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Pyaj Ki Kheti In Alwar : अलवर और खैरथल-तिजारा जिलों में 15 अगस्त के बाद प्याज की बुवाई की तैयारी तेज है. किसान खुद बीज तैयार कर रहे हैं, जिससे उन्हें बेहतर दाम मिल रहे हैं और दूसरे राज्यों पर निर्भरता कम हुई है. एक ओर किसानों को अपने बीज के लिए दूसरे राज्यों पर डिपेंड नहीं रहना पड़ता और एक्सट्रा खर्च भी बचता है.
अलवर. अलवर और खैरथल-तिजारा जिले में 15 अगस्त के बाद प्याज की बुवाई शुरू होने की तैयारियां तेज हो गई हैं. किसान खेतों की जुताई, समतलीकरण और अन्य जरूरी कार्यों में जुटे हैं. जिन किसानों ने पहले से प्याज की कण (पौध) तैयार नहीं की है, वे अब मंडियों और अन्य किसानों से प्याज की कण खरीद रहे हैं. वहीं, जिन किसानों ने खुद पौध तैयार की है, वे उसकी बिक्री भी कर रहे हैं और अपने उपयोग के लिए भी बचाकर रख रहे हैं. किसानों का लक्ष्य समय पर प्याज की रोपाई कर अच्छी फसल लेना है, ताकि उत्पादन बेहतर हो और भविष्य में अच्छे दाम मिल सकें. अलवर जिले में बड़ी संख्या में किसान प्याज की खेती करते हैं.
अलवर जिले के किसान अब प्याज का बीज खुद तैयार कर न केवल अपनी जरूरतें पूरी कर रहे हैं, बल्कि दूसरे राज्यों से आने वाले बीज पर निर्भरता भी कम हो गई है. पहले जिले में प्याज का बीज मध्य प्रदेश, गुजरात, हरियाणा समेत कई राज्यों से आता था, लेकिन अब किसान खुद बीज तैयार कर खेती कर रहे हैं. इससे उन्हें दोहरा फायदा मिल रहा है.
अब जेब पर नहीं पड़ेगा बीज का बोझ
एक ओर किसानों को अपने बीज के लिए दूसरे राज्यों पर डिपेंड नहीं रहना पड़ता और एक्सट्रा खर्च भी बचता है. वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, हरियाणा समेत कई राज्यों में अलवर का तैयार बीज भेजा जा रहा है. राजस्थान के कई जिलों में भी अलवर का बीज पहुंच रहा है, जिससे किसानों को अच्छे दाम मिल रहे हैं और बढ़िया आमदनी हो रही है.
अलवर का बीज, जल्दी बुवाई और बेहतर मुनाफा
अलवर जिले के छठीमील गांव निवासी किसान कासम ने बताया कि अब जिले के अधिकांश किसान प्याज का बीज खुद तैयार कर रहे हैं. उनका कहना है कि बाहर से आने वाले बीज और स्थानीय स्तर पर तैयार किए गए बीज में काफी अंतर होता है. स्थानीय बीज अलवर की जलवायु और मिट्टी के अनुकूल होने के कारण बेहतर परिणाम देता है. कासम बताते हैं कि राजस्थान के बाहर से आने वाला प्याज का बीज अलवर तक पहुंचने में समय लग जाता है. ऐसे में उसकी बुवाई सितंबर में होती है, जिससे फसल भी देर से तैयार होती है. वहीं, यदि किसान अपने खेत में ही बीज तैयार करते हैं तो 15 अगस्त के बाद ही प्याज की बुवाई शुरू हो जाती है. इससे फसल जल्दी तैयार होकर बाजार में पहुंचती है और किसानों को बेहतर दाम मिलते हैं.
बाहर के बीच इसलिए भी नहीं हैं ठीक
उन्होंने बताया कि बाहर से आने वाले बीज की एक बड़ी समस्या यह भी है कि वह अलवर के मौसम के अनुरूप पूरी तरह अनुकूल नहीं होता. तेज बारिश और बदलते मौसम में उसमें रोग लगने की आशंका अधिक रहती है. इसके विपरीत, स्थानीय स्तर पर तैयार बीज मौसम को बेहतर ढंग से सहन करता है, जिससे फसल स्वस्थ रहती है और उत्पादन भी अच्छा मिलता है.
पहले बाजार में पहुंचती है फसल
किसानों का कहना है कि देश में सबसे अधिक प्याज का उत्पादन महाराष्ट्र के नासिक क्षेत्र में होता है, जहां फसल अपेक्षाकृत देर से तैयार होती है. ऐसे में अलवर के किसान यदि स्थानीय बीज का उपयोग कर समय से पहले बुवाई करते हैं तो उनकी फसल पहले बाजार में पहुंच जाती है. इससे मांग अधिक रहने पर उन्हें बेहतर भाव मिलता है और उनकी आय में भी बढ़ोतरी होती है.
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आनंद पाण्डेय वर्तमान में News18 हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अ…
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