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DRDO TBRL Bomb Trial: फटा तो 1.5 KM ऊंचे और 2 किमी...


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फटते ही…1.5 KM ऊंचे, 2 किमी का दायरे में गिरे टुकड़े, हाई-कैलिबर बम है क्या?

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DRDO की रामगढ़ स्थित TBRL लैब में वायुसेना की मौजूदगी में एक विनाशकारी हाई-कैलिबर बम का सफल परीक्षण किया गया. हाई विस्फोटक रसायनों से लैस यह भारी-भरकम बम बंकरों और सैन्य ठिकानों को तबाह करने के लिए डिज़ाइन किया गया है. यह टेस्ट इतना प्रचंड था कि इसके टुकड़े हवा में 1.5 किलोमीटर ऊंचे और 2 किमी के दायरे में बिखर गए, जिसके चलते नजदीकी गांवों में हाई अलर्ट जारी करना पड़ा था.

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डीआरडीओ ने वायुसेना की मौजूदगी में टेस्‍ट किया.

हरियाणा के पंचकूला में स्थित DRDO की टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (TBRL) में रविवार सुबह हुए एक भीषण परीक्षण ने देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है. यह परीक्षण भारतीय वायुसेना के शीर्ष अधिकारियों की मौजूदगी में किया गया, जिसने इसके रणनीतिक महत्व को साबित कर दिया. यह धमाका इतना जबरदस्त था कि इसकी गूंज कई किलोमीटर दूर तक सुनी गई और परीक्षण स्थल से बम के मलबे व टुकड़े हवा में 1.5 किलोमीटर की ऊंचाई तक उछले, जबकि जमीनी स्तर पर इसका असर 2 किलोमीटर के दायरे में देखा गया. इस महापरीक्षण के बाद हर कोई यह जानने को उत्सुक है कि आखिर यह ‘हाई-कैलिबर बम’ होता क्या है, इसे किस तकनीक से बनाया जाता है और यह भविष्य के युद्धों में भारतीय वायुसेना (IAF) के फाइटर जेट्स और मिसाइलों को कितनी विनाशकारी संहारक क्षमता प्रदान करने जा रहा है.

विनाश का दूसरा नाम है हाई-कैलिबर बम
हथियारों और सैन्य विज्ञान की भाषा में कैलिबर शब्द का इस्तेमाल किसी गन की बैरल के आंतरिक व्यास (व्यास/डायमीटर) या फिर किसी बड़े बम और मिसाइल की मारक क्षमता और उसके वजन के अनुपात को दर्शाने के लिए किया जाता है. जब हम ‘हाई-कैलिबर’ बम की बात करते हैं तो इसका सीधा मतलब एक ऐसे भारी-भरकम और अत्यधिक विनाशकारी बम से होता है जिसमें पारंपरिक विस्फोटकों की तुलना में बहुत अधिक मात्रा में उन्नत और उच्च-तीव्रता वाले रसायन भरे होते हैं. ये बम आकार में बहुत बड़े होते हैं और इन्हें विशेष रूप से बंकरों, सैन्य अड्डों, रनवे और दुश्मन के बड़े बुनियादी ढांचे को मटियामेट करने के लिए डिज़ाइन किया जाता है.

TBRL के परीक्षण में दिखी ताकत
चंडीगढ़ के रामगढ़ स्थित DRDO की इस लैब में जब इस बम को डेटोनेट (विस्फोट) किया गया तो इसके शॉक वेव्स और टर्मिनल इफेक्ट्स का डेटा रिकॉर्ड किया गया. आम बमों के फटने पर उनके टुकड़े कुछ मीटर या ज्यादा से ज्यादा आधा किलोमीटर तक जाते हैं, लेकिन इस हाई-कैलिबर बम की क्षमता इतनी प्रचंड थी कि इसके टुकड़े आसमान में 1.5 किलोमीटर ऊपर तक चले गए और चारों तरफ 2 किलोमीटर के रेडियस में बिखर गए. यही वजह थी कि प्रशासन को पास के भानू और बिल्ला गांवों में सुरक्षा अलर्ट जारी करना पड़ा था.

वायुसेना के लड़ाकू विमानों का बनेगा मुख्य हथियार
इस परीक्षण के दौरान वायुसेना के बड़े अफसरों की मौजूदगी इस बात का पुख्ता सबूत है कि इस बम का इस्तेमाल फाइटर जेट्स (जैसे सुखोई-30 MKI, राफेल या तेजस) से गिराए जाने वाले ‘एयर-ड्रॉप म्यूनिशन्स’ या फिर लंबी दूरी की मिसाइलों के वॉरहेड (युद्धक सामग्री) के रूप में किया जाएगा. जब यह बम किसी फाइटर जेट से गिराया जाएगा, तो यह दुश्मन के हवाई क्षेत्र में घुसकर उनके रडार और कमांड सेंटरों को पल भर में राख के ढेर में बदल देगा.





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