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नीतीश कुमार फॉर्मूले से कर्नाटक का नाटक खत्म करेगी कांग्रेस, सिद्दारमैया को...


Siddaramaiah To Step Down Karnataka CM Post: कांग्रेस पार्टी ने कर्नाटक में लंबे समय से चल रहे आपसी संघर्ष का करीब-करीब समाधान निकाल लिया है. दरअसल, वहां लंबे समय से राज्य को दोनों कद्दावर नेताओं मुख्यमंत्री सिद्दारमैया और उनके डिप्टी डीके शिवकुमार के बीच सीएम पद को लेकर खींचतान जारी था. अब आ रही जानकारी के मुताबिक कांग्रेस हाईकमान ने सीएम सिद्दारमैया से कह दिया है कि वह सीएम की कुर्सी छोड़ दें और डीके शिवकुमार के लिए रास्ते खोल दें. लेकिन, राज्य में बड़े जनाधार वाले नेता सिद्दारमैया को मनाने के लिए कांग्रेस पार्टी को खूब पापड़ बेलने पड़े. अंतत: पिछले दिनों बिहार में सीएम पद से नीतीश कुमार की विदाई में इस संकट का समाधान दिख गया. अब सूत्र बता रहे हैं कि सीएम नीतीश कुमार की तरह सिद्दारमैया भी राज्यसभा की शोभा बढ़ाएंगे. करीब 80 वर्षीय सिद्दारमैया राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभाएंगे, ऐसा कांग्रेस हाईकमान ने उनको आश्वासन दिया है.

क्या था नीतीश कुमार फॉर्मूला

हाल के दिनों में बिहार की राजनीति में हुए बदलावों को कांग्रेस ने काफी करीब से देखा है. वहां लंबे समय सीएम की कुर्सी पर काबिज नीतीश कुमार को राज्यसभा भेजा गया. इसको लेकर काफी माथापेच्ची हुई थी. बिहार में एनडीए ने नीतीश कुमार के चेहरे पर चुनाव लड़ा था लेकिन उनके सीएम बनने के चंद महीनों के भीतर राज्य में नेतृत्व परिवर्तन हो गया. नीतीश को राज्यसभा भेजकर इस पूरी समस्या का समाधान निकाला गया और भाजपा के सम्राट चौधरी सीएम बनाए गए.

इसी मॉडल को अब कर्नाटक में भी लागू करने की कोशिश मानी जा रही है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस हाईकमान यह समझ चुका है कि बड़े जनाधार वाले नेताओं को सीधे किनारे करना पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकता है. ऐसे में उन्हें सम्मानजनक तरीके से राष्ट्रीय राजनीति में भेजना बेहतर विकल्प माना गया. सिद्दारमैया के मामले में भी यही रास्ता अपनाया जा रहा है. दरअसल, सिद्दारमैया सिर्फ एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि कर्नाटक की सामाजिक राजनीति का बड़ा चेहरा हैं. कुरुबा समुदाय समेत कई पिछड़े वर्गों में उनकी मजबूत पकड़ है. ऐसे नेता को अचानक हटाने से पार्टी के वोट बैंक में नाराजगी पैदा हो सकती थी. इसलिए राज्यसभा और राष्ट्रीय राजनीति का रास्ता एक सेफ ट्रांजिशन मॉडल के रूप में देखा जा रहा है.

कर्नाटक में क्या था संकट

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की बड़ी जीत के बाद से ही मुख्यमंत्री पद को लेकर अंदरूनी संघर्ष शुरू हो गया था. डीके शिवकुमार खुद को मुख्यमंत्री पद का मजबूत दावेदार मान रहे थे. संगठन पर उनकी पकड़ और चुनावी रणनीति में उनकी भूमिका को देखते हुए उनके समर्थक लगातार दबाव बना रहे थे.

दूसरी तरफ सिद्दारमैया का जनाधार और प्रशासनिक अनुभव कांग्रेस नेतृत्व के लिए बड़ा फैक्टर था. आखिरकार पार्टी ने समझौते के तहत सिद्दारमैया को मुख्यमंत्री और डीके शिवकुमार को डिप्टी सीएम बनाया. लेकिन यह व्यवस्था शुरुआत से ही अस्थायी मानी जा रही थी.

बीते महीनों में कई बार नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें सामने आईं. डीके समर्थक खुले तौर पर सत्ता हस्तांतरण की बात करते रहे, जबकि सिद्दारमैया खेमे ने इसे खारिज किया. इससे सरकार और संगठन दोनों स्तरों पर असहज स्थिति बनी रही. विपक्षी भाजपा और जेडीएस भी लगातार कांग्रेस की अंदरूनी कलह को मुद्दा बनाते रहे. कांग्रेस हाईकमान की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि यदि यह संघर्ष लंबा चला तो उसका असर 2028 के विधानसभा की तैयारी और दक्षिण भारत में पार्टी की स्थिरता पर पड़ सकता है. इसलिए अब पार्टी नेतृत्व एक स्पष्ट सत्ता परिवर्तन मॉडल की ओर बढ़ता दिख रहा है.

सिद्दारमैया के राज्यसभा जाने से सुलझ जाएगा मामला?

राजनीतिक दृष्टि से यह कदम कांग्रेस के लिए फायदे और जोखिम दोनों लेकर आता है. फायदा यह है कि पार्टी डीके शिवकुमार को पूरी तरह संतुष्ट कर सकती है. लंबे समय से इंतजार कर रहे डीके को मुख्यमंत्री बनाने से संगठन में उनका प्रभाव और बढ़ेगा तथा वे 2028 के विधानसभा चुनाव तक अपनी टीम तैयार कर पाएंगे. दूसरी ओर, सिद्दारमैया को राज्यसभा भेजकर कांग्रेस उनके अनुभव का इस्तेमाल राष्ट्रीय स्तर पर करना चाहती है. दक्षिण भारत में भाजपा के खिलाफ विपक्षी रणनीति तैयार करने, सामाजिक न्याय के मुद्दों को उठाने और ओबीसी राजनीति को मजबूती देने में उनकी भूमिका अहम हो सकती है.

लेकिन चुनौती भी कम नहीं है. सिद्दारमैया का प्रभाव सिर्फ विधानसभा तक सीमित नहीं है. उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता कांग्रेस के लिए चुनावी पूंजी रही है. अगर उनके समर्थकों को यह महसूस हुआ कि उन्हें साइडलाइन किया गया है, तो पार्टी को नुकसान हो सकता है. इसके अलावा डीके शिवकुमार के सामने भी बड़ी परीक्षा होगी. उन्हें सिर्फ सत्ता संभालनी नहीं होगी, बल्कि सिद्दारमैया समर्थक नेताओं को साथ लेकर चलना होगा. यदि नेतृत्व परिवर्तन के बाद गुटबाजी और बढ़ती है, तो कांग्रेस के लिए यह प्रयोग उल्टा भी पड़ सकता है.

फिलहाल इतना साफ है कि कांग्रेस कर्नाटक में टकराव की राजनीति से निकलकर सम्मानजनक सत्ता हस्तांतरण का रास्ता अपनाना चाहती है. अब देखना होगा कि यह फार्मूला पार्टी को स्थिरता देता है या फिर नई राजनीतिक चुनौतियों का दरवाजा खोलता है.



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