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Deoghar Pathrol Kali Temple: देवघर से 54 किमी दूर 500 साल पुराने पथरोल काली मंदिर की परंपराएं अनोखी हैं. राजा दिग्विजय सिंह ने इसकी स्थापना की थी. यहाँ प्रतिमा पर फूल गिरने से मनोकामना पूरी होने का संकेत मिलता है. दीपावली पर लोग घरों से पहले मंदिर में दीप जलाते हैं.
Deoghar Pathrol Temple Tradition: वैसे तो देवघर को देवों की नगरी कहा जाता है.यहां के कण-कण में देवी-देवताओं का वास माना जाता है.यही वजह है कि बाबा बैद्यनाथ की नगरी में भगवान शिव के साथ-साथ मां शक्ति की भी विशेष पूजा-अर्चना होती है.लेकिन आज हम आपको देवघर से करीब 54 किलोमीटर दूर एक ऐसे काली मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां की परंपराएं और मान्यताएं अपने आप में बेहद खास हैं. इस मंदिर में मां काली के दर्शन के लिए सालों भर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है, लेकिन दीपावली के मौके पर यहां का नजारा कुछ अलग ही होता है.आम भक्तों के साथ-साथ कई नेता और जनप्रतिनिधि भी मां के दरबार में माथा टेकने पहुंचते हैं. हम बात कर रहे हैं पथरोल स्थित करीब 500 साल पुराने प्रसिद्ध काली मंदिर की.
क्या कहते है मंदिर के पुजारी
इस मंदिर का इतिहास भी काफी दिलचस्प है.मंदिर के पुजारी विजय कुमार मुखर्जी बताते हैं कि पहले यहां वेदी की पूजा की जाती थी.मान्यता है कि एक दिन राजा दिग्विजय सिंह के सपने में मां काली आईं और उन्हें कोलकाता के कालीघाट से मां की प्रतिमा लाकर स्थापित करने का आदेश दिया.इसके बाद राजा ने मां के आदेश का पालन करते हुए कोलकाता के कालीघाट से मां काली की प्रतिमा मंगवाई. प्रतिमा को डोली में रखकर पूरे विधि-विधान के साथ मंदिर में स्थापित किया गया. कहा जाता है कि इसी वजह से पथरोल काली मंदिर का स्वरूप भी कोलकाता के प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर से मिलता-जुलता है. आज करीब पांच सौ साल बाद भी इस मंदिर में मां काली के प्रति लोगों की गहरी आस्था बनी हुई है.
अनोखी है इस मंदिर की यह परम्परा
इस मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा फूलास के नाम से जानी जाती है. यहां भक्त सिर्फ मां के दर्शन करने नहीं आते, बल्कि अपनी मनोकामनाएं लेकर भी पहुंचते हैं. जब किसी श्रद्धालु की कोई खास इच्छा होती है तो मंदिर के तीर्थपुरोहित मां काली के सामने उस मनोकामना के पूरा होने के लिए निवेदन करते हैं.इसके बाद मां की प्रतिमा पर चढ़ाए गए फूल के गिरने का इंतजार किया जाता है. स्थानीय मान्यता के अनुसार अगर मां के हाथ से फूल गिर जाता है तो इसे मनोकामना पूरी होने का संकेत माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि फूल गिरने पर अगले एक महीने के भीतर भक्त की मनोकामना पूरी हो जाती है. यही अनोखी परंपरा इस मंदिर को दूसरे मंदिरों से अलग पहचान देती है. दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु भी अपनी मुराद लेकर इस परंपरा में शामिल होते हैं.
दीपावली में लाखों श्रद्धालू की जुटती है भीड़
वहीं दीपावली के मौके पर इस मंदिर में एक और खास परंपरा निभाई जाती है. यहां के लोग अपने घरों में दीपक जलाने से पहले सबसे पहले मां काली के दरबार में दीप जलाते हैं. मंदिर परिसर को दीपों से सजाया जाता है और मां की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. इसके बाद ही श्रद्धालु अपने-अपने घरों में दीपक जलाकर दीपावली का त्योहार मनाते हैं. लोगों का मानना है कि मां के दरबार में सबसे पहले दीप जलाने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है. यही वजह है कि दीपावली की रात पथरोल काली मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है. कुल मिलाकर पथरोल का यह प्राचीन काली मंदिर सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि सैकड़ों साल पुरानी आस्था, परंपरा और विश्वास का ऐसा केंद्र है. जहां आज भी मां के एक फूल के गिरने का इंतजार भक्त बड़ी श्रद्धा से करते हैं.
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अमित रंजन वर्तमान में News18 में बिहार, झारखंड और दिल्ली से जुड़ी खबरों के समन्वय और संपादन का कार्य देख रहे हैं. खोजी पत्रकारिता उनकी विशेष रुचि का क्षेत्र है. राजनीति, शिक्षा, खेल, क्राईम और मौसम जैसे विषयों …