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डिजिटल युग में सौंफ-सोपारी से पिथौरागढ़ में दिया जाता है शादी का...


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जब किसी घर में शादी या कोई शुभ काम होता है, तो परिवार का कोई सदस्य खुद गांव के हर घर जाता है. वह अपने हाथों से सौफ और सुपारी देता है और उसी के साथ प्यार भरा निमंत्रण भी. ये तरीका भले ही साधारण लगे, लेकिन इसमें जो अपनापन होता है, वो किसी कार्ड या मैसेज में नहीं मिल सकता. इस परंपरा की खास बात यही है कि इसमें रिश्तों की गर्माहट साफ महसूस होती है. जब कोई खुद आपके घर आकर आपको बुलाता है, तो आपको लगता है कि आपकी अहमियत है

पिथौरागढ़ः आज के समय में सब कुछ डिजिटल हो गया है. शादी हो या जनेऊ, लोग व्हाट्सऐप मैसेज या छपे हुए कार्ड से निमंत्रण भेज देते हैं, लेकिन पहाड़ो में खासकर उत्तराखंड में इसका तरीका थोड़ा अलग और खास है. पहाड़ी इलाकों में आज भी एक ऐसी खूबसूरत परंपरा जिंदा है, जो सीधे दिल से जुड़ती है. यहां आज भी लोगों को न्योता देने के लिए सौफ और सुपारी दी जाती है.

सौफ और सुपारी से दिया जाता है निमंत्रण

जब किसी घर में शादी या कोई शुभ काम होता है, तो परिवार का कोई सदस्य खुद गांव के हर घर जाता है. वह अपने हाथों से सौफ और सुपारी देता है और उसी के साथ प्यार भरा निमंत्रण भी. ये तरीका भले ही साधारण लगे, लेकिन इसमें जो अपनापन होता है, वो किसी कार्ड या मैसेज में नहीं मिल सकता. इस परंपरा की खास बात यही है कि इसमें रिश्तों की गर्माहट साफ महसूस होती है. जब कोई खुद आपके घर आकर आपको बुलाता है, तो आपको लगता है कि आपकी अहमियत है, आपको दिल से याद किया गया है. यही वजह है कि लोग इस परंपरा को आज भी निभा रहे हैं. आज की इस डिजिटल दुनिया में भी पहाड़ के लोगों ने अपनी परम्परा और रीति रिवाजों को कायम रखा हुआ है.

पूरे परिवार को दिया जाता है निमंत्रण

इसी बात पर गांव की पहाड़ी महिला हेमवंती देवी लोकल 18 से बात करते हुए कहती हैं कि, हमारे यहां तो यही रिवाज है. जब हमारे घर शादी होती है तो हम खुद सभी के घर सौफ सुपारी लेकर जाते है और उनके पूरे परिवार को आमंत्रित करते है. ये पुराने जमाने से चली आ रही रीति है क्योंकि उस जमाने में कार्ड और फोन जैसी चीजें नहीं होती है. जब तक हम लोग खुद जाकर न्योता नहीं देते, तब तक मन नहीं मानता.

सौफ-सुपारी देना हमारे लिए सिर्फ बुलावा नहीं, बल्कि सम्मान दिखाने का तरीका है. आज भले ही दुनिया तेजी से बदल रही हो, लेकिन पहाड़ों में ये परंपरा लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े हुए है. ये हमें याद दिलाती है कि असली खुशी और अपनापन छोटे-छोटे तरीकों में छुपा होता है. शायद यही वजह है कि इतनी पुरानी परंपरा आज भी उतनी ही खूबसूरती से निभाई जा रही है.

About the Author

Rajneesh Kumar Yadav

मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें



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