भारतीय राजनीति के इतिहास में अगर सबसे चर्चित घोटालों का नाम लिया जाए, तो बोफोर्स घोटाला (Bofors Scam) सबसे ऊपर गिना जाता है. यह सिर्फ एक रक्षा सौदे में कथित भ्रष्टाचार का मामला नहीं था, बल्कि ऐसा विवाद था जिसने देश की राजनीति की दिशा बदल दी. तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार पर गंभीर सवाल उठे, सत्ता बदल गई और लगभग चार दशक तक जांच, अदालतों और राजनीतिक बहसों का सिलसिला चलता रहा. बताया जाता है कि इस मामले की जांच में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने करीब 250 करोड़ रुपये खर्च किए. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस मामले की सुनवाई पर एक याचिका खारिज की और कहा कि इसपर सुनवाई की जरुरत नहीं है. इस तरह समाप्त बोफोर्स केस को खत्म होने 40 साल गए.
सुप्रीम कोर्ट ने 2005 के दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ बची हुई एकमात्र अपील को खारिज कर दिया, जिसमें हिंदुजा ब्रदर्स और स्वीडिश हथियार निर्माता एबी बोफोर्स के खिलाफ सभी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया गया था. जस्टिस जेबी पारदीवाला और के विनोद चंद्रन की बेंच ने वकील और बीजेपी नेता अजय के अग्रवाल को और समय देने से इनकार कर दिया. अजय अग्रवाल ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी. बेंच ने कहा कि वह 2018 से लंबित मामले को सिर्फ इस सवाल पर टालने के पक्ष में नहीं है. कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी(CBI) ने भी अपनी चैलेंजिग पीटिशन खारिज होने के बाद अपील नहीं की तो, किसी अन्य की व्यक्तिगत अपील कैसे बनी रह सरती है. इसे भी खारिज किया जाता है. इसे टालने की जरूरत नहीं है. हिंदुजा ब्रदर्स में दो भाइयों श्रीचंद पी हिंदुजा और गोपीचंद पी हिंदुजा का निधन काफी पहले हो चुका है. मामले में प्रतिवादियों में प्रकाश पी हिंदुजा शामिल थे. प्रकाश इन दिनों यूरोप में हिंदुजा ग्रुप के चेयरमैन हैं.
2005 का फैसला
1990 में CBI ने इस मामले में एफआईआर दर्ज की और जांच शुरू की. जांच के दौरान स्विट्जरलैंड सहित कई देशों से बैंक रिकॉर्ड, दस्तावेज और कानूनी सहायता जुटाने की कोशिश की गई. विदेशी अदालतों में कानूनी प्रक्रिया, दस्तावेजों के अनुवाद, अधिकारियों की विदेश यात्राओं और लंबी जांच के कारण इस मामले पर करीब 250 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान सामने आया. इसके बावजूद जांच एजेंसियों को ऐसा को खास सबूत नहीं मिल पाया जिससे सभी आरोपों को अदालत में साबित किया जा सके.
इस याचिका के खारिज होने के साथ ही हाई कोर्ट के 31 मई, 2005 के फैसले से जुड़े कानूनी विवाद का अंत हो गया. उस फैसले में जस्टिस आरएस सोढ़ी ने श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाश हिंदुजा के साथ-साथ बोफोर्स कंपनी के खिलाफ सभी आरोप रद्द कर दिए थे. साथ ही, उन्होंने मामले की पैरवी करने के तरीके को लेकर CBI की कड़ी आलोचना की थी और कहा था कि जांच में सरकारी खजाने से लगभग 250 करोड़ रुपए खर्च हुए थे. सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2018 में उसी हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ CBI की अपनी अपील पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया था, क्योंकि एजेंसी ने कोर्ट में आने में हुई 4522 दिनों की देरी के लिए कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया था.
गिरी राजीव गांधी की सरकार
बोफोर्स विवाद का सबसे बड़ा असर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार पर पड़ा. 1989 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बोफोर्स विवाद भारतीय चुनावी राजनीति का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. जनता के बीच सरकार की छवि खराब हुई और कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई.
क्या थी बोफोर्स डील?
24 मार्च 1986 को भारत सरकार ने स्वीडन की हथियार निर्माता कंपनी Bofors AB से 155 मिमी FH-77B हॉवित्जर तोपें खरीदी थीं. यह डील लगभग 1437 करोड़ रुपये में हुई थी. इस डील के तहत भारतीय सेना को 410 आधुनिक तोपें मिलनी थीं. उस समय इसे भारतीय सेना के आधुनिकीकरण की दिशा में बड़ा कदम माना गया. हालांकि, एक साल बाद यह सौदा देश के सबसे बड़े राजनीतिक विवाद में बदल गया.
कैसे सामने आया घोटाला?
16 अप्रैल 1987 को स्वीडिश रेडियो ने दावा किया कि बोफोर्स कंपनी ने भारतीय अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों को डील दिलाने के लिए करोड़ों रुपये की रिश्वत दी थी. इस खुलासे ने भारत में राजनीतिक भूचाल ला दिया. विपक्ष ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर आरोप लगाए कि उनकी सरकार ने पूरे मामले को छिपाने की कोशिश की. हालांकि राजीव गांधी ने संसद और सार्वजनिक मंचों पर रिश्वत लेने के आरोपों से साफ इनकार किया.
किन लोगों के नाम आए?
जांच के दौरान कई भारतीय और विदेशी नागरिकों के नाम सामने आए. इनमें इतालवी कारोबारी ओत्तावियो क्वात्रोच्ची, हथियार एजेंट विन चड्ढा, कारोबारी हिंदुजा ब्रदर्स और कुछ अन्य बिचौलियों के नाम प्रमुख रहे. आरोप था कि इन लोगों के जरिए कथित कमीशन का भुगतान किया गया. हालांकि, लंबे समय तक चली जांच और अदालतों की प्रक्रिया के बावजूद अधिकांश आरोप अदालत में साबित नहीं हो सके.
40 साल तक क्यों चला मामला?
बोफोर्स केस लंबे समय तक इसलिए चलता रहा क्योंकि इसमें कई देशों की एजेंसियां शामिल थीं. बैंक खातों की जानकारी प्राप्त करने में वर्षों लग गए. कई आरोपी विदेश में थे, कुछ की मौत हो गई और कुछ के खिलाफ प्रत्यर्पण की प्रक्रिया सफल नहीं हो सकी. समय के साथ गवाह, दस्तावेज और परिस्थितियां भी बदलती गईं, जिससे मुकदमे को आगे बढ़ाना और कठिन होता गया. आखिरकार अलग-अलग चरणों में अदालतों ने कई आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी. समय के साथ मामला कानूनी रूप से लगभग समाप्त हो गया
क्या सेना के लिए तोपें सफल रहीं?
दिलचस्प बात यह है कि जिस बोफोर्स तोप को लेकर इतना बड़ा विवाद हुआ, वही 1999 के कारगिल युद्ध में भारतीय सेना के लिए बेहद प्रभावी साबित हुई. सैन्य विशेषज्ञों ने माना कि FH-77B हॉवित्जर ने कठिन पहाड़ी इलाकों में दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारतीय सेना की सफलता में योगदान दिया.