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झारखंडः टाइल्स-मार्बल के दौर में भी फीकी नहीं पड़ी सोहराय की चमक,...


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जमशेदपुर के जोंद्रघोड़ा गांव में सोहराय पेंटिंग की परंपरा आज भी जीवंत है. आधुनिकता के बावजूद ग्रामीण अपनी दीवारों को मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से सजाते हैं. यह कला जल, जंगल और जमीन से उनके गहरे जुड़ाव को दर्शाती है. पशुधन और प्रकृति को समर्पित यह पारंपरिक चित्रकारी आदिवासी समाज की असली पहचान बनी हुई है.

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जमशेदपुर: झारखंड की सांस्कृतिक पहचान में आदिवासी परंपराओं का एक अलग ही स्थान है. इन्हीं परंपराओं में शामिल है प्रकृति से गहराई से जुड़ी सोहराय पेंटिंग. यह सिर्फ दीवारों पर बनाई जाने वाली सजावट नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवंत कला है जो आदिवासी जीवन, उनकी आस्था और प्रकृति के साथ उनके रिश्ते को दर्शाती है. खासकर जमशेदपुर से सटे सुंदरनगर क्षेत्र के जोंद्रघोड़ा गांव में आज भी यह परंपरा पूरे उत्साह और गर्व के साथ निभाई जाती है.

सोहराय पेंटिंग का सीधा संबंध सोहराय पर्व से है, जो हर साल काली पूजा के बाद मनाया जाता है. यह पर्व मुख्य रूप से पशुधन और खेती-किसानी से जुड़ा होता है. इस दौरान गांव के लोग अपने घरों को साफ-सुथरा करते हैं, दीवारों को मिट्टी और गोबर से लीपकर तैयार करते हैं और फिर उन पर खूबसूरत पेंटिंग बनाते हैं. यह प्रक्रिया सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि एक धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान का हिस्सा होती है, जिसमें पूरे परिवार की भागीदारी होती है.

क्या कहते हैं ग्रमीण
जोंद्रघोड़ा गांव के लोग बताते हैं कि सोहराय पेंटिंग उनके पूर्वजों की दी हुई अमूल्य धरोहर है. इस कला में हर चित्र का एक विशेष अर्थ होता है. दीवारों पर बने जानवर, पेड़-पौधे, फूल-पत्तियां और अन्य प्राकृतिक आकृतियां यह दर्शाती हैं कि आदिवासी समाज जल, जंगल और जमीन से कितना गहरा जुड़ा हुआ है. गाय, बैल, हाथी, पक्षी और जंगल के दृश्य उनकी जीवनशैली और आस्था का प्रतीक होते हैं. इन चित्रों के माध्यम से वे प्रकृति के प्रति अपना सम्मान और प्रेम व्यक्त करते हैं.

ग्रामीणों का मानना है कि आधुनिकता के इस दौर में जहां लोग अपने घरों को टाइल्स, मार्बल और महंगे पेंट से सजाने लगे हैं, वहीं सोहराय पेंटिंग उनकी असली पहचान को बनाए रखने का काम करती है. उनका कहना है कि जब किसी घर के बाहर यह पारंपरिक पेंटिंग बनी होती है, तो दूर से ही पहचान हो जाती है कि यह एक आदिवासी परिवार का घर है, जो अपनी जड़ों और संस्कृति से जुड़ा हुआ है.

साल में दो बार की जाती पेंटिंग
आज भी इस गांव में लोग साल में एक या दो बार सोहराय पेंटिंग करते हैं और हर बार नए-नए डिजाइन बनाते हैं. यह न केवल उनकी कला को जीवित रखता है, बल्कि नई पीढ़ी को भी अपनी संस्कृति से जोड़ता है. बुजुर्ग अपने अनुभव और पारंपरिक ज्ञान को युवाओं के साथ साझा करते हैं, जिससे यह परंपरा लगातार आगे बढ़ती रहती है.

सोहराय पेंटिंग सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की पहचान, उनकी संस्कृति और प्रकृति के साथ उनके अटूट संबंध का प्रतीक है. यह परंपरा हमें यह सिखाती है कि आधुनिकता के बीच भी अपनी जड़ों को संजोकर रखना कितना जरूरी है.

About the Author

Prashun Singh

मीडिया में 6 साल का अनुभव है. करियर की शुरुआत ETV Bharat (बिहार) से बतौर कंटेंट एडिटर की थी, जहां 3 साल तक काम किया. पिछले 3 सालों से Network 18 के साथ हूं. यहां बिहार और झारखंड से जुड़ी खबरें पब्लिश करता हूं.



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