इन दोनों ही महत्वपूर्ण आयोजनों में प्रियंका गांधी वाड्रा मौजूद थीं, लेकिन उन्हें मंच से जनता को संबोधित करने का मौका नहीं दिया गया. बीजेपी ने इसी बिंदु को आधार बनाकर कांग्रेस पर चौतरफा हमला बोला है. बीजेपी का कहना है कि जब गैर-सांसद और सहयोगी दलों के कई छोटे नेताओं तक को माइक सौंपा जा रहा था, तब कांग्रेस की पूर्व महासचिव और देश भर में जनसभाएं संबोधित करने वाली प्रियंका गांधी का चुपचाप दर्शक दीर्घा में बैठना कई अनसुलझे सवाल खड़े करता है.
संबित पात्रा का तीखा तंज: ‘क्या परिवार के भीतर ही चोरी हो गया प्रियंका का वोट?’
बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर एक विस्तृत वीडियो संदेश जारी कर कांग्रेस और गांधी परिवार पर सीधा निशाना साधा. पात्रा ने आरोप लगाया कि दोनों आयोजनों के दौरान प्रियंका गांधी के चेहरे पर साफ तौर पर नाराजगी और बेबसी झलक रही थी.
संबित पात्रा ने कहा, “शनिवार को राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस द्वारा आयोजित मॉक पार्लियामेंट के दौरान मैंने एक अजीब चीज देखी. राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी ने प्रियंका वाड्रा को अपनी बात रखने का कोई मौका नहीं दिया. कई ऐसे लोग बोले जो सांसद तक नहीं हैं, लेकिन प्रियंका को बोलने से वंचित रखा गया.”
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पात्रा ने आगे कहा, “रविवार को रामलीला मैदान की रैली में भी सबने अपने विचार रखे, लेकिन प्रियंका वाड्रा वहां भी उदास बैठी रहीं. उन्हें दोबारा बोलने का मौका नहीं मिला. क्या गांधी परिवार के भीतर ही कोई बड़ा राजनीतिक खेल चल रहा है? क्या राहुल गांधी इस बात से डरते हैं कि यदि प्रियंका वाड्रा को एक मजबूत नेता के रूप में पेश किया गया, तो खुद राहुल दरकिनार हो जाएंगे? क्या इसी डर से गांधी परिवार के भीतर ही प्रियंका वाड्रा का वोट चुरा लिया गया है?”
‘राहुल कैंप बनाम प्रियंका कैंप’: प्रदीप भंडारी के सनसनीखेज आरोप
संबित पात्रा के आरोपों को आगे बढ़ाते हुए बीजेपी प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने कांग्रेस संगठन के ढांचे पर गंभीर सवाल उठाए. भंडारी ने दावा किया कि कांग्रेस में अब आंतरिक रूप से दो आधिकारिक धड़े बन चुके हैं- एक ‘राहुल कैंप’ और दूसरा ‘प्रियंका कैंप’. उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी पार्टी संगठन पर अपना एकछत्र और निर्विवाद वर्चस्व बनाए रखने के लिए अपनी ही बहन के उभार को दबाने में लगे हुए हैं.
प्रदीप भंडारी ने सवाल किया, “क्या पूरा देश अब राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के बीच की खुली खींचतान का गवाह बन रहा है? कांग्रेस पार्टी में पूर्व महासचिव के तौर पर वरिष्ठ दर्जा रखने के बावजूद प्रियंका को रामलीला मैदान में बोलने से उनके भाई ने क्यों रोका?”
भंडारी ने मॉक पार्लियामेंट को राहुल गांधी का “सौवां रीलॉन्च प्रयास” करार देते हुए कहा कि उस कार्यक्रम में प्रियंका गांधी को जानबूझकर दूसरी पंक्ति में बैठाया गया ताकि सारा ध्यान सिर्फ राहुल पर केंद्रित रहे. भंडारी ने तंज कसते हुए पूछा कि क्या आज की कांग्रेस की असली हकीकत गांधी-वाड्रा परिवार के भीतर भाई और बहन के बीच वर्चस्व की लड़ाई बनकर रह गई है?
रेहान वाड्रा की आर्ट एग्जिबिशन विवाद से क्यों जुड़े इस खींचतान के तार?
बीजेपी द्वारा भाई-बहन के बीच मतभेदों का दावा करने का यह पहला मामला नहीं है. करीब एक हफ्ते पहले प्रियंका गांधी के बेटे रेहान वाड्रा की एक कला व फोटोग्राफी प्रदर्शनी को लेकर भी बीजेपी ने राहुल गांधी के रुख पर सवाल उठाए थे. बीकानेर हाउस में आयोजित होने वाली रेहान की प्रदर्शनी ‘नो आइडिया इज फाइनल’ के उद्घाटन से ठीक पहले कथित तौर पर 70 से अधिक तस्वीरें हटाने के निर्देश दिए गए थे, क्योंकि उनमें दिल्ली में हुए छात्र-युवा आंदोलनों के दृश्य थे.
उस समय प्रियंका गांधी ने इस फैसले का खुलकर कड़ा विरोध किया था और सत्ता पक्ष पर युवाओं की आवाज दबाने का सीधा आरोप लगाया था. इसके विपरीत, राहुल गांधी उस समय वियतनाम के दौरे पर थे. बीजेपी ने रेखांकित किया कि राहुल वियतनाम से विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर लगातार सोशल मीडिया पोस्ट कर रहे थे, लेकिन उन्होंने अपने भांजे की प्रदर्शनी से जुड़े इस विवाद पर चुप्पी साधे रखी.
बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया था कि रेहान के मूल प्रस्ताव में केवल प्रकृति, वन्यजीव और मूर्तिकला की तस्वीरें थीं, लेकिन बाद में परिवार के राजनीतिक लॉन्च के दबाव में उसमें राजनीतिक तस्वीरें डाली गईं. राहुल की इस पूरे मसले पर बेरुखी को बीजेपी ने दोनों पक्षों के बीच संवादहीनता और असहमति का साफ संकेत बताया था.
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क्या वाकई कोई गुटबाजी है या विपक्ष की एकता पर प्रहार?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी के ये आरोप महज बयानबाजी नहीं हैं, बल्कि यह कांग्रेस की संगठनात्मक रणनीति और गांधी परिवार की एकजुटता के नैरेटिव पर सीधे चोट करने की एक सोची-समझी योजना है. कांग्रेस हमेशा राहुल और प्रियंका को एक-दूसरे के पूरक और टीम के रूप में प्रस्तुत करती आई है, जहां राहुल मुख्य नीतिगत और संसदीय मोर्चे पर कमान संभालते हैं, वहीं प्रियंका जनसंपर्क और चुनावी प्रचार में तुरुप का पत्ता साबित होती हैं.
हालांकि, बीजेपी लगातार यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश में जुटी है कि राहुल गांधी का सलाहकार तंत्र प्रियंका गांधी के बढ़ते प्रभाव से असहज रहता है. विपक्षी खेमे का तर्क है कि रामलीला मैदान या मॉक पार्लियामेंट में वक्ताओं का चयन गठबंधन के व्यापक समीकरणों और समय की पाबंदी को देखकर किया गया था, न कि किसी निजी पसंद या नापसंद के आधार पर. फिर भी, संसद के शीतकालीन सत्र और आगामी राज्यों के चुनावों से पहले बीजेपी द्वारा गांधी परिवार के भीतर ‘भाई बनाम बहन’ के नैरेटिव को इतनी प्रमुखता से उछालना यह स्पष्ट करता है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा कांग्रेस के भीतर और बाहर दोनों जगह राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में रहने वाला है.