Last Updated:
Palamu Potters Getting Benefit From Soil Art Board: पलामू में माटी कला बोर्ड की योजना से कुम्हारों को नब्बे प्रतिशत अनुदान पर मोटर चालित चाक और मशीन मिल रही है. इससे पारंपरिक काम आसान हुआ है, उत्पादन बढ़ा है और कारीगरों की अच्छी कमाई हो रही है. पहले की तुलना में उनको मेहनत भी कम करनी पड़ती है.
पलामू. सरकार की ओर से पारंपरिक कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाने और उनके रोजगार को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं. इन योजनाओं का लाभ अब ग्रामीण क्षेत्रों के कारीगरों को भी मिलने लगा है. दीपावली के अवसर पर मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ने के साथ कुम्हारों के कारोबार में भी तेजी आ गई है. खास बात यह है कि माटी कला बोर्ड की योजना के तहत कुम्हारों को मोटर चालित चाक और मिट्टी मिलाने की मशीन 90 प्रतिशत अनुदान पर उपलब्ध कराई जा रही है. इससे पारंपरिक मिट्टी कला को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के साथ कारीगरों की मेहनत कम हो रही है और उत्पादन क्षमता काफी बढ़ रही है.
लगती थी बहुत मेहनत, होता था बहुत कम काम
लेस्लीगंज निवासी कृष्ण प्रजापति भी सरकारी योजना का लाभ लेकर अपने पारंपरिक कारोबार को नई ऊंचाई देने में जुटे हैं. उन्होंने करीब छह साल पहले मिट्टी के दीये, घड़े और अन्य सजावटी सामान बनाने का काम शुरू किया था. कृष्ण बताते हैं कि पहले वे लकड़ी की मदद से चाक घुमाकर मिट्टी के बर्तन और दीये तैयार करते थे. पुराने तरीके में चाक की गति कम रहती थी और उसे लगातार घुमाने में काफी शारीरिक मेहनत करनी पड़ती थी. एक बार चाक घूमने पर महज 10 से 12 पीस ही तैयार हो पाते थे. चाक घुमाने से लेकर सामान बनाने तक का काम खुद करना पड़ता था, जिससे समय अधिक लगता था और उत्पादन भी सीमित रहता था.
मशीन से समय पर हो जाता है काम
उन्होंने बताया कि करीब एक साल पहले माटी कला बोर्ड की ओर से उन्हें 90 प्रतिशत अनुदान पर मोटर चालित चाक और मिट्टी मिलाने की मशीन मिली. इसके बाद उनके काम करने का तरीका पूरी तरह बदल गया. अब मोटर चालित चाक की मदद से कम समय में बड़ी संख्या में दीये और मिट्टी के अन्य सामान तैयार कर लेते हैं. वहीं, पग मिल मशीन से मिट्टी को अच्छी तरह मिलाना भी आसान हो गया है. पहले मिट्टी तैयार करने में हाथ और पैर से काफी मेहनत करनी पड़ती थी, लेकिन अब मशीन से यह काम कम समय में हो जाता है.
कारोबार में हुआ काफी सुधार
कृष्ण प्रजापति बताते हैं कि मिट्टी को मशीन से तैयार करने के बाद चाक पर अलग-अलग आकार दिया जाता है. इसके बाद तैयार दीयों और बर्तनों को एक से दो दिन तक धूप में सुखाया जाता है. फिर लकड़ी जलाकर आग की भट्ठी में इन्हें पकाया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में मेहनत और समय दोनों लगते हैं. इसके बावजूद मोटर चालित मशीन मिलने से उत्पादन और कारोबार में काफी सुधार हुआ है.
हो जाती है इतनी कमाई
उन्होंने बताया कि इस काम से महीने में करीब 30 से 40 हजार रुपये तक की कमाई हो जाती है. दीपावली के दौरान दीयों की मांग बढ़ने से कारोबार को विशेष लाभ मिलता है. फिलहाल वे 100 रुपये में 100 मिट्टी के दीये बेच रहे हैं. उनके बनाए दीयों और मिट्टी के अन्य सामानों की बिक्री आसपास के बाजारों के साथ मेदिनीनगर (डालटनगंज) के बाजारों में भी होती है.
कृष्ण प्रजापति का मानना है कि सरकारी योजनाओं के माध्यम से आधुनिक मशीनें मिलने से पारंपरिक कुम्हारों का काम आसान हुआ है. इससे न केवल उनकी आमदनी बढ़ाने का अवसर मिला है, बल्कि मिट्टी कला और पारंपरिक रोजगार को भी नई पहचान मिल रही है.
About the Author
Raina Shukla is an experienced journalist and content professional with nearly two decades of experience in print and digital media. She holds a Master’s degree in Mass Communication and Journalism from Bundelk…