया जा सकता है. इससे पौधों तक पोषक तत्व पहुंचाने में सुविधा होती है.

पौधों के बीच सही दूरी रखना जरूरी
वे आगे कहते हैं कि स्ट्रॉबेरी की बेहतर पैदावार के लिए खेत में पौधों का सही प्रबंधन जरूरी है. इसके लिए पौधे से पौधे की दूरी 20 से 25 सेंटीमीटर और लाइन से लाइन की दूरी 80 से 100 सेंटीमीटर तक रखी जा सकती है. इससे पौधों को पर्याप्त जगह मिलती है और उनकी बढ़वार बेहतर तरीके से होती है. साथ ही खेत में निराई-गुड़ाई, सिंचाई और फल की देखभाल करने में भी आसानी होती है. किसान चांडलर, पूसा अर्ली समेत अन्य उपयुक्त प्रभेदों का चयन कर सकते हैं. प्रभेद का चुनाव स्थानीय जलवायु और बाजार की मांग को ध्यान में रखकर करना चाहिए.

50 से 60 दिनों में शुरू होने लगता है फल
उन्होंने बताया कि स्ट्रॉबेरी की खेती की खासियत यह है कि उचित देखभाल करने पर रोपाई के लगभग 50 से 60 दिनों बाद पौधों में फल आने शुरू हो सकते हैं. इस दौरान पौधों को समय-समय पर जरूरी पोषक तत्व देना महत्वपूर्ण होता है. संतुलित उर्वरक प्रबंधन और नियमित सिंचाई से फल का आकार और गुणवत्ता बेहतर हो सकती है. किसान सामान्य तौर पर मार्च महीने तक इसकी फसल से उत्पादन पा सकते हैं. ऐसे में पूरे फसल चक्र के दौरान पौधों की नियमित निगरानी जरूरी है.

मल्चिंग और पैकिंग पर भी दें ध्यान
उन्होंने आगे बताया कि स्ट्रॉबेरी की खेती में मल्चिंग यानी खेत की मिट्टी को प्लास्टिक शीट से ढकना काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. इससे फल सीधे मिट्टी के संपर्क में नहीं आते और उनके खराब होने की आशंका कम होती है. साथ ही खरपतवार नियंत्रण और मिट्टी में नमी बनाए रखने में भी मदद मिलती है. वहीं, फल की तुड़ाई के बाद उसकी पैकिंग पर विशेष ध्यान देना चाहिए. स्ट्रॉबेरी के फल काफी नाजुक होते हैं. इसलिए इनकी पैकिंग हवादार और उचित आकार वाले बॉक्स में करनी चाहिए, ताकि परिवहन के दौरान फल दबकर खराब न हों.

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Raina Shukla

Raina Shukla is an experienced journalist and content professional with nearly two decades of experience in print and digital media. She holds a Master’s degree in Mass Communication and Journalism from Bundelk…

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