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गांव की रखवाली करते हैं ‘घोड़े वाले बाबा’! बोकारो की ये परंपरा...


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बोकारो जिले के चंदनक्यारी प्रखंड स्थित सिमुलिया गांव में दाहय रंगाहाड़ी बाबा को लेकर लोगों की गहरी आस्था जुड़ी है. ग्रामीण बाबा के वाहन माने जाने वाले मिट्टी के घोड़ों की पूजा करते हैं और मन्नत पूरी होने पर घोड़ों की जोड़ी चढ़ाते हैं. मान्यता है कि बाबा रात में घोड़े पर सवार होकर गांव की रक्षा करते हैं, जिसकी पहचान घुंघरुओं की आवाज से होती है. साल में दो बार विशेष पूजा का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल होते हैं.

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बोकारो : झारखंड के गांवों में लोकदेवताओं और उनसे जुड़ी मान्यताओं की अपनी एक अलग दुनिया है, लेकिन आज भी इस आधुनिकता के दौर में कई ऐसी परंपराएं हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई हैं. ऐसा ही एक अनोखा उदाहरण है बोकारो जिले के चंदनक्यारी प्रखंड के सिमुलिया और आसपास के गांवों का, श्रद्धा का ऐसा ही अनोखा स्वरूप देखने को मिलता है, जहां ग्रामीण देवता दाहय रंगहाड़ी बाबा के वाहन माने जाने वाले घोड़ों के प्रतिमा कि पूजा जाती है

सिमुलिया गांव के प्रवेश करते ही दो घोड़े के बनी बड़ी प्रतिमा‌ हर किसी का ध्यान अपने ओर खींच लेती हैं. ये साधारण प्रतिमाएं नहीं, बल्कि ग्रामीणों के विश्वास, मनोकामनाओं और लोकआस्था का प्रतीक हैं और यहां के ग्रामीण अपनी मन्नत पूरी होने पर दाहय रंगाहाड़ी बाबा को दो जोड़ी मिट्टी के घोड़े अर्पित करते हैं.

रात में निकलते बाबा, सुनाई देती घुंघरुओं की आवाज
गांव के निवासी संदीप महतो बताते हैं कि उनके बुजुर्गों से सुनी गई कहानियों के अनुसार दाहय रंगाहाड़ी बाबा घोड़े पर सवार होकर पूरे गांव की रक्षा करते हैं. उनकी मान्यता के अनुसार है कि जब भी गांव पर कोई संकट आता है, बाबा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं. आगे संदीप महतो कहते हैं, बुजुर्गों के अनुसार रात के समय जब बाबा गांव की निगरानी के लिए निकलते हैं, तब कई लोगों को घोड़ों के घुंघरुओं जैसी आवाजें सुनाई देती हैं. इसे बाबा की उपस्थिति और गांव की सुरक्षा का संकेत मानते हैं इसके अलावा जब भी किसी कि मन्नत पूरी होती है तो वह ग्रामीण देवता को मिट्टी के घोड़े की जोड़ी चढ़ाते हैं.

वहीं गांव के एक दुसरे ग्रामीण ईश्वरचंद महतो बताते हैं कि दाहय रंगाहाड़ी बाबा गांव के सुख-दुख में साथ रहने वाले देवता हैं. ग्रामीणों के द्वारा उनकी रोजाना पूजा-अर्चना होती है लेकिन साल में दो बार विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है और विशेष पूजा के अवसर पर बड़ी संख्या में ग्रामीण एक साथ मिलकर पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ बाबा कि पूजा करते है इसके अलावा विशेष मौके पर बकरे की बलि देने की भी परंपरा है.

About the Author

Amit Singh

7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह…और पढ़ें



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