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Palamu Agriculter News: फसल चक्र अपनाने से खेत की उर्वरता बढ़ती है, रोग-कीटों का प्रकोप घटता है और उत्पादन बेहतर होता है. पलामू के कृषि वैज्ञानिर डॉ. दिलीप पांडे ने बताया कि यह मिट्टी व पर्यावरण दोनों के लिए फायदेमंद है. आइये जानते हैं उन्होंने क्या कुछ कहा.
पलामू: कई किसान साल-दर-साल एक ही फसल की खेती करते हैं, जिससे खेत की उर्वरता घटने लगती है. इस दौरान रोग और कीटों का प्रकोप बढ़ जाता है तथा उत्पादन का पर भी असर पड़ता है. इन समस्याओं का सबसे प्रभावी समाधान फसल चक्र (Crop Rotation) है. फसल चक्र का अर्थ है एक ही खेत में अलग-अलग मौसम और समय पर विभिन्न प्रकार की फसलें उगाना. इससे मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बना रहता है, रोग-कीटों का चक्र टूटता है, उर्वरक की आवश्यकता कम होती है और पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलती है.
कृषि विशेषज्ञ डॉ. दिलीप पांडे ने लोकल 18 को बताया कि एक ही फसल लगाने से उस फसल से जुड़े रोग और कीट खेत में स्थायी रूप से विकसित हो जाते हैं, लेकिन जब किसान फसल बदलते हैं तो इन रोगों और कीटों का जीवन चक्र टूट जाता है, जिससे उनका प्रकोप स्वतः कम होने लगता है. इससे फसलों की सुरक्षा बेहतर होती है और दवाओं पर होने वाला खर्च भी घटता है.
मिट्टी की उर्वरता रहती है बरकरार
उन्होंने कहा कि फसल चक्र अपनाने से मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बना रहता है. कम गहराई वाली जड़ों वाली फसल के बाद गहरी जड़ों वाली फसल लगाने से मिट्टी की अलग-अलग परतों से पोषक तत्वों का उपयोग होता है. इससे एक ही स्तर के पोषक तत्व खत्म नहीं होते और उर्वरकों की आवश्यकता भी कम पड़ती है. परिणामस्वरूप खेत की उत्पादन क्षमता लंबे समय तक बनी रहती है.
मिट्टी और पर्यावरण दोनों को मिलता है लाभ
उन्होंने आगे कहा कि खेत को लंबे समय तक खाली नहीं छोड़ना चाहिए. फसल चक्र अपनाने से मिट्टी का कटाव (अपरदन) कम होता है और भूमि की नमी भी सुरक्षित रहती है. यदि किसान लंबी अवधि की फसल लगा रहे हैं तो उसके बीच में कम अवधि वाली फसल शामिल करने से भूमि का बेहतर उपयोग होता है. यह तरीका पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ टिकाऊ खेती को भी बढ़ावा देता है.
ऐसे अपनाएं सही फसल चक्र
उन्होंने कहा कि किसान अपनी सुविधा और क्षेत्र की आवश्यकता के अनुसार फसल चक्र चुन सकते हैं. यदि किसी खेत में लंबे समय से दलहनी फसलें उगाई जा रही हैं और उकठा जैसे रोग बढ़ रहे हैं तो वहां मक्का, बाजरा, ज्वार या मड़ुआ जैसी अनाज वाली फसलें लगानी चाहिए. इसके बाद रबी मौसम में मसूर के स्थान पर सरसों, अलसी या अन्य तिलहनी फसलें उगाई जा सकती हैं. इससे रोगों का दबाव कम होगा, मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बना रहेगा, उर्वरकों की जरूरत घटेगी और किसानों को बेहतर उत्पादन के साथ अधिक लाभ मिलेगा.
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बृजेंद्र प्रताप सिंह डिजिटल-टीवी मीडिया में (2021) लगभग 5 सालों से सक्रिय हैं. मेट्रो न्यूज 24 टीवी चैनल मुंबई, ईटीवी भारत डेस्क, दैनिक भास्कर डिजिटल डेस्क के अनुभव के साथ 14 मई 2024 से News.in में सीनियर कंटें…और पढ़ें