दिल्ली जिमख़ाना को लेकर बवाल मचा तो पब्लिक को भी पता चल रहा है कि अफसर लोग सुविधाओं के नाम पर कैसे-कैसे लुत्फ उठाते रहते हैं. और ये तो दिल्ली जिमख़ाना सुर्खियों में आया है, क्योंकि सरकार के विभाग ने उसको कह दिया है कि प्रधानमंत्री के आवास के बिलकुल बगल की जबरदस्त लोकेशन को छोडकर दूसरी जगह चले जाओ. तो हाय-तौबा मची हुई है कि ऐसे-कैसे चले जाएं? क्योंकि ये जो जिमख़ाना जैसी जगहें होती हैं ये तो बडे साहब लोगों की वो जगहें होती हैं, जहां आम पब्लिक तो जा भी नहीं सकती. लेकिन अब बवाल मच ही गया है तो इसी बहाने समझ तो लेना चाहिए कि ये जिमख़ाना होता क्या है? तो पहली बात तो ये नाम कैसा है? जिमख़ाना? असल मे ये अंग्रजों ने बनाए थे ये सब ठिकाने अपने अफसरों के लिए. अंग्रेजों से पहले मुगल थे, तो मुगलों के टाइम दरबार में फारसी भाषा चलती थी. और फारसी में किसी ठिकाने को या जगह को ख़ाना कहते हैं. जैसे दवाख़ाना, बावरचीख़ाना, कारख़ाना, पागलख़ाना, डाकख़ाना. तो अंग्रेज अफसर आए तो उनको अपने खेलने वगैरह के लिए, कसरत के लिए और मनोरंजन वगैरह के लिए जगह बनानी थी. वो लोग खेलते थे जिमनेजियम में. आजकल भी तो कसरत के लिए जिम जाते हैं ना लोग. वो असल में जिमनैस्टिक्स करने की जगह को कहते हैं जिमनेजियम. उसी जिमनेजियम को शॉर्ट कर के लोग बोलने लगे जिम. और आजकल एक्सरसाइज करनी की जगह को जिम ही कहने लग गए हैं. अंग्रेजों ने कई जगह खोले जिमखाने उस जमाने में अंग्रेजों को असल में एक क्लब चाहिए था, जहां वो क्रिकेट टेनिस वगैरह खेल भी सकें और शाम को पार्टी वगैरह भी कर सकें. तो जिमनेजियम के जिम और फारसी के खाना को जोड़कर उन्होंने शब्द बना दिया जिमख़ाना. और कई जगह जिमखाने खोल दिए. सबसे पहले 1861 में रुडकी में जिमख़ाना बनाया. फिर 1875 में बॉम्बे जिमख़ाना, 1882 में पूना जिमख़ाना क्लब, 1884 में मद्रास जिमख़ाना क्लब, डिब्रूगढ जिमख़ाना क्लब, 1885 में अहमदाबाद जिमख़ाना क्लब, 1886 में कराची जिमख़ाना, करते-करते कई जिमखाने खोल दिए. अंग्रेजों का राज था. जमीन देखते थे और बड़े-बड़े ये क्लब बना देते थे अपने गोरे अफसरों के लिए. ताकि भारतीयों से अलग रहकर अपना वही लाइफस्टाइल चलाएं जैसा इंग्लैंड में रईसों का होता था. भारतीयों को तो अंदर घुसने तक नहीं दिया जाता था. ऐसे-ऐसे ड्रेस कोड लगा रखे थे जो कपड़े वो इंग्लैंड में पहना करते थे. भले ही भारत की तपती गर्मी में वो सूट-बूट ना चलते हों लेकिन अपने आप को यहां के लोगों से ऊपर दिखाने के लिए ये सब करते रहते थे वो. भारतीयों की एंट्री ही बंद थी. नौकर ज़रूर भारतीय होते थे. पंखा झलने के लिए. शराब परोसने के लिए. खाना परोसने के लिए. बाकी साफ-सफाई के लिए. बाग़बानी के लिए. और गोरे अंग्रेज़ खेलते थे क्रिकेट, पोलो, और पत्तों की गेम ब्रिज. व्हिस्की पीते थे, स्कॉच का चस्का भारत में वहीं से लगा. ब्रिटिश राज की ताक़त दिखाने का जरिया था जिमखाना मतलब ये जिमख़ाने ब्रिटिश राज की ताक़त दिखाने का भी एक ज़रिया थे कि गोरे लोग साहब लोग हैं, और बाक़ी जो भारतीय हैं चाहे कितने ही रईस हों वो भी उनसे तो नीचे ही हैं. वर्ष 1911 में किंग जॉर्ज भारत आए तो घोषणा की गई कि ब्रिटिश इंडिया की राजधानी कलकत्ते से दिल्ली शिफ़्ट की जाएगी. तब तक कलकत्ता राजधानी होती थी. तो नई दिल्ली बनाई गई नई राजधानी. और यहां तो फिर सबसे बड़े अफ़सर आने वाले थे अंग्रेज़ों के. तो उनके लिए 1913 में बनाया गया इंपीरियल दिल्ली जिमख़ाना क्लब. और ये बन गया गोरे लोगों का वो ठिकाना जहां सिर्फ़ नौकर ही भारतीय होते थे. और ये तो खैर अंग्रेज़ों के सारे क्लबों में ऐसा ही था. चटगांव में भी एक यूरोपियन क्लब था. वहां का क़िस्सा आपने सुना हो शायद. वहां तो बाहर ही बोर्ड लगा रखा था कि ‘डॉग्ज़ ऐंड इंडियंज़ नॉट अलाउड’, कुत्तों और भारतीयों का आना मना है. ये जो अंग्रेज़ आजकल दुनिया को सलीके के पाठ पढ़ाते रहते हैं, ऊंच-नीच के पाठ पढ़ाते रहते है, अधिकारों के पाठ पढ़ाते रहते हैं ये बोर्ड लगाते थे कुत्ते और भारतीय अंदर नहीं आ सकते. तो चटगांव में सूर्या सेन की टीम में एक क्रांतिकारी थीं प्रीतिलता वड्डेदार. उन्होंने चटगांव में यूरोपियन क्लब को आग लगा दी थी. कि ये लिखोगे कि कुत्ते और भारतीय नहीं आ सकते? उन्होंन क्लब ही फूंक डाला था और पुलिस ने जब उनको घेर लिया था तो सायनाइड खाकर जान दे दी थी. प्रीतिलता ज़िंदा पुलिस के हाथ नहीं आईं थीं. मतलब इतना रोष होता था अंग्रेज़ों के इन क्लबों को लेकर पब्लिक में कि हमारी ही ज़मीन पर क़ब्ज़ा करके अपनी ऐश के लिए ये ठिकाने बनाए जा रहे हैं और भारतीय को नौकर बनाकर रखा हुआ है. लेकिन अंग्रेज़ तो चले गए. 1947 में देश आज़ाद हो गया. फिर क्या हुआ इन जिमख़ानों का? ये हमारे अफ़सरों ने घेर लिए. सरकार और सेना के अफ़सरों के हो गए ये. देशभर में जितने भी ये जिमख़ाने और क्लब थे वो अब इन अफ़सरों ने घेर लिए वैसे ही जैसे अंग्रेज़ अफ़सरों के ये हुआ करते थे. बस ग़नीमत रही कि इन्होंने बोर्ड नहीं लगाया कि कुत्ते और आम पब्लिक अंदर नहीं आ सकती. दिल्ली में भी इंपीरियल जिमख़ाना से इंपीरियल नाम हट गया और वो सिर्फ़ दिल्ली जिमख़ाना हो गया. और आम पब्लिक इसमें फिर भी नहीं जा सकती थी. वही अंग्रेज़ों वाले रिवाज चलते रहे. कुर्ते साड़ी वगैरह तो बाद में इन लोगों ने अलाउ कर दिये. लेकिन चोंचले इनके वही चलते रहे. कि ये नहीं पहन सकते, वो नहीं पहन सकते. लेकिन अंग्रेज़ो का तो राज था. तो उन्होंने 1928 में दिल्ली की सबसे प्राइम 27 एकड़ ज़मीन हमेशा के लिए अपने अफ़सरों के लिए लीज़ पर दी थी. लेकिन आज़ादी के बाद तो ये पब्लिक की ज़मीन हुई ना. हमारे अफ़सरों को देकर गए थे क्या अंग्रज़? साल का किराया एक हज़ार रुपये? अरबों की जमीन, कौड़ियों में किराया चले गए ना अंग्रेज़. ये हमारे वाले अफ़सर अब भारत सरकार को सिर्फ़ एक हज़ार रुपये किराया क्यों देंगे ये सवाल उठ रहा है