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विधानसभा हार के बाद ममता बनर्जी का ‘बहरामपुर प्लान’: यूसुफ पठान की...


What Is Next Mamata Banerjee Plan After Bengal Lost: पश्चिम बंगाल की सत्ता की चाबी दीदी के हाथ से फिसल गई है. लेकिन ममता बनर्जी अभी भी अपने वजूद को बचाने के लिए जुगत लगा रही हैं. एक तरफ भवानीपुर विधानसभा सीट पर मिली करारी शिकस्त ने टीएमसी के खेमे में सन्नाटा पसरा दिया है, मगर इस सन्नाटे के बीच एक ऐसी खिचड़ी पक रही है जिसने दिल्ली से लेकर कोलकाता तक का सियासी पारा चढ़ा सकता है. सूत्रों की मानें तो ममता बनर्जी अब संसद के रास्ते अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की जुगत में हैं. इसके लिए उन्होंने बहरामपुर लोकसभा सीट को चुना है, जहां से वर्तमान में पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान सांसद हैं. खबर है कि यूसुफ पठान से इस्तीफा दिलाकर दीदी खुद वहां से उपचुनाव लड़ सकती हैं. लेकिन यह रास्ता इतना आसान नहीं है. एक तरफ भाजपा का बढ़ता ग्राफ है और दूसरी तरफ साख बचाने की चुनौती. अगर बहरामपुर में भी पासा उल्टा पड़ा, तो दीदी की रही-सही इज्जत भी दांव पर लग जाएगी.  टीएमसी के अंदरखाने इस पर मंथन शुरू हो चुका है.

बहरामपुर की पिच और दीदी का दांव

बहरामपुर हमेशा से बंगाल की राजनीति का सबसे दिलचस्प मोड़ रहा है. कभी इसे अधीर रंजन चौधरी का अभेद्य किला माना जाता था, जिसे 2024 में यूसुफ पठान ने ढहा दिया था. अब उसी पिच पर ममता बनर्जी खुद बैटिंग करने की तैयारी में हैं. टीएमसी के रणनीतिकारों को लगता है कि ममता का संसद पहुंचना भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर माहौल बनाने के लिए जरूरी है. लेकिन राजनीति में टाइमिंग का बड़ा महत्व होता है. विधानसभा चुनाव में हार के तुरंत बाद किसी दूसरी सीट पर हाथ आजमाना जनता के बीच क्या संदेश देगा? क्या बहरामपुर के लोग दीदी को ‘शरणार्थी’ नेता के तौर पर देखेंगे या फिर उन्हें बंगाल की आवाज मानकर सिर-आंखों पर बैठाएंगे?

यूसुफ पठान की राजनीतिक बलि?

यूसुफ पठान को जब राजनीति में लाया गया था, तो वह ममता का ‘ट्रम्प कार्ड’ थे. उन्होंने अपना काम बखूबी किया और कांग्रेस के दिग्गज अधीर को पटखनी दी. लेकिन अब खबर है कि दीदी के लिए यूसुफ को अपनी सीट छोड़नी पड़ सकती है. इसे यूसुफ की राजनीतिक बलि के तौर पर देखा जा रहा है. सवाल यह है कि एक लोकप्रिय खिलाड़ी और सांसद को इस तरह किनारे करना क्या स्थानीय समर्थकों को रास आएगा? यूसुफ पठान की अपनी एक फैन फॉलोइंग है और उनके अचानक हटने से टीएमसी के भीतर भी असंतोष की लहर दौड़ सकती है. क्या दीदी का यह ‘सुसाइडल’ दांव खुद उनकी पार्टी के लिए ही मुसीबत खड़ी कर देगा?

भाजपा की घेराबंदी और कड़ी चुनौती

बहरामपुर अब वो पुराना गढ़ नहीं रहा जहां सिर्फ टीएमसी या कांग्रेस का कब्जा हो. 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के सुब्रत मैत्रा ने जिस तरह से अपनी धाक जमाई है, उसने साफ कर दिया है कि बहरामपुर का मिजाज बदल चुका है. भाजपा ने यहां अपनी जड़ें काफी गहरी कर ली हैं. अगर ममता यहं से उपचुनाव लड़ती हैं, तो भाजपा इसे ‘हारी हुई मुख्यमंत्री’ बनाम ‘स्थानीय चेहरा’ का मुद्दा बनाएगी. सुब्रत मैत्रा की जीत ने भाजपा कार्यकर्ताओं में जो जोश भरा है, वह ममता के लिए सबसे बड़ी रुकावट बन सकता है. यहाँ की मिट्टी में अब कमल की खुशबू तेजी से फैल रही है.

क्या साख बचा पाएंगी ममता बनर्जी?

राजनीति में हार-जीत चलती रहती है, लेकिन ममता बनर्जी के लिए यह लड़ाई सिर्फ एक सीट की नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व की है. भवानीपुर में हारने के बाद उनकी छवि को जो धक्का लगा है, उसकी भरपाई के लिए उन्हें एक बड़ी जीत चाहिए. बहरामपुर उनके लिए वो सुरक्षित गलियारा हो सकता था, लेकिन बदले हुए समीकरणों ने इसे ‘डेंजर जोन’ बना दिया है. माना जा रहा है कि अगर ममता यहां से भी हारती हैं, तो उनकी राजनीति का सूरज हमेशा के लिए अस्त हो सकता है. क्या वो अपनी बची-खुची इज्जत दांव पर लगाकर यह जोखिम उठाने को तैयार हैं? यह देखना अभी बाकी है.

अधीर की हार और नया समीकरण

उधर अधीर रंजन चौधरी की हार ने बहरामपुर में एक नया राजनीतिक शून्य पैदा कर दिया है. कांग्रेस के इस कद्दावर नेता की विदाई के बाद मुकाबला सीधे टीएमसी और भाजपा के बीच सिमट गया है. ममता बनर्जी इसी वैक्यूम का फायदा उठाना चाहती हैं. उन्हें लगता है कि कांग्रेस का बचा-कुचा वोट बैंक उनकी तरफ शिफ्ट हो सकता है. लेकिन हकीकत इसके उलट भी हो सकती है. कांग्रेस का वफादार वोटर टीएमसी को वोट देने के बजाय भाजपा की तरफ भी जा सकता है ताकि ममता को रोका जा सके. यह समीकरण दीदी के लिए सिरदर्द बन सकता है और उनकी सारी मेहनत पर पानी फेर सकता है.

संसद जाने की मजबूरी या रणनीति?

ममता बनर्जी हमेशा से ‘स्ट्रीट फाइटर’ रही हैं और दिल्ली की राजनीति में दखल देना उनका पुराना शौक है. विधानसभा में विपक्ष में बैठने के बजाय उन्हें संसद में बैठकर मोदी सरकार को घेरना ज्यादा रास आता है. लेकिन मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए या हार के बाद इस तरह का कदम उठाना उनकी कमजोरी के तौर पर भी देखा जा सकता है. लोग पूछेंगे कि क्या दीदी बंगाल की जनता का सामना करने से डर रही हैं? बहरामपुर उपचुनाव की चर्चाओं ने इस सवाल को और गहरा कर दिया है. क्या दीदी का यह मास्टरस्ट्रोक वाकई में उन्हें दिल्ली तक ले जाएगा या बीच रास्ते में ही अटक जाएगा?

बहरामपुर की जनता का मूड क्या है?

बहरामपुर की मिट्टी का मिजाज भांपना हमेशा से मुश्किल रहा है. यहां की जनता ने बड़े-बड़े सूरमाओं को धूल चटाई है. यूसुफ पठान को उन्होंने बाहरी होने के बावजूद जिताया था क्योंकि वह एक नई उम्मीद थे. लेकिन अब ममता बनर्जी के मामले में स्थिति अलग है. यहां का मतदाता अब ज्यादा जागरूक है और भाजपा की सक्रियता ने उसे विकल्प दे दिया है. क्या जनता एक बार फिर टीएमसी पर भरोसा करेगी? अगर यहां का दांव उल्टा पड़ा, तो बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी का मटियामेट होना तय माना जा रहा है. दीदी की बैटिंग देखने के लिए बहरामपुर की गलियां तैयार तो है, पर तालियां बजेंगी या खामोशी रहेगी, यह वक्त बताएगा.



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