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भीषण गर्मी में जहां लोग एसी और कूलर का सहारा ले रहे हैं, वहीं देवघर के घोरलास गांव में लोग 90 साल पुराने मिट्टी के कोठा घर में राहत महसूस कर रहे हैं. साल 1935 में बने इस ऐतिहासिक ‘दरवाजा’ की मोटी मिट्टी की दीवारें और देसी तकनीक आज भी कमरे को 45 डिग्री तापमान में ठंडा बनाए रखती हैं. ग्रामीणों का कहना है कि इस कमरे के अंदर घुसते ही प्राकृतिक ठंडक महसूस होती है. यहां की हवा के आगे एसी-कूलर भी फीके लगते हैं.
देवघर: झारखंड के देवघर प्रखंड के घोरलास गांव में आज भी एक ऐसी अनोखी ‘बैठकी’ मौजूद है, जो भीषण गर्मी में लोगों को प्राकृतिक ठंडक का एहसास कराती है. जहां शहरों में लोग गर्मी से बचने के लिए एसी और कूलर का सहारा लेते हैं, वहीं इस गांव के लोग दोपहर के समय पक्के मकानों की बजाय मिट्टी से बने पुराने ‘कोठा घर’ में बैठना ज्यादा पसंद करते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि बाहर का तापमान 40 से 45 डिग्री तक पहुंचने के बावजूद इस कमरे के अंदर घुसते ही ठंडक महसूस होने लगती है. यही कारण है कि गर्मी के दिनों में गांव के लोग यहां बैठकर समय बिताते हैं.
1935 में पूर्वजों ने बनवाई थी ‘बैठकी’
गांव के 72 वर्षीय ग्रामीण सचिनानंद राय बताते हैं कि यह बैठकी साल 1935 में उनके पूर्वजों ने बनवाई थी. गांव के लोग इसे ‘दरवाजा’ के नाम से जानते हैं. पहले गांव की सामाजिक बैठकें, बातचीत और कई महत्वपूर्ण फैसले इसी जगह पर होते थे. आज भी लोग इस परंपरा को निभा रहे हैं. उनका कहना है कि बाहर तेज धूप और गर्म हवा चलती रहती है, लेकिन मिट्टी के इस कमरे के अंदर तापमान काफी कम रहता है, इसलिए लोग यहां आराम करना पसंद करते हैं.
दीवारें करीब 20 इंच मोटी
इस कमरे की सबसे बड़ी खासियत इसकी पारंपरिक और देसी बनावट है. ग्रामीणों के अनुसार इसकी दीवारें करीब 20 इंच मोटी हैं, जो बाहर की गर्मी को अंदर आने से रोकती हैं. कमरे की छत भी खास तरीके से बनाई गई है. छत के ऊपर खपड़ा लगाया गया है और उसके नीचे मिट्टी, खजूर के पत्ते और दूसरी प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल किया गया है. इसी वजह से कमरे के अंदर गर्मी का असर कम महसूस होता है.
प्रकृति के अनुसार घर
ग्रामीण बताते हैं कि पुराने समय में घर बनाने के लिए सिर्फ मिट्टी का उपयोग नहीं होता था. मिट्टी में छोयागुड़, भूसा, सुरती चुना और दूसरी प्राकृतिक सामग्री मिलाकर मजबूत मिश्रण तैयार किया जाता था. इस तकनीक से बने घर गर्मी में ठंडे और सर्दियों में गर्म रहते थे. गांव वालों का मानना है कि पहले के लोग बिना बिजली और मशीनों के भी प्रकृति के अनुसार घर बनाना जानते थे.
एसी और कूलर की हवा भी फीकी
गांव के दूसरे ग्रामीण सुबोध चन्द्र राय बताते हैं कि जब यह बैठकी बनाई गई थी, तब गांवों में एसी और कूलर जैसी सुविधाएं नहीं थीं. उस समय लोग गर्मी से बचने के लिए ऐसे मिट्टी के घरों का सहारा लेते थे. सिर्फ घोरलास गांव ही नहीं, बल्कि आसपास के गांवों के लोग भी गर्मी के दिनों में यहां आकर दोपहर बिताते थे. उनका कहना है कि इस कमरे के अंदर घुसते ही ऐसा लगता है जैसे प्राकृतिक एसी चल रहा हो. यहां की ठंडी हवा के आगे एसी और कूलर की हवा भी फीकी लगती है.
देसी तकनीक का शानदार उदाहरण
गांव की यह पुरानी बैठकी सिर्फ आराम करने की जगह नहीं, बल्कि पारंपरिक ज्ञान और देसी तकनीक का शानदार उदाहरण भी है. मिट्टी से बने ये कोठा घर आज भी लोगों को प्राकृतिक तरीके से गर्मी से राहत दे रहे हैं. आधुनिक दौर में जहां लोग मशीनों और बिजली पर निर्भर हो चुके हैं, वहीं गांव का यह देसी जुगाड़ दिखाता है कि प्रकृति के करीब रहकर भी सुकून और ठंडक पाई जा सकती है.
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न्यूज़18इंडिया में कार्यरत हैं. आजतक से रिपोर्टर के तौर पर करियर की शुरुआत फिर सहारा समय, ज़ी मीडिया, न्यूज नेशन और टाइम्स इंटरनेट होते हुए नेटवर्क 18 से जुड़ी. टीवी और डिजिटल न्यूज़ दोनों विधाओं में काम करने क…और पढ़ें