कैसे AI खर्च करता है बेतहाशा पानी, हर सवाल के साथ गर्म...
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जब हम कोई भी सवाल पूछते हैं या जानकारी हासिल करते हैं तो इसकी मशीन गर्म होने लगती है और उसे ठंडा रखने के लिए लगातार पानी देना होता है, जिससे वो ठंडी बनी रहे. हकीकत ये है कि एआई के इस बेतहाशा पानी के खर्च ने पूरी दुनिया को चिंतित भी किया हुआ है. क्या आपको मालूम है कि जब आप एक सवाल पूछते हैं तो एआई पर कितना पानी खर्च करना होता है. हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेष ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनियों से बिजली, पानी और जमीन के इस्तेमाल का हिसाब मांग लिया. यूएन रिपोर्ट कहती है कि अगले चार साल में केवल एआई के कारण बिजली और पानी की खपत दोगुनी हो सकती है. आर्टिफिशिल इंटैलिजेंस के बारे में कहा जाता है कि उनपर बेहिसाब पानी खर्च करके कूल रखा जाता है, अन्यथा वो बहुत गर्म हो जाएंगी. इसका दुनियाभर के पानी पर भी असर पड़ सकता है. क्या आपको मालूम है कि एआई से जब आप कोई सवाल पूछते हैं कि इसकी मशीन कैसे काफी पानी पीना शुरू कर देती है. ऐसा कैसे होता है ये हम आपको समझाएंगे. ये भी बताएंगे कि भविष्य में एआई पर कम पानी की खपत हो, इसके लिए क्या किया जा सकता है. जब आप चैटजीपीटी, जैमिनी या किसी एआई से सवाल पूछते हो, तो आपका सवाल दुनिया भर के डेटा सेंटर में जाता है. जो कंप्युटर के भंडार होते हैं. ये कंप्यूटर बहुत तेज चलते हैं. बहुत गर्म हो जाते हैं. इन्हें ठंडा रखने के लिए पानी का इस्तेमाल होता है. जैसे हमारी गाड़ी के रेडिएटर में पानी लगता है, लेकिन उससे लाखों गुना बड़ा सिस्टम. Photo by AI पानी कैसे काम करता है पानी यहां पर दो काम करता है.-सीधे सर्वर को ठंडा करता है– बिजली बनाने वाली जगहों पर भी पानी लगता है जब एआई से एक साधारण सा सवाल पूछते हैं, तो आपको लगता है कि जवाब तुरंत स्क्रीन पर आ गया और बात खत्म हो गई. लेकिन बैकग्राउंड में उस सवाल को प्रोसेस करने के लिए विशालकाय डेटा सेंटर्स में लगे हजारों कंप्यूटर सर्वर्स बहुत तेज़ी से काम करते हैं. जब वे काम करते हैं, तो भारी मात्रा में गर्मी पैदा होती है. उन सर्वर्स को ठंडा रखने के लिए पानी का इस्तेमाल किया जाता है. एक सवाल पर कितना पानी खर्च होता है? विभिन्न शोधों के अनुसार, जिसमें यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया और रीवरसाइड की एक प्रसिद्ध स्टडी शामिल है, वो बताती है, जब आप एआई से 10 से 50 सामान्य सवालों का एक सेट पूछते हैं, तो डेटा सेंटर में लगभग 500 मिलीलीटर यानि आधा लीटर पानी खर्च हो जाता है. जब एआई से सवाल पूछते हैं, तो एआई के विशालकाय डेटा सेंटर्स में लगे हजारों कंप्यूटर सर्वर्स बहुत तेज़ी से सक्रिय हो जाते हैं. इससे जब इनके सर्वर पर गर्मी बढ़ने लगती है तो इन्हें कूल करने के लिए काफी ज्यादा पानी का उपयोग कूलिंग टॉवर्स के जरिए किया जाता है. AI Photo इसे अगर अकेले सवाल के हिसाब से देखें, तो आपके एक सवाल पर लगभग 10 से 50 मिलीलीटर पानी खर्च होता है. यह मात्रा लगभग एक या दो चम्मच से लेकर एक छोटे शॉट ग्लास के बराबर हो सकती है. यह पानी कहां और कैसे खर्च होता है? डेटा सेंटर्स में पानी सीधे कंप्यूटर पर नहीं डाला जाता. इसके दो मुख्य तरीके होते हैं- 1. वाष्पीकरण – सर्वर्स से निकलने वाली भयंकर गर्मी को सोखने के लिए ‘कूलिंग टावर्स’ का इस्तेमाल होता है। यहां पानी गर्म हवा को ठंडा करता है और खुद भाप बनकर हवा में उड़ जाता है. ये पानी दोबारा तुरंत इस्तेमाल नहीं हो पाता. 2. बिजली उत्पादन – डेटा सेंटर्स को चलाने के लिए भारी मात्रा में बिजली चाहिए होती है, जिन पावर प्लांट्स में यह बिजली बनती है, उन्हें भी ठंडा रहने के लिए लाखों लीटर पानी की जरूरत होती है. इसे ‘अप्रत्यक्ष पानी की खपत’ कहते हैं. एआई डेटा सेंटर्स में पानी का इस्तेमाल दो तरह से होता है. एक तो बेतहाशा पानी से इसके गर्म होते सर्वर को लगातार ठंडा रखना पड़ता है, दूसरे इसे जो बिजली चाहिए, उसमें भी पानी खर्च होता है. (AI Photo) ये बात चिंता का विषय क्यों अगर आप सिर्फ अपना एक सवाल देखें, तो 20 या 30 मिलीलीटर पानी बहुत कम लगता है लेकिन जैसा कि मैंने पहले बताया था, पूरी दुनिया में हर दिन करोड़ों लोग एआई से सवाल पूछ रहे हैं. जब इस बूंद-बूंद पानी को करोड़ों यूज़र्स से गुणा किया जाता है, तो यह हर दिन लाखों-करोड़ों लीटर पानी बन जाता है.एआई मॉडल को ट्रेन करने में और भी ज़्यादा पानी और बिजली की ज़रूरत होती है क्योंकि उनके सर्वर्स महीनों तक लगातार पूरी क्षमता पर चलते हैं. टेक कंपनियां इसके लिए क्या कर रही हैं गूगल और अन्य बड़ी तकनीक कंपनियां इस बात को लेकर बहुत गंभीर हैं. लगातार सुधार कर रही हैं. क्लीन एनर्जी और रीसाइक्लिंग – अब डेटा सेंटर्स को ठंडा करने के लिए पीने वाले साफ पानी की जगह ‘रीसायकल किए हुए पानी’ या औद्योगिक पानी का इस्तेमाल किया जा रहा है. हवा से कूलिंग – कई डेटा सेंटर्स को जानबूझकर फिनलैंड या आयरलैंड जैसे ठंडे देशों में बनाया जा रहा है, ताकि बाहरी ठंडी हवा से ही सर्वर्स को ठंडा रखा जा सके. पानी की खपत कम हो. नेट-ज़ीरो का लक्ष्य – गूगल का लक्ष्य है कि वह आने वाले सालों में जितना पानी इस्तेमाल करे, उससे ज़्यादा पानी पर्यावरण को वापस लौटाए. क्या इससे निपटने के लिए कानून हैं अमेरिका जैसे देशों में अभी कोई बड़ा, सख्त कानून नहीं बना है जो सभी AI डेटा सेंटरों पर पानी की खपत को सीधे नियंत्रित करे. कुछ बिल प्रस्तावित हैं. जैसे डेटा सेंटर कंपनियों को अपनी पानी और बिजली की खपत बतानी पड़ेगी, हालांकि ये कानून अभी पास नहीं हुआ है. वैसे अमेरिका के कई राज्यों में इसको लेकर नियम बन भी चुके हैं. मिनासोटा में अगर डेटा सेंटर सालाना 10 करोड़ गैलन (लगभग 38 करोड़ लीटर) से ज्यादा पानी इस्तेमाल करेगा, तो पहले से परमिट लेनी होगी. पानी की उपलब्धता, बचत और पर्यावरण की जाँच जरूरी है। भारत में डेटा सेंटर के







