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कैसे AI खर्च करता है बेतहाशा पानी, हर सवाल के साथ गर्म...

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जब हम कोई भी सवाल पूछते हैं या जानकारी हासिल करते हैं तो इसकी मशीन गर्म होने लगती है और उसे ठंडा रखने के लिए लगातार पानी देना होता है, जिससे वो ठंडी बनी रहे. हकीकत ये है कि एआई के इस बेतहाशा पानी के खर्च ने पूरी दुनिया को चिंतित भी किया हुआ है. क्या आपको मालूम है कि जब आप एक सवाल पूछते हैं तो एआई पर कितना पानी खर्च करना होता है. हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेष ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनियों से बिजली, पानी और जमीन के इस्तेमाल का हिसाब मांग लिया. यूएन रिपोर्ट कहती है कि अगले चार साल में केवल एआई के कारण बिजली और पानी की खपत दोगुनी हो सकती है. आर्टिफिशिल इंटैलिजेंस के बारे में कहा जाता है कि उनपर बेहिसाब पानी खर्च करके कूल रखा जाता है, अन्यथा वो बहुत गर्म हो जाएंगी. इसका दुनियाभर के पानी पर भी असर पड़ सकता है. क्या आपको मालूम है कि एआई से जब आप कोई सवाल पूछते हैं कि इसकी मशीन कैसे काफी पानी पीना शुरू कर देती है. ऐसा कैसे होता है ये हम आपको समझाएंगे. ये भी बताएंगे कि भविष्य में एआई पर कम पानी की खपत हो, इसके लिए क्या किया जा सकता है. जब आप चैटजीपीटी, जैमिनी या किसी एआई से सवाल पूछते हो, तो आपका सवाल दुनिया भर के डेटा सेंटर में जाता है. जो कंप्युटर के भंडार होते हैं. ये कंप्यूटर बहुत तेज चलते हैं. बहुत गर्म हो जाते हैं. इन्हें ठंडा रखने के लिए पानी का इस्तेमाल होता है. जैसे हमारी गाड़ी के रेडिएटर में पानी लगता है, लेकिन उससे लाखों गुना बड़ा सिस्टम. Photo by AI पानी कैसे काम करता है पानी यहां पर दो काम करता है.-सीधे सर्वर को ठंडा करता है– बिजली बनाने वाली जगहों पर भी पानी लगता है जब एआई से एक साधारण सा सवाल पूछते हैं, तो आपको लगता है कि जवाब तुरंत स्क्रीन पर आ गया और बात खत्म हो गई. लेकिन बैकग्राउंड में उस सवाल को प्रोसेस करने के लिए विशालकाय डेटा सेंटर्स में लगे हजारों कंप्यूटर सर्वर्स बहुत तेज़ी से काम करते हैं. जब वे काम करते हैं, तो भारी मात्रा में गर्मी पैदा होती है. उन सर्वर्स को ठंडा रखने के लिए पानी का इस्तेमाल किया जाता है. एक सवाल पर कितना पानी खर्च होता है? विभिन्न शोधों के अनुसार, जिसमें यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया और रीवरसाइड की एक प्रसिद्ध स्टडी शामिल है, वो बताती है, जब आप एआई से 10 से 50 सामान्य सवालों का एक सेट पूछते हैं, तो डेटा सेंटर में लगभग 500 मिलीलीटर यानि आधा लीटर पानी खर्च हो जाता है. जब एआई से सवाल पूछते हैं, तो एआई के विशालकाय डेटा सेंटर्स में लगे हजारों कंप्यूटर सर्वर्स बहुत तेज़ी से सक्रिय हो जाते हैं. इससे जब इनके सर्वर पर गर्मी बढ़ने लगती है तो इन्हें कूल करने के लिए काफी ज्यादा पानी का उपयोग कूलिंग टॉवर्स के जरिए किया जाता है. AI Photo इसे अगर अकेले सवाल के हिसाब से देखें, तो आपके एक सवाल पर लगभग 10 से 50 मिलीलीटर पानी खर्च होता है. यह मात्रा लगभग एक या दो चम्मच से लेकर एक छोटे शॉट ग्लास के बराबर हो सकती है. यह पानी कहां और कैसे खर्च होता है? डेटा सेंटर्स में पानी सीधे कंप्यूटर पर नहीं डाला जाता. इसके दो मुख्य तरीके होते हैं- 1. वाष्पीकरण – सर्वर्स से निकलने वाली भयंकर गर्मी को सोखने के लिए ‘कूलिंग टावर्स’ का इस्तेमाल होता है। यहां पानी गर्म हवा को ठंडा करता है और खुद भाप बनकर हवा में उड़ जाता है. ये पानी दोबारा तुरंत इस्तेमाल नहीं हो पाता. 2. बिजली उत्पादन – डेटा सेंटर्स को चलाने के लिए भारी मात्रा में बिजली चाहिए होती है, जिन पावर प्लांट्स में यह बिजली बनती है, उन्हें भी ठंडा रहने के लिए लाखों लीटर पानी की जरूरत होती है. इसे ‘अप्रत्यक्ष पानी की खपत’ कहते हैं. एआई डेटा सेंटर्स में पानी का इस्तेमाल दो तरह से होता है. एक तो बेतहाशा पानी से इसके गर्म होते सर्वर को लगातार ठंडा रखना पड़ता है, दूसरे इसे जो बिजली चाहिए, उसमें भी पानी खर्च होता है. (AI Photo) ये बात चिंता का विषय क्यों अगर आप सिर्फ अपना एक सवाल देखें, तो 20 या 30 मिलीलीटर पानी बहुत कम लगता है लेकिन जैसा कि मैंने पहले बताया था, पूरी दुनिया में हर दिन करोड़ों लोग एआई से सवाल पूछ रहे हैं. जब इस बूंद-बूंद पानी को करोड़ों यूज़र्स से गुणा किया जाता है, तो यह हर दिन लाखों-करोड़ों लीटर पानी बन जाता है.एआई मॉडल को ट्रेन करने में और भी ज़्यादा पानी और बिजली की ज़रूरत होती है क्योंकि उनके सर्वर्स महीनों तक लगातार पूरी क्षमता पर चलते हैं. टेक कंपनियां इसके लिए क्या कर रही हैं गूगल और अन्य बड़ी तकनीक कंपनियां इस बात को लेकर बहुत गंभीर हैं. लगातार सुधार कर रही हैं. क्लीन एनर्जी और रीसाइक्लिंग – अब डेटा सेंटर्स को ठंडा करने के लिए पीने वाले साफ पानी की जगह ‘रीसायकल किए हुए पानी’ या औद्योगिक पानी का इस्तेमाल किया जा रहा है. हवा से कूलिंग – कई डेटा सेंटर्स को जानबूझकर फिनलैंड या आयरलैंड जैसे ठंडे देशों में बनाया जा रहा है, ताकि बाहरी ठंडी हवा से ही सर्वर्स को ठंडा रखा जा सके. पानी की खपत कम हो. नेट-ज़ीरो का लक्ष्य – गूगल का लक्ष्य है कि वह आने वाले सालों में जितना पानी इस्तेमाल करे, उससे ज़्यादा पानी पर्यावरण को वापस लौटाए. क्या इससे निपटने के लिए कानून हैं अमेरिका जैसे देशों में अभी कोई बड़ा, सख्त कानून नहीं बना है जो सभी AI डेटा सेंटरों पर पानी की खपत को सीधे नियंत्रित करे. कुछ बिल प्रस्तावित हैं. जैसे डेटा सेंटर कंपनियों को अपनी पानी और बिजली की खपत बतानी पड़ेगी, हालांकि ये कानून अभी पास नहीं हुआ है. वैसे अमेरिका के कई राज्यों में इसको लेकर नियम बन भी चुके हैं. मिनासोटा में अगर डेटा सेंटर सालाना 10 करोड़ गैलन (लगभग 38 करोड़ लीटर) से ज्यादा पानी इस्तेमाल करेगा, तो पहले से परमिट लेनी होगी. पानी की उपलब्धता, बचत और पर्यावरण की जाँच जरूरी है। भारत में डेटा सेंटर के

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कभी 400-500 हिरनों के झुंड से गुलजार थे पलामू के जंगल, कहलाता...

Last Updated:June 26, 2026, 11:33 IST Palamu Once Called Land Of Tigers: पलामू कभी बाघ देश और हिरणों के झुंडों के लिए मशहूर हुआ करता था. दरअसल 1972 से पहले शिकार खुला था और कोई रोक नहीं थी. कानून आने के बाद सख्त रोक लगी लेकिन तब तक वन्य जीवों की संख्या काफी कम हो चुकी थी. अब वापस वही जैव विविधता पाना चुनौती से कम नहीं है. पलामू. आज के समय में पलामू अपनी प्राकृतिक संपदा, घने जंगलों और वन्यजीव संरक्षण के लिए जाना जाता है, लेकिन कभी एक दौर ऐसा भी था, जब यहां के जंगलों में वन्यजीवों की संख्या आज की तुलना में कई गुना अधिक थी. पलामू जिले को किसी जमाने में ‘बाघ देश’ के नाम से भी पहचान मिलती थी. यहां के जंगलों में हिरणों के बड़े-बड़े झुंड आम बात थे, लेकिन शिकार पर किसी तरह की सख्ती नहीं होने के कारण बड़ी संख्या में वन्यजीवों का शिकार किया जाता था. नतीजतन, समय के साथ इनकी संख्या तेजी से घटती चली गई. 1970 के दशक तक हर ओर दिखते थे हिरणों के झुंडपलामू के वरिष्ठ वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. डी.एस. श्रीवास्तव ने लोकल18 को बताया कि वर्ष 1970 के आसपास पलामू के जंगलों का दृश्य बिल्कुल अलग था. जंगलों में घूमते समय एक जगह 400 से 500 हिरणों का झुंड आसानी से दिखाई देता था. सांभर, चीतल और अन्य वन्यजीव भी बड़ी संख्या में मौजूद थे. उस समय जंगल जैव विविधता से भरपूर थे, लेकिन संरक्षण की व्यवस्था मजबूत नहीं होने के कारण इनका लगातार शिकार होता रहा. हिरण के मांस और खाल की थी खुलेआम मांगडॉ. श्रीवास्तव ने आगे बताया कि उस समय वन्यजीवों के शिकार को लेकर लोगों में कोई खास डर नहीं था. कई घरों में हिरण का मांस पकता था और उसकी खाल का इस्तेमाल जूते सहित अन्य चमड़े के सामान बनाने में किया जाता था. चैनपुर, शाहपुर और हवाई अड्डा क्षेत्र के आसपास हिरण की खाल से जूते तैयार किए जाते थे. उस दौर में विभिन्न वन्यजीवों की खाल स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध हो जाती थी और लोग उसका खुलेआम इस्तेमाल करते थे. 1972 के बाद बदली तस्वीर, मिला वन्यजीवों को कानूनी संरक्षणडॉ. श्रीवास्तव ने आगे कहा कि वर्ष 1972 से पहले वन्यजीवों के शिकार पर प्रभावी कानूनी रोक नहीं थी. इसी वजह से बाघ, हिरण और अन्य जंगली जानवरों का बड़े पैमाने पर शिकार होता था. उस समय हिरण की खाल कुछ ही रुपये में मिल जाती थी, जबकि बाघ की खाल भी बेहद कम कीमत पर बिकती थी. हालांकि, वर्ष 1972 में कानून लागू होने के बाद शिकार पर सख्त पाबंदी लगी और वन्यजीवों को कानूनी सुरक्षा मिली. इसके बाद संरक्षण के प्रयास तेज हुए और जंगलों में वन्यजीवों को बचाने की दिशा में व्यापक अभियान शुरू किए गए. आज पलामू के जंगल फिर से वन्यजीव संरक्षण की नई पहचान बना रहे हैं, हालांकि पुराने दौर जैसी जैव विविधता वापस लाना अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. About the Author Raina Shukla बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी से मास कम्यूनिकेशन एंड जर्नलिज़्म में मास्टर्स, गोल्ड मेडलिस्ट. पत्रकारिता का सफर दैनिक जागरण से शुरू हुआ, फिर प्रभात खबर और ABP न्यूज़ से होते हुए News18 Hindi तक पहुंचा. करियर और देश की …और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Palamu,Jharkhand Source link

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रामगढ़ हादसा- किसी की एक महीने पहले हुई थी शादी:कोई तीन महीने...

रामगढ़ में गुरुवार की देर हुए रोड एक्सीडेंट में सवारी वाहन सवार 8 लोगों की जान चली गई। सभी बैंड-ताशा पार्टी से जुड़े थे और मुजफ्फरपुर (बिहार) जा रहे थे। इसी बीच उनकी गाड़ी को कोयला लदे ट्रक ने टक्कर मार दी और यह हादसा हुआ। मृतकों के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। मृतकों में से कई ऐसे थे, जिनकी कमाई से ही घर चलता था। इनमें से दो हजारीबाग और 6 लोग रामगढ़ के रहने वाले थे। शुक्रवार को उन्हें मुहर्रम जुलूस में बैंड-ताशा बजाना था। हादसे की सूचना से मां-पत्नी की तबीयत बिगड़ी रामगढ़ पोस्टमॉर्टम हाउस पहुंचे मृतकों के परिजनों से भास्कर टीम की बात हुई। मृतक हेमंत कुमार महतो (25) के चाचा रघुनंदन महतो ने बताया कि महज एक महीने पहले ही हेमंत का विवाह हुआ था। घटना की सूचना सुनते ही पत्नी और मां की तबीयत खराब हो गई। रघुनंदन महतो बताते हैं कि हेमंत से गुरुवार को उनकी मुलाकात रात को 7:30 बजे हुई थी। हेमंत ने कहा था कि हम लोग बुकिंग में मुजफ्फरपुर बिहार जा रहे हैं। शनिवार की सुबह तक लौट आएंगे। पर वहां जाने से पहले ही यह हादसा हो गया। तीन माह पूर्व बने थे दूसरी बार पिता मृतक अनोद कुमार के जीजा रॉबिन महतो ने बताया कि तीन माह पहले ही अनोद बेटे के पिता बने थे। इससे पहले उनकी एक चार साल की बेटी है। अनोद अपने बच्चों से बहुत प्यार करते थे। ताशा पार्टी के काम से ही इनका घर चलता था। घर पर अनोद की पत्नी सुषमा देवी का रो-रोकर बुरा हाल हो गया है। पवन की फिलहाल कोई संतान नहीं थी मृतक पवन करमाली के भाई विक्की करमाली कहते हैं कि वह मेरा छोटा भाई था। उसने कहा कि ताशा बजाने के लिए हम लोगों को मुजफ्फरपुर जाना है। यह कह कर घर से निकले थे। पवन की लगभग दो साल पहले शादी हुई थी। उसकी फिलहाल कोई संतान नहीं थी। मृतक डेविड करमाली के दादा बढ़न राम करमाली ने बताया कि हमारी मुलाकात गुरुवार सुबह हुई थी। मुझे सूचना गांव वालों से मिली कि हादसे में पोता के साथ कुछ लोगों की दर्दनाक मौत हो गई है। यह लोग सभी ताशा बजाने के लिए बिहार के मुजफ्फरपुर जा रहे थे। एलपी ट्रक ने उनकी गाड़ीेे को बारलौंग में टक्कर मार दी। डेविड अभी अविवाहित था। ————————- ये भी खबर पढ़िए रामगढ़ में ट्रक-पिकअप में टक्कर, 8 लोगों की मौत:गाड़ी में फंसी लाश, सड़क पर बिखरे बैंड-बाजे; ताशा पार्टी से जुड़े थे सभी झारखंड के रामगढ़ जिले में गुरुवार देर रात हुए सड़क हादसे में आठ लोगों की मौत हो गई। एक्सीडेंट रजरप्पा थाना क्षेत्र के लारी-बरलौंग के पास रामगढ़-बोकारो मुख्य मार्ग (एनएच-23) पर हुआ। कोयला लदे एक ट्रक ने पिकअप को जोरदार टक्कर मार दी। टक्कर के बाद पिकअप के परखच्चे उड़ गए। उसमें सवार सभी लोग बैंड-ताशा पार्टी से जुड़े थे, उनके सामान बैंड-बाजे सड़क पर बिखर गए। हादसे के बाद मौके पर अफरा-तफरी का माहौल रहा, जबकि ट्रक को मौके पर छोड़ ड्राइवर भाग निकला। घटनास्थल पर सात लोगों की मौत हुई। वहीं, गंभीर रूप से घायल एक व्यक्ति को रांची रेफर किया गया, जिसने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। पढ़िए पूरी खबर… Source link

झारखंड

Black spots in 15 districts increased from 93 to 102, now the...

रांची6 घंटे पहले कॉपी लिंक झारखंड की सड़कों पर सफर हर दिन के साथ और खतरनाक होता जा रहा है। राज्य में सड़क हादसों के सबसे संवेदनशील केंद्र यानी ब्लैक स्पॉट्स की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। नई रिपोर्ट के अनुसार राज्य के 15 जिलों में ब्लैक स्पॉट्स की संख्या 93 से बढ़कर अब 102 पर पहुंच गई है। यानी सड़कों पर मौत के 9 नए ठिकाने और बढ़ गए हैं। सिर्फ रांची में ही ऐसे 22 ब्लैक स्पॉट चिह्नित किए गए हैं। इस बढ़ती संख्या के बाद अब सड़क सुरक्षा कोषांग वाहनों की ओवर स्पीड पर लगाम कसने के लिए 24 नए हाइटेक इंटरसेप्टर वाहन खरीदने की तैयारी में है। एक इंटरसेप्टर वाहन पर करीब 24 लाख रुपए खर्च होंगे। राज्य सरकार ने इससे पहले भी रफ्तार की वजह से होने वाले हादसे रोकने के लिए छह हाइटेक इंटरसेप्टर वाहन खरीदे थे। नियमों के मुताबिक इन्हें नेशनल हाइवे और घाटियों में तैनात किया जाना चाहिए था। लेकिन इनमें से दो वाहन रांची, दो धनबाद और दो जमशेदपुर में हैं। क्या होता है ब्लैक स्पॉट… ब्लैक स्पॉट सड़क का वह 500 मीटर से 1 किमी तक का हिस्सा होता है, जहां 3 साल के दौरान कम से कम 5 गंभीर सड़क हादसे हुए हों या फिर 10 से अधिक लोगों की असमय जान गई हो। राज्य में बढ़ गए दुर्घटनाओं के डेंजर जोन गिरिडीह… धनबाद को जोड़ने वाले गिरिडीह-टुंडी रोड पर स्थित बड़कीटांड और पंडरी को हाल ही में आधिकारिक तौर पर ब्लैक स्पॉट घोषित किया गया है। इसके अलावा, जीटी रोड पर बगोदर के पास स्थित बेको मोड़ नेशनल हाइवे पर चलने वाले वाहनों की अत्यधिक गति के कारण होने वाले भीषण हादसों का मुख्य केंद्र बना हुआ है। हजारीबाग… यूपी मोड़ अपनी तीखी ढलान और जानलेवा अंधे मोड़ की वजह से सबसे खतरनाक माना जाता है। इसके अतिरिक्त, मसीपिढ़ी चौक वाहनों की अनियंत्रित गति के कारण बड़ा दुर्घटना केंद्र बन चुका है। डेमोटांड़ और मोरांगी क्षेत्र में तेज रफ्तार व अचानक आने वाले टर्निंग पॉइंट की वजह से हमेशा हादसों की आशंका बनी रहती है। रांची… राज्य में सबसे ज्यादा ब्लैक स्पॉट रांची और इसके आसपास के इलाकों में है। चुटूपालू घाटी अपने तीखे मोड़ और ढलान के कारण अनियंत्रित हादसों का मुख्य केंद्र बनी हुई है। वहीं तैमारा घाटी अपनी ढलान और अंधाधुंध मोड़ों की वजह से बेहद संवेदनशील है। इसके अलावा, पिठौरिया घाटी में तीखी ढलान और असुरक्षित कट हादसों को आमंत्रण देते हैं। रातू से बीजूपाड़ा मार्ग पर मांडर और चान्हो के पास कई खतरनाक टर्निंग पॉइंट हैं। शहर के भीतर कांटाटोली चौक, करमटोली और सिरमटोली चौक को डेंजर जोन माना गया है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ Source link

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फरे बनाते समय टूट जाता है आटा, तो अपनाएं ये आसान ट्रिक,...

Last Updated:June 26, 2026, 11:28 IST अगर फरे बनाते समय आपका आटा टूट जाता है या फरे सख्त बनते हैं, तो चावल के आटे को उबलते पानी में मिलाने की यह आसान ट्रिक आपके काम आएगी. इस विधि से आटा मुलायम और लचीला बनता है, जिससे फरे आसानी से तैयार होते हैं. जानिए पूर्वी यूपी की इस पारंपरिक, हेल्दी और स्वादिष्ट डिश की आसान स्टेप-बाय-स्टेप रेसिपी. आप घर पर कुछ अलग, हल्का और टेस्टी बनाने का सोच रहे हैं, तो पूर्वी यूपी की ट्रेडिशनल डिश फरे आपके लिए एकदम परफेक्ट ऑप्शन है. ये डिश खास इसलिए भी है, क्योंकि इसे तलने के बजाय भाप में पकाया जाता है, जिससे ये हेल्दी भी रहती है और पेट पर भारी भी नहीं लगती. कई लोग फरे बनाते समय एक बड़ी परेशानी का सामना करते हैं. आटा टूट जाता है या फरे सख्त बन जाते हैं. यहीं पर एक छोटा सा किचन सीक्रेट काम आता है. उबलते पानी में चावल का आटा डालना. ये तरीका आटे को इतना मुलायम और लचीला बना देता है कि फरे बनाते वक्त वो फटते नहीं और खाने में एकदम सॉफ्ट लगते हैं. कंटेंट क्रिएटर गुड़िया कुमारी ने इसी आसान ट्रिक के साथ फरे बनाने की रेसिपी शेयर की है, जो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है. इस रेसिपी की खास बात ये है कि इसमें कम तेल लगता है, लेकिन स्वाद में कोई कमी नहीं आती. चलिए जानते हैं स्टेप-बाय-स्टेप कैसे बनते हैं परफेक्ट फरे. Add News18 as Preferred Source on Google जब चावल का आटा सीधे उबलते पानी में डाला जाता है, तो उसमें मौजूद स्टार्च एक्टिव हो जाता है. इससे आटा सॉफ्ट, स्मूद और लचीला बनता है. यही कारण है कि फरे बनाते समय आटा टूटता नहीं और शेप भी आसानी से बन जाता है, अगर आप सामान्य पानी से आटा गूंथते हैं, तो वो थोड़ा कड़क रह सकता है, जिससे फरे बनाते समय दरार आ सकती है. इसलिए ये ट्रिक बेहद काम की है. सबसे पहले एक गहरे पैन में करीब सवा कप पानी डालें. इसमें थोड़ा सा देसी घी और नमक डालकर अच्छे से उबाल लें. जब पानी पूरी तरह खौलने लगे, तब गैस धीमी करें और एक कप चावल का आटा डाल दें. अब तुरंत इसे किसी कलछी या बेलन की मदद से तेजी से चलाएं, ताकि गुठलियां न बनें. जैसे ही आटा पानी सोख ले, गैस बंद कर दें और इसे ढककर कुछ देर ठंडा होने दें. जब आटा हल्का गुनगुना रह जाए, तब इसे हाथों से अच्छे से मसलकर चिकना और नरम बना लें. यही परफेक्ट डो तैयार करने का सही तरीका है. फरे का असली स्वाद उसकी स्टफिंग में छुपा होता है. इसके लिए पहले से भीगी हुई चना दाल लें और उसका पानी निकाल दें. अब मिक्सर में चना दाल, हरी मिर्च, अदरक, लहसुन, जीरा, काली मिर्च, हल्दी और नमक डालकर दरदरा पीस लें. ध्यान रखें कि पेस्ट ज्यादा बारीक न हो. अब इसमें बारीक कटी हरी धनिया डालें. चाहें तो थोड़ा हींग भी डाल सकते हैं, इससे स्वाद और भी बढ़ जाता है. अब तैयार आटे की छोटी-छोटी लोइयां बनाएं. एक लोई को हाथ से फैलाकर छोटी पूरी जैसा आकार दें. बीच में एक चम्मच दाल की स्टफिंग रखें और इसे आधा मोड़ दें. इसे पूरी तरह बंद करने की जरूरत नहीं होती. हल्का खुला रहने दें, यही इसका ट्रेडिशनल लुक है. अब एक स्टीमर में पानी गरम करें और जाली वाली प्लेट पर हल्का तेल लगाकर फरे रखें. इन्हें करीब 15-20 मिनट तक भाप में पकाएं. जब फरे पक जाएं, तो एक कढ़ाही में थोड़ा तेल गरम करें. इसमें राई, सूखी लाल मिर्च और करी पत्ता डालकर तड़का लगाएं. अब स्टीम किए हुए फरे इसमें डालकर 2 मिनट हल्का सा भून लें. इससे इनका स्वाद और भी शानदार हो जाता है. गरमा-गरम फरे को हरी चटनी या टमाटर की चटनी के साथ सर्व करें. ये नाश्ते या शाम की चाय के साथ खाने के लिए एकदम परफेक्ट हैं. न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें। Source link

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जुलाई में कर लें इन 5 सब्जियों की खेती, घर बैठे बन...

Last Updated:June 26, 2026, 11:07 IST July Vegetable Farming Tips: बोकारो कृषि विज्ञान केंद्र के डॉक्टर रंजय कुमार ने जुलाई में फूलगोभी, बंदगोभी, भिंडी, टमाटर, शिमला मिर्च, बैंगन की खेती से लाखों की कमाई और नर्सरी की खास देखभाल की सलाह दी. आइये जानते हैं कैसे करें इन सब्जियों की खेती. ख़बरें फटाफट बोकारो: जुलाई का महीना किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इस माह मानसून की शुरुआत के साथ ही सब्जियों की खेती के लिए सही वातावरण बन जाता है. इस मौसम में कम सिंचाई और सही प्रबंधन  के जरिए किसान कम समय में अच्छी पैदावार और बेहतर मुनाफा हासिल कर सकते हैं. ऐसे में बोकारो कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर  रंजय कुमार ने जुलाई महीने में पांच फायदेमंद सब्जियों की खेती जानकारी दी है, जिसके जरिए किसान कम समय में अधिक मुनाफा कमा सकते हैं. 300000 तक कमा सकते हैं मुनाफा बोकारो के कृषि वैज्ञानिक के अनुसार जुलाई में फूलगोभी और बंदगोभी की अगेती खेती करना बेहतर विकल्प है. यह फसल करीब 60 से 75 दिनों में तैयार हो जाती है. प्रति एकड़ 30 से 55 हजार रुपये की लागत आती है और प्रति एकड़ करीबन 80 से 150 क्विंटल तक  उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है और बाजार की स्थिति के अनुसार किसान 1 लाख से 3 लाख रुपये तक का मुनाफा कमा सकते हैं. भिंडी से भी कमाएं लाखों रुपये वहीं, भिंडी की फसल भी 45 से 60 दिनों में तैयार हो जाती है. इस फसल कि खासियत यह है कि एक बार उत्पादन शुरू होने के बाद हर 3 से 7 दिन में तुड़ाई की जा सकती है और प्रति एकड़ भिंडी की खेती में लगभग 30 हजार रुपये की लागत आती है और किसान इससे 80 हजार से 2 लाख रुपये तक का मुनाफा कमा सकते हैं. टमाटर की खेती बनवा देगी धनवान वहीं, टमाटर की खेती में पौधे को नर्सरी तैयार करने के बाद खेत में रोपने पर फसल 60 से 80 दिनों में तैयार हो जाती है. इसकी खेती में प्रति एकड़ 50 से 90 हजार रुपये तक की लागत आती है और किसान इससे 150 से 300 क्विंटल तक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं और बाजार भाव के अनुसार 1 लाख से 5 लाख रुपये तक की कमाई संभव है. इसके अलावा शिमला मिर्च की फसल भी जुलाई में लगाई जा सकती है. पौधा लगाने के बाद लगभग 60 से 80 दिनों में उत्पादन शुरू हो जाता है. प्रति एकड़ 70 हजार से 1 लाख रुपये तक लागत आती है. इससे 150 से 300 क्विंटल तक शिमला मिर्च उत्पादन प्राप्त कर किसान 2 लाख से 5 लाख रुपये तक की कमाई कर सकते हैं. बैंगन की खेती में भी है मुनाफा-मुनाफा बैंगन की खेती भी किसानों के लिए लाभदायक विकल्प है. यह फसल 60 से 80 दिनों में उत्पादन देना शुरू कर देती है और प्रति एकड़ 45 से 70 हजार रुपये की लागत आती है. इससे 200 से 400 क्विंटल तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है और किसान 2 लाख से 5 लाख रुपये तक की आय अर्जित कर सकते हैं. आखिर में कृषि वैज्ञानिक रंजय कुमार ने सलाह दी कि जिन फसलों की खेती नर्सरी के माध्यम से होती है, उनकी विशेष देखभाल जरूरी है अधिक बारिश होने पर पौधे में सड़न और गलन की समस्याआ आ सकती है. इसलिए किसान पहले सुरक्षित स्थान पर नर्सरी में पौधे को तैयार कर उसमें संतुलित खाद का उपयोग करें और जब बारिश कम हो जाए, तब पौधों का खेत में रोपण करें. इससे पौधों का जीवित रहने का प्रतिशत बढ़ेगा और उत्पादन भी बेहतर मिलेगा. About the Author Brijendra Pratap Singh बृजेंद्र प्रताप सिंह डिजिटल-टीवी मीडिया में (2021) लगभग 5 सालों से सक्रिय हैं. मेट्रो न्यूज 24 टीवी चैनल मुंबई, ईटीवी भारत डेस्क, दैनिक भास्कर डिजिटल डेस्क के अनुभव के साथ 14 मई 2024 से News.in में सीनियर कंटें…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Bokaro,Jharkhand Source link

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धालभूमगढ़ में 11 पंचायतों में शिविर लगा की गई मनरेगा श्रमिकों की...

धालभूमगढ़ | झारखंड सरकार के दिशा-निर्देशों के तहत धालभूमगढ़ प्रखंड में वीबीजी राम जी एक्ट, 2025 के क्रियान्वयन को लेकर सभी 11 पंचायतों में विशेष शिविर लगाए गए। प्रखंड विकास पदाधिकारी के आदेश पर मनरेगा के तहत काम कर रहे सभी सक्रिय श्रमिकों की एनएमएमएस ऐप से ई-केवाईसी कराई गई। प्रखंड क्षेत्र में कुल 8598 कार्यरत श्रमिक कार्ड हैं। प्रखंड कार्यालय की सूची के अनुसार लंबित ई-केवाईसी का लक्ष्य चुकरीपाड़ा पंचायत में 70, जुगीशोल में 111, जूनबनी में 36, कानास में 33, कोकपाड़ा में 19, कोकपाड़ा-नरसिंहगढ़ में 28, मौदाशोली में 65, महुलीशोल में 30, नूतनगढ़ में 39, पावड़ा-नरसिंहगढ़ में 42 तय किया गया था। Source link

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चाकुलिया में जंगली हाथी सड़क पर आया:पेड़ तोड़े, रोड पर खड़े वाहनों...

जमशेदपुर के पूर्वी सिंहभूम स्थित चाकुलिया क्षेत्र में गुरुवार शाम उस समय अफरातफरी मच गई, जब ‘रामलाल’ नामक एक जंगली हाथी चांडिल बांध की बायीं नहर की सर्विस सड़क पर आ गया। यहां के स्थानीय लोगों ने इस बड़े हाथी का नाम रामलाल रखा है। भोजन और पानी की तलाश में भटक रहे हाथी ने सड़क किनारे लगे खजूर के कई पेड़ों को तोड़ दिया। हाथी करीब एक घंटे तक सड़क पर ही डटा रहा, जिससे इस मार्ग पर वाहनों की आवाजाही पूरी तरह बाधित हो गई। दर्जनों युवक हाथी‎ के बेहद करीब पहुंच गए बीच ‎सड़क पर हाथी को देखकर राहगीरों‎ के पहिए जहां के तहां थम गए। वहीं‎, दूसरी ओर सोशल मीडिया के ‎दीवाने युवाओं की भारी भीड़ मौके ‎पर उमड़ पड़ी। दर्जनों युवक हाथी‎ के बेहद करीब जाकर खड़े हो गए‎ और अपने मोबाइल से रामलाल की‎ फोटो और वीडियो बनाने लगे।‎ इधर, हाथी ने बांस से लदे एक ट्रैक्टर और एक हाइवा को भी धक्का मार दिया। हाथी को सामने देख ट्रैक्टर चालक अपनी जान बचाकर वाहन छोड़कर भाग निकला, जबकि हाइवा चालक वाहन के अंदर सुरक्षित बैठा रहा। हाथी को जंगल की ओर खदेड़ने का अभियान शुरू घटना की सूचना फैलते ही बड़ी संख्या में ग्रामीण और राहगीर मौके पर जमा हो गए, जिससे स्थिति और संवेदनशील हो गई। सूचना मिलते ही वन विभाग की क्विक रिस्पांस टीम (QRT) घटनास्थल पर पहुंची। टीम ने लोगों से सुरक्षित दूरी बनाए रखने की अपील करते हुए हाथी को जंगल की ओर खदेड़ने का अभियान शुरू किया। काफी प्रयासों के बाद हाथी को आबादी वाले क्षेत्र से हटाया जा सका। वन विभाग के अनुसार, ‘रामलाल’ पिछले कई दिनों से भोजन और पानी की तलाश में चाकुलिया और आसपास के इलाकों में घूम रहा है। खजूर के पेड़ों के तनों का गुदा उसका पसंदीदा भोजन है, जिसके कारण वह बार-बार आबादी वाले क्षेत्रों की ओर आ रहा है। विभाग ने लोगों से अपील की है कि हाथी दिखने पर उसके पास न जाएं और तुरंत वन विभाग को सूचित करें। Source link

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जौनपुर घूमने जा रहे हैं? जरूर देखें ताजमहल की झलक दिखाने वाला...

Last Updated:June 26, 2026, 10:18 IST जौनपुर स्थित बारा दुआरिया, जिसे कालीच खान का मकबरा भी कहा जाता है, मुगलकालीन स्थापत्य कला का अनूठा नमूना है। इसे ताजमहल के प्रतिरूप के रूप में भी जाना जाता है. इतिहासकारों के अनुसार, इसका निर्माण मुगल साम्राज्य में इलाहाबाद के गवर्नर रहे कालीच खान ने कराया था. उनके नाम पर ही आसपास का गांव कलीचाबाद कहलाता है. जौनपुर की ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल बारा दुआरिया, जिसे कालीच खान का मकबरा भी कहा जाता है, अपनी भव्य वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है. गोमती नदी के किनारे स्थित यह स्मारक मुगलकालीन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है. इसकी खूबसूरत बनावट और ऐतिहासिक महत्व के कारण इसे ताजमहल के प्रतिरूप के रूप में भी जाना जाता है. आज भी बड़ी संख्या में लोग इस ऐतिहासिक धरोहर को देखने पहुंचते हैं. इतिहासकारों के अनुसार बारा दुआरिया का निर्माण मुगल साम्राज्य में इलाहाबाद के गवर्नर रहे कालीच खान ने करवाया था. यह मकबरा उनकी स्मृति से जुड़ा हुआ है. कालीच खान मुगल शासन के प्रभावशाली अधिकारियों में गिने जाते थे. उनके द्वारा निर्मित यह स्मारक आज भी उस दौर की समृद्ध स्थापत्य कला और ऐतिहासिक विरासत की कहानी बयां करता है. बारा दुआरिया के आसपास स्थित गांव का नाम कलीचाबाद भी कालीच खान के नाम पर ही पड़ा. स्थानीय लोगों और इतिहासकारों का मानना है कि इस क्षेत्र की पहचान कालीच खान से गहराई से जुड़ी हुई है. वर्षों बीत जाने के बावजूद गांव का नाम आज भी इतिहास की उस विरासत को जीवित रखे हुए है और लोगों को अपने गौरवशाली अतीत की याद दिलाता है. Add News18 as Preferred Source on Google इस ऐतिहासिक मकबरे की सबसे बड़ी विशेषता इसके बारह द्वार हैं. इन्हीं द्वारों के कारण इस इमारत को बारा दुआरिया कहा जाता है. स्थापत्य कला की दृष्टि से यह संरचना बेहद खास मानी जाती है. इमारत की बनावट में मुगलकालीन शिल्पकला की झलक साफ दिखाई देती है, जो इसे अन्य ऐतिहासिक स्मारकों से अलग पहचान दिलाती है. बारा दुआरिया की भव्यता और स्थापत्य शैली लोगों को ताजमहल की याद दिलाती है. इसकी सुंदर नक्काशी, विशाल गुंबद और कलात्मक निर्माण शैली इसे विशेष बनाते हैं. यही कारण है कि स्थानीय लोग इसे ताजमहल का प्रतिरूप भी कहते हैं. इतिहास प्रेमियों और पर्यटकों के लिए यह स्थल हमेशा आकर्षण का केंद्र बना रहता है. इतिहास की अमूल्य धरोहर होने के बावजूद बारा दुआरिया लंबे समय से उपेक्षा का शिकार है. संरक्षण और नियमित देखरेख के अभाव में इस स्मारक के कई हिस्से प्रभावित हुए हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इस धरोहर के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया तो इसकी ऐतिहासिक पहचान को नुकसान पहुंच सकता है. जौनपुर का बारा दुआरिया पर्यटन की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि इस ऐतिहासिक स्थल का समुचित विकास और प्रचार-प्रसार किया जाए तो यह प्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल हो सकता है। इससे न केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर भी मिल सकेंगे. बारा दुआरिया केवल एक मकबरा नहीं, बल्कि जौनपुर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी है. यह स्मारक मुगलकालीन इतिहास, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक विरासत को सहेजे हुए है. आज भी यह धरोहर जौनपुर के गौरवशाली अतीत की गवाही देती है और आने वाली पीढ़ियों को इतिहास से जोड़ने का कार्य कर रही है. न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें। उत्तर प्रदेश की ताजा खबरें पढ़ने के लिए क्लिक करें| Source link

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न टूरिस्टों की भीड़, न गाड़ियों का शोर… जमशेदपुर का ये टूरिस्ट...

Last Updated:June 26, 2026, 09:55 IST Jamshedpur Best Tourist Spot: जमशेदपुर से 18 किलोमीटर दूर हलुदबनी गांव के पास शांत प्राकृतिक पिकनिक स्पॉट बन गया है. हरियाली, जलाशय और पहाड़ों के बीच यह जगह पर्यटकों की नई पसंद बन गई है. यहां पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है. जमशेदपुर: अगर आप जमशेदपुर में रहते हैं और अपने परिवार या दोस्तों के साथ किसी नई, शांत और प्राकृतिक जगह की तलाश में हैं तो शहर से मात्र 18 किलोमीटर दूर स्थित हलुदबनी (Haludbani) गांव के पास का यह खूबसूरत स्थल आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है. यहां पहुंचते ही ऐसा महसूस होता है मानो शहर की भागदौड़ और शोरगुल से निकलकर किसी अलग ही दुनिया में आ गए हो. आइये जानते हैं इसके बारे में. जमशेदपुर से डिमना होते हुए पटमदा की ओर बढ़ने पर रास्ते में हलुदबनी गांव पड़ता है. गांव के मुख्य मार्ग से लगभग 200 मीटर अंदर जाने पर प्रकृति का ऐसा अद्भुत नजारा दिखाई देता है, जिसे देखकर हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता है. यह स्थान किसी छोटे टापू जैसा प्रतीत होता है, जहां चारों ओर हरियाली, सुंदर जलाशय, दूर-दूर तक फैले पहाड़ और हरी-भरी घास का मनमोहक दृश्य देखने को मिलता है. वाहनों का नहीं सुनाई देता शोर इस स्थान की सबसे बड़ी खासियत इसकी शांति है. यहां न तो वाहनों का शोर सुनाई देता है और न ही शहर की भागदौड़ का कोई असर दिखाई देता है. केवल पक्षियों की मधुर चहचहाहट और हवा की सरसराहट मन को सुकून देती है. यहां कुछ समय बिताने के बाद ऐसा महसूस होता है. जैसे सारी चिंताएं और तनाव कहीं दूर चले गए हो. पर्यटकों की बनी है पसंदीदा जगह पर्यटकों के लिए एक और अच्छी बात यह है कि इस स्थान तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क बनी हुई है. चाहे आप बाइक से जाएं, कार से या किसी अन्य वाहन से, यहां तक पहुंचना बेहद आसान है. यही वजह है कि यह जगह परिवार, दोस्तों और प्रकृति प्रेमियों के लिए एक आदर्श पिकनिक स्पॉट बनती जा रही है. यहां का मौसम भी अपने आप में खास है. स्थानीय लोगों के अनुसार, हर घंटे मौसम का रंग बदलता हुआ नजर आता है. कभी हल्की ठंडी हवा चलने लगती है, तो कभी बादलों की छांव पूरे वातावरण को और भी खूबसूरत बना देती है. सूर्योदय और सूर्यास्त के समय यहां का दृश्य किसी चित्रकार की बनाई पेंटिंग जैसा प्रतीत होता है. खूबसूरती देखकर कहेंगे वाह! अगर आप सप्ताहांत में कुछ नया अनुभव करना चाहते हैं और प्रकृति के करीब कुछ सुकून भरे पल बिताना चाहते हैं तो हलुदबनी गांव के पास स्थित यह खूबसूरत स्थल आपकी सूची में जरूर होना चाहिए. एक बार यहां आने के बाद आपका मन बार-बार इस प्राकृतिक स्वर्ग की ओर खिंचा चला आएगा. यह जगह साबित करती है कि खूबसूरती देखने के लिए हमेशा दूर जाने की जरूरत नहीं होती, कभी-कभी स्वर्ग हमारे शहर के बिल्कुल करीब ही छिपा होता है. About the Author Brijendra Pratap Singh बृजेंद्र प्रताप सिंह डिजिटल-टीवी मीडिया में (2021) लगभग 5 सालों से सक्रिय हैं. मेट्रो न्यूज 24 टीवी चैनल मुंबई, ईटीवी भारत डेस्क, दैनिक भास्कर डिजिटल डेस्क के अनुभव के साथ 14 मई 2024 से News.in में सीनियर कंटें…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Jamshedpur,Purbi Singhbhum,Jharkhand Source link

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